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महिलाओं की गुरबत को दूर कर रहीं शहला

शहला का जन्म अफगानिस्तान की उसी धरती बोहमिया में हुआ है।

Author नई दिल्ली | Published on: February 3, 2020 4:59 AM
युवा उद्यमी ने दो साल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कंपनी स्थापित की।

विषम परिस्थितियों में रह कर भी एक लड़की फर्श से अर्श तक पहुंच सकती है, इसका एक जीवंत उदाहरण है अफगानिस्तान के काबुल शहर से आर्इं शहला सादत। एक राजमिस्त्री के साधारण से घर में जन्म लेने वाली शहला तालिबानी कुंठित मानसिकता वाले देश में अपनी खुद की गहने और हैंडलूम कंपनी का ना केवल सफलतापूर्वक संचालन कर रही हैं, बल्कि अपने वतन की गुरबत झेल रही महिलाओं की मदद भी कर रही हैं। शहला का सूरजकुंड में स्टाल लगाने का पहला अनुभव है।

शहला का जन्म अफगानिस्तान की उसी धरती बोहमिया में हुआ है, जहां कभी तालिबानी आतंकवादियों ने शांति और मानवता को अपने प्रेम से सींचने वाले महात्मा बुद्घ की विशालकाय प्रतिमा को ध्वस्त कर दिया था। जान अली और निखबा के घर में 26 दिसंबर, 1995 को जन्मी शहला सादत छ: भाई-बहनों में तीसरे स्थान पर हैं। उन्होंने 2017 में काबुल की हयात युनिवर्सिटी से जनसंचार एवं पत्रकारिता में स्नातक तक शिक्षा ग्रहण की। उसके बाद वे चीन के चंचा शहर चली गर्इं। वहां एक साल तक जुमोलॉजी सीखी।

आभूषण और कीमती पत्थरों के काम को उन्होंने तल्लीनता से सीखा और काबुल आकर इसी विधा में कारोबार शुरू कर दिया। सादत बानु जेम्स एंड ज्वेलरी व सादत बानु हैंडीक्राफ्ट्स की सीईओ शहला सादत के पास तीस महिला कारीगर कर्मचारी काम कर रही हैं और लगभग दो सौ से अधिक महिलाएं उनके साथ हैंडलूम के व्यवसाय में जुड़ी हुई हैं।

अनूप चौधरी

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