शिवसेना जिसकी पहचान कभी एक मात्र शख्सियत बालासाहब ठाकरे से होती थी, लेकिन बदलते वक्त और राजनीतिक पैंतरेबाजी में यह पार्टी दो धड़ों में बंटी हुई है। एक धड़ा उद्धव ठाकरे (यूबीटी) का है तो दूसरा गुट एकनाथ शिंदे की शिवसेना है, जो महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम हैं। बालासाहब ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे हैं, लेकिन 2022 में एकनाथ शिंदे द्वारा किए गए विद्रोह की वजह से शिवसेना दो धड़ों में बंट गई। असली शिवसेना किसकी है? इसका मामला चुनाव आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा कि असली शिवसेना कौन है? लेकिन चुनाव आयोग ने शिंदे की पार्टी को असली शिवसेना माना और उद्धव की पार्टी को शिवसेना (यूबीटी)।
शिवसेना की स्थापना को आज 60 साल पूरे हो गए हैं। ऐसे में उद्धव और शिंदे की पार्टी आज अलग-अलग राजनीति आजमाइश करेंगे। शिंदे गुट ने शिवसेना के स्थापना दिवस समारोह को बड़े शक्ति प्रदर्शन में बदलने की तैयारी की है। यह कार्यक्रम मुंबई के गोरेगांव स्थित नेस्को ग्राउंड में आयोजित होगा, जहां हजारों शिवसैनिकों के जुटने की उम्मीद है। वहीं, उद्धव ठाकरे गुट का कार्यक्रम सायन के षणमुखानंद हॉल में अपेक्षाकृत सादगी से मनाया जाएगा। दोनों ही नेता अपने-अपने कार्यकर्ताओं को संबोधित करेंगे और आने वाले राजनीतिक समीकरणों पर संकेत देंगे।
माना जा रहा है कि शिंदे अपने भाषण में एक बार फिर दिवंगत शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे की विरासत पर दावा मजबूत करेंगे। दूसरी ओर उद्धव ठाकरे हालिया बगावत पर खुलकर प्रतिक्रिया दे सकते हैं। वह भाजपा और शिंदे गुट पर हमला बोल सकते हैं। माना जा रहा है कि उद्धव अपने समर्थकों को भावनात्मक रूप से जोड़ने की कोशिश करेंगे।
वहीं, शिवसेना यूबीटी ने 60वीं वर्षगांठ से पहले ‘एक्स’ पर एक भावनात्मक पोस्ट के जरिए प्रतिक्रिया दी और कहा कि उसका सफर जारी रहेगा। पार्टी ने प्रबोधनकार, बालासाहेब, उद्धव और आदित्य ठाकरे की तस्वीरें शेयर करते हुए पोस्ट में कहा कि महाराष्ट्र के कल्याण की विरासत को अपनाते हुए शिवसेना का सार जो इस तरह शुरू हुआ था, बिना रुके जारी रहेगा। पीढ़ियों ने महाराष्ट्र के कल्याण के लिए संघर्ष किया। शिवसेना जनसेवा के लिए लड़ती रही। हम ठाकरे के वफादार शिवसैनिक हैं! जहां ठाकरे हैं, वहां वफादारी है। जहां वफादारी है, वहां शिवसैनिक है!
हालांकि, अपनी स्थापना के 60 साल पूरे होने पर शिवसेना एक संभावित विभाजन के खतरे का सामना कर रही है। उद्धव ठाकरे खेमा अपने समर्थकों को एकजुट रखने के लिए संघर्ष कर रहा है। ऐसा लगता है कि वही पुरानी कहानी दोहराई जा रही है।
बालसाहब ठाकरे द्वारा 1966 में स्थापित शिवसेना अपनी आक्रामक हिंदुत्व और क्षेत्रीय पहचान की राजनीति के लिए जानी जाती रही है। लेकिन आंतरिक कलह और शीर्ष नेताओं का पार्टी छोड़ना पार्टी के लिए एक नई समस्या रही है। 1991 से 2022 तक, शिवसेना को हर दशक में बड़े झटके लगे हैं।
छगन भुजबल- 1991
शिवसेना के इतिहास में पहला बड़ा विद्रोह छगन भुजबल ने किया। उन्होंने 17 विधायकों के साथ पार्टी छोड़ दी और शरद पवार के खेमे में शामिल हो गए। बाद के वर्षों में उन्होंने कांग्रेस-एनसीपी सरकारों में उपमुख्यमंत्री और गृह मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। उनका पार्टी छोड़ना पार्टी की संगठनात्मक संरचना के लिए पहली बड़ी चुनौती थी।
गणेश नायक- 1999
नवी मुंबई में प्रभावशाली नेता गणेश नाइक ने निजी महत्वाकांक्षाओं के कारण शिवसेना छोड़कर एनसीपी में प्रवेश किया। एनसीपी में लगभग दो दशक बिताने के बाद, उन्होंने 2019 में भाजपा में शामिल हो गए और नवी मुंबई की राजनीति पर उनका दबदबा आज भी बरकरार है।
नारायण राणे- 2004
पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे ने उद्धव ठाकरे से मतभेद होने के बाद शिवसेना छोड़ दी थी। कांग्रेस और अपनी स्वयं की स्वाभिमान पार्टी में कुछ समय बिताने के बाद, राणे अंततः भाजपा में शामिल हो गए। आज वे कोंकण क्षेत्र में भाजपा का एक मजबूत चेहरा हैं।
राज ठाकरे- 2007
यह मामला ठाकरे परिवार के लिए व्यक्तिगत था। जब परिवार के मुखिया बाल ठाकरे ने सक्रिय राजनीति से दूरी बनाकर शिवसेना की कमान अपने बेटे उद्धव ठाकरे को सौंप दी, तो उनके भतीजे राज ठाकरे ने बगावत कर दी। परिवार के आंतरिक मतभेदों और उद्धव ठाकरे के बढ़ते प्रभाव से असंतुष्ट राज ठाकरे ने शिवसेना छोड़ दी और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) का गठन किया। शुरुआती चुनावी सफलता के बावजूद, पार्टी अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखने में विफल रही और वर्तमान में चुनावी रूप से हाशिए पर है। राज ठाकरे के शिवसेना छोड़ने को एक वैचारिक और पारिवारिक विभाजन के रूप में देखा गया जिसने शिवसेना की मूल शक्ति को विभाजित कर दिया।
एकनाथ शिंदे- 2022
यह सिर्फ एक नेता का विद्रोह नहीं था, बल्कि शिवसेना खुद दो हिस्सों में बंट गई। 2022 में एकनाथ शिंदे ने पार्टी को औपचारिक रूप से विभाजित कर दिया। अधिकांश विधायक और सांसद शिंदे के साथ पार्टी छोड़कर चले गए। पहले के सभी विद्रोहों के विपरीत, शिंदे का विद्रोह कहीं ज्यादा प्रभावशाली था। यह सिर्फ कुछ नेताओं का पार्टी छोड़ना नहीं था, बल्कि पार्टी के मूल आधार और विधानसभा के एक बड़े हिस्से में बदलाव था। इसने उद्धव ठाकरे की शिवसेना को कानूनी और संगठनात्मक संकट में डाल दिया।
विद्रोह के चरम पर, शिंदे के साथ 40 से 46 विधायक गुवाहाटी में डेरा डाले हुए थे। शिंदे गुट ने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई और उसे आधिकारिक शिवसेना के रूप में मान्यता दी गई। जिसने पार्टी का नाम और ‘धनुष और बाण’ का चुनाव चिन्ह हासिल किया। सरकार बनने के बाद शिंदे खेमे में सांसदों का पलायन तेज हो गया।
उद्धव ठाकरे के गुट को अब शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) या शिवसेना यूबीटी कहा जाता है, जिसका चुनाव चिन्ह ‘जलती हुई मशाल’ है। शिंदे गुट कानूनी तौर पर खुद को असली शिवसेना होने का दावा करता है।
साल 2026 में क्या?
क्या 2022 की तरह इस बार भी सांसद उद्धव ठाकरे का साथ छोड़कर एकनाथ शिंदे का समर्थन करेंगे? या क्या उद्धव ठाकरे इस संकट को टाल पाएंगे? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।
उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) में एक और फूट की खबरों के बीच लोगों का सारा ध्यान पार्टी के नौ सांसदों में से उन छह सांसदों पर केंद्रित हो गया है जिनके अलग होने की आशंका है। गुरुवार को दिल्ली में शिवसेना (यूबीटी) की संसदीय दल की बैठक में ये छह सांसद मौजूद नहीं थे। इनमें संजय जाधव, संजय देशमुख, नागेश पाटिल अष्टिकर, भाऊसाहेब वाकचौरे, संजय दीना पाटिल और ओमराजे निंबालकर शामिल हैं। पढ़ें पूरी खबर।
