ताज़ा खबर
 

शिवसेना-भाजपा को मिल सकता है बदली छवि का फायदा

मुंबई। महाराष्ट्र विधानसभा के लिए हुए चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और शिवसेना की छवि में आए बुनियादी बदलाव का फायदा उन्हें बढ़ी हुई सीटों के रूप में मिल सकता है। दोनों ही पार्टियों ने अपने परंपरागत वोट बैंक के अलावा नए वोट बैंक बनाने की भी कोशिश की है। इसके उलट कांग्रेस, राष्ट्रवादी […]

Author Published on: October 19, 2014 7:37 AM

मुंबई। महाराष्ट्र विधानसभा के लिए हुए चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और शिवसेना की छवि में आए बुनियादी बदलाव का फायदा उन्हें बढ़ी हुई सीटों के रूप में मिल सकता है। दोनों ही पार्टियों ने अपने परंपरागत वोट बैंक के अलावा नए वोट बैंक बनाने की भी कोशिश की है। इसके उलट कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) ने बदलते समय के मुताबिक खुद को नहीं बदला। वे पुराने वोट बैंक के भरोसे ही चुनाव में उतरीं। लिहाजा 2009 में मिली सीटें बरकरार रख पाना उनके लिए मुश्किल होगा।

भाजपा की छवि सवर्णों की पार्टी की रही है। राष्ट्रीय राजनीति में मोदी उदय के बाद भाजपा ने अन्य समुदायों को भी अपने से जोड़ने की कोशिश की, जिसका उसे लगातार फायदा हो रहा है। महाराष्ट्र चुनाव में भी भाजपा ने अन्य पिछड़े वर्ग और दलितों को प्रमुखता दी। उसने रामदास आठवले से गठबंधन कर दलितों के एक वर्ग को अपने साथ कर लिया, तो बालासाहेब गावडे को टिकट देकर धनगरों को भावनात्मक रूप से भाजपा से जोड़ा। इसका फायदा उसे मराठवाड़ा, पश्चिम महाराष्ट्र और विदर्भ में मिलेगा। ये तीनों ही क्षेत्र कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के गढ़ माने जाते रहे हैं। साल 2009 के विधानसभा चुनाव में उसे मराठवाड़ा की 46 में से 2, पश्चिम महाराष्ट्र की 70 में से 10 और विदर्भ की 62 में से 19 सीटें मिली थीं। धनगर, वंजारी, मराठा कुनबी जैसे समुदायों का भाजपा का ओर बढ़ता झुकाव भाजपा की सीटों में इजाफा करेगा। दूसरी ओर सूबे में सर्वमान्य और प्रभावशाली नेता कमी को भाजपा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनाव प्रचार में उतार कर पूरा किया। इसका भी भाजपा को फायदा होगा।

शिवसेना की छवि आक्रामक और कुछ हद तक अपने विरोधियों को हिंसा के जरिए दबाने की रही है। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में शिवसेना अपनी इस छवि से दूर जाती दिखी। बाल ठाकरे होते तो शिवसेना को उसके गढ़ में आकर चूहा कहने का नतीजा सड़कों पर उपद्रव, पथराव और आगजनी के रूप में देखने को मिल सकता था। मगर उद्धव ने शिवसेना को उस हिंसक छवि से दूर ले जाकर दूसरे राज्यों में भी उसके विस्तार की कोशिशें की हैं। दूसरे समुदायों के प्रति आक्रामक विरोध की नीति से भी शिवसेना दूर जा रही है। उसने इस चुनाव में अन्य राज्यों से महाराष्ट्र में आने वाले नागरिकों के विरोध के मुद्दे को ठंडे बस्ते में डाल दिया और मराठी अस्मिता के मुद्दे को आगे कर चुनाव लड़ा। इसका फायदा उसे कोंकण और ठाणे जैसे क्षेत्रों में बढ़ी हुई सीटों के रूप में मिलेगा जहां जमीनी स्तर पर शिवसेना का संगठन मजबूत है।

महाराष्ट्र चुनाव में कांग्रेस ने राकांपा के भ्रष्टाचार के साथ ही समाज के सर्वांगीण विकास को मुद्दा बनाते हुए अपने विज्ञापनों में महाराष्ट्र को विकसित और समृद्ध हो चुके राज्य के रूप में पेश किया। सूबे के चुनाव प्रचार प्रभारी नारायण राणे, पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण और पृथ्वीराज चव्हाण के बीच पूरे प्रचार के दौरान कहीं तालमेल नहीं दिखा। राणे अपने बेटे नितेश राणे की कणकवली सीट और खुद की कुडाल सीट में उलझे रहे। लोकसभा हारने के बाद शिंदे को अपनी बेटी प्रणति शिंदे की सीट की ज्यादा फिक्र थी। अशोक चव्हाण पत्नी अमिता चव्हाण को भोकर से जिताने की जद्दोजहद कर रहे थे। पृथ्वीराज भी दक्षिण कर्हाड में व्यस्त थे। सूबे में कांग्रेस के भविष्य की चिंता करने वाला नजर नहीं आ रहा था। कांग्रेस ने राज्य में अपने वोट बैंक के विस्तार के साथ राकांपा से खुद को अलग करने का फायदा उठाने की कोई कोशिश नहीं की। बिखरे हुए चुनाव प्रबंधन का खमियाजा उसे लगभग 20 फीसद सीटें गंवाकर चुकाना पड़ सकता है।

राकांपा पश्चिम महाराष्ट्र और उत्तर महाराष्ट्र की राजनीति से इंच भर आगे सरकने को तैयार नहीं दिखी। लंबे समय से वह पश्चिम महाराष्ट्र में चीनी मिल मालिकों, सहकारी समितियों और उत्तर महाराष्ट्र में प्याज व्यापारियों और किसानों की राजनीति कर रही है। मगर इसमें भाजपा और अन्य दल सेंध लगा रहे हैं। राकांपा ने अपने ही गढ़ों में कांग्रेस को नुकसान पहुंचा कर अपने विस्तार की कोशिशें तो की मगर राज्य में नया वोट बैंक तलाशने की परवाह नहीं की। उसके नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोपों का उसे इस चुनाव में सभी पार्टियों से ज्यादा खमियाजा उठाना पड़ सकता है।

मनसे वोट काटने की राजनीति के लिए उभरी थी। बीते विधानसभा चुनाव में मुंबई में शिवसेना को 22 फीसद वोट मिले थे तो मनसे को 24 फीसद। लोकसभा चुनाव में करारी हार, संगठन को मजबूत करने में लापरवाही, मराठी अस्मिता और अन्य प्रदेशों से महाराष्ट्र में आने वाले लोगों से द्वेष की बुनियाद पर खड़ी मनसे आज भी वहीं खड़ी है। एक व्यक्ति के इर्दगिर्द घूम रही मनसे की भी इस चुनाव में सीटें कम हो सकती हैं।

 

 

 

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories