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गठजोड़ के वास्ते राजधर्म की दुहाई दी संघ ने

पुण्य प्रसून वाजपेयी शिवसेना-भाजपा के शह और मात के खेल में पहली बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की साख दांव पर लगी तो राजधर्म की दुहाई देकर संघ ने ही दोनों को एक साथ ला खड़ा किया। यानी भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के जिस सत्ताधर्म ने मिशन महाराष्ट्र की हुंकार तले भाजपा में फूंक मारी कि […]

Author Published on: September 24, 2014 10:17 AM

पुण्य प्रसून वाजपेयी

शिवसेना-भाजपा के शह और मात के खेल में पहली बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की साख दांव पर लगी तो राजधर्म की दुहाई देकर संघ ने ही दोनों को एक साथ ला खड़ा किया। यानी भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के जिस सत्ताधर्म ने मिशन महाराष्ट्र की हुंकार तले भाजपा में फूंक मारी कि अकेले भी बहुमत मिल सकता है, उसी हुंकार की हवा संघ ने यह कहकर निकाली कि जरूरी राजधर्म है। और अब राजधर्म का ही फार्मूला है कि शिवसेना मिशन 150 पर चले और बाकी 138 सीट पर फैसला भाजपा करे कि वह खुद कितनी सीट पर लड़ेगी और सहयोगियों को कितना देगी।

मतलब यह कि पहली बार जिस अमित शाह को अध्यक्ष यह कहकर बनाया गया कि आप हर राज्य में भाजपा को जिता सकते हैं, उसी को संघ ने यह कह कर पलट दिया कि सर्वोच्च प्राथमिकता हिंदुत्व की है और उस पर शिवसेना कहीं मजबूती से खड़ी है और उसका साथ छोड़ा नहीं जा सकता।
असल में संघ की मुश्किल दोहरी है। एक तरफ सवाल राजधर्म का है तो दूसरी तरफ अमित शाह को भाजपा अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठाने के बाद लगातार तीन उपचुनाव में हार के बाद पहले हरियाणा तो अब महाराष्ट्र में गठबंधन तोड़कर जीतने के हुनर पर संघ का ही भरोसा डगमगा रहा है। इसीलिए संकेत की भाषा में संघ राजधर्म बचाकर सत्ता का स्वाद लेने का मंत्र लगातार दे रहा है ।

लेकिन रास्ता जिस तरह जुदा हो रहा है, उसमें हर सवाल वहीं जाकर रुक रहा है कि राजधर्म ताक पर रख चुनावी जीत हासिल करनी चाहिए या फिर राजधर्म के आसरे शिवसेना को साथ लेकर चलना चाहिए। यह सवाल संघ परिवार के भीतर इसलिए बड़ा है कि चाहे अयोध्या आंदोलन का दौर हो, चाहे 1993 में मुंबई धमाकों के बाद के हालात या फिर हिंदुत्व के रास्ते मुसलिमों को निशाने पर लेने वाले हालात, हर वक्त हर दौर में शिवसेना और भाजपा एक साथ ही रहे। और हर मुद्दे को राजधर्म से जोड़कर दोनों ने सियासी चालों को एक साथ चलना सीखा। इसके लिए मराठी मानुष के आंदोलन को छोड़ शिवसेना पहली बार 1990 के मैदान में अयोध्या आंदोलन का नाम जपते हुए लड़ी।

उस वक्त संघ के लिए यह बड़ी बात थी कि शिवसेना उसके साथ खड़ी है। इसलिए 1990 में शिवसेना 183 सीट पर लड़ी और भाजपा 104 सीट पर। फिर बाबरी विध्वंस के बाद आडवाणी शोक मनाने लगे, लेकिन बालासाहेब ठाकरे ताल ठोंककर कहने से नहीं चूके कि उन्होंने विध्वंस किया। संघ परिवार ने भी कभी शोक या माफी के शब्दों का प्रयोग बाबरी मस्जिद को लेकर नहीं किया। यानी सियासत के लिहाज से संघ के सोच से कहीं ज्यादा नजदीक शिवसेना ही रही। ठाकरे तो आडवाणी ही नहीं, संघ से निकले राजनीतिक स्वयंसेवकों से कई कदम आगे बढ़कर खुद को हिंदू हृदय सम्राट कहने से नहीं कतराए और दूसरी तरफ विहिप के नारे ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं’ को शिवसेना का नारा बना दिया।

दिल्ली में जब वाजपेयी-आडवाणी की हवा थी, महाराष्ट्र में तब भी शिवसेना ने अपना कद बड़ा रखा और 1995 में भाजपा को सिर्फ 116 सीट दी और शिवसेना 169 सीट पर लड़ी। 1995 में शिवसेना-भाजपा गठबंधन को सत्ता मिली और उसके बाद 1999, 2004 और 2009 में लगातार हार ही मिली तो सीट समीकरण का फार्मूला भी 1995 से आगे न निकला, न बदला। और न ही हिंदुत्व के मुद्दे पर शिवसेना कभी भाजपा के पीछे खड़ी नजर आई। न भाजपा ने कभी किसी मुद्दे पर शिवसेना को पीछे छोड़ा। लेकिन पहली बार हिंदुत्व राष्ट्रवाद और हिंदू धर्म के बीच सियासत का ऐसा राजधर्म शिवसेना और भाजपा के बीच आ खड़ा हुआ है, जहां भाजपा मान कर चल रही है कि महाराष्ट्र में सत्ता परिवर्तन का मंत्र उसके पास है। शिवसेना मानकर चल रही है कि सत्ता बदलने की ताकत शिवसैनिकों के पास है।

जाहिर है, राजधर्म का गठबंधन पहली बार सत्ताधर्म में ऐसा उलझा है कि दोनों को आपसी सहयोग से ज्यादा अपनी सियासी चालों पर ही भरोसा हो रहा है। ध्यान दें तो पहली बार राजधर्म वाले प्रिय शब्द का जिक्र न तो शिवसेना कर रही है, न भाजपा। दोनो सत्ताधर्म की दुहाई दे रहे हंै। सत्ता का मतलब है क्या, यह किसी से छुपा नहीं है।

ध्यान रहे कि मुंबई को संवारने का जिम्मा लिए बीएमसी पर कब्जा शिवसेना का है जिसका सालाना बजट 31175 करोड़ का है। वहीं समूचे महाराष्ट्र की सत्ता का मतलब है 175325 करोड़ का बजट। असल सवाल यहीं से शुरू होता है कि आखिर शिवसेना को महाराष्ट्र की सत्ता क्यों चाहिए। वह भी ठाकरे परिवार ने चुनाव से पहले ही सीधे क्यों कह दिया कि इस बार वे मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं। और भाजपा यह क्यों नहीं पचा पा रही है कि ठाकरे परिवार की रुचि अगर सत्ता संभालने में है तो फिर वह विरोध क्यों कर रही है। तो सत्ता का मतलब है महाराष्ट्र के समूचे खर्च पर कब्जा और
शिवसेना हो या भाजपा, दोनों ही महाराष्ट्र की सत्ता से बीते 15 बरस से बाहर ही हैं। भाजपा तो फिर भी राष्ट्रीय पार्टी है। उसके नेता या कार्यकर्ताओं को पार्टी फंड से पैसा मिल जाता है जिससे पार्टी कैडर बरकरार रहे और काम करता रहे। लेकिन शिवसेना की उलझन यह है कि उसकी पहुंच, पकड़ सिर्फ महाराष्ट्र में है। महाराष्ट्र में ही जब सत्ता परिवर्तन की हवा चल रही है तो फिर मुख्यमंत्री पद अगर शिवसेना को नहीं मिलेगा तो शिवसैनिकों का हुजूम कितने दिन उसके साथ रहेगा।

यानी महाराष्ट्र की सत्ता शिवसेना के लिए जीवन-मरण के सामान है। लेकिन भाजपा दिल्ली की सत्ता की हवा में हर राज्य को समेटने की चाहत पाले है। इसीलिए हरियाणा में सहयोगी विश्नोई को भाजपा ने ठेंगा दिखाने में देरी नहीं की और महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की जिद खारिज करने में भी देरी नहीं लगी।

असर इसी का है कि शिवसेना गठबंधन में रहते हुए मिशन-150 पर निकल पड़ी है। भाजपा एक बूथ, 10 यूथ का नारा लगाने लगी है। अब अगर शिवसेना को यह लगने लगा है कि बाला साहेब ठाकरे की विरासत को मोदी मंत्र हड़प लेगा तो फिर महाराष्ट्र की सियासत में खामोश राज ठाकरे का उदय एक तरीके से हो सकता है। यह सक्रियता कहीं न कहीं भाजपा के सियासी पाठ से टकराने के लिए दिल्ली से लेकर मुंबई तक नए तरीके से मथेगी। जो राज ठाकरे हजार दुश्मनी के बाद भी उद्धव ठाकरे के दिल के आपरेशन के वक्त अस्पताल चले गए , वे ठाकरे की विरासत को जीवित रखने के लिए कब कैसे किसके साथ चले जाएंगे, इसके लिए 24 सितंबर की सुबह 11 बजे तक का इंतजार करना ही होगा। जब पित्तृ पक्ष खत्म होगा और शुभ मुहूर्त शुरू होगा।

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