Odisha News: सरमिष्ठा सेठी नुगांव का गौरव होनी चाहिए। अपने समुदाय में ग्रेजुएशन की डिग्री लेने वाली वह पहली छात्रा हैं और तटीय गांव में सरकारी नौकरी पाने वाली कुछ गिनी-चुनी छात्राओं में से एक हैं। लेकिन, 21 साल की सरमिष्ठा की जिंदगी का जो दौर सबसे अच्छा होना चाहिए था, वह सबसे बुरा साबित हो रहा है।
पिछले चार महीनों से दलित महिला और उसका परिवार सामाजिक बहिष्कार का सामना कर रहा है, क्योंकि शर्मिष्ठा ने जिस नौकरी के लिए आवेदन किया था, उसमें आवेदन करने का साहस किया और फिर उसे हासिल भी कर लिया। वो थी स्थानीय आंगनवाड़ी केंद्र में सहायिका-सह-रसोइया की नौकरी। शनिवार को जिला प्रशासन के अधिकारियों और राज्य महिला आयोग की एक सदस्य ने नुगांव का दौरा किया और ग्रामीणों से सोमवार से अपने बच्चों को आंगनवाड़ी केंद्र भेजने का वादा लिया।
इससे पहले भी अधिकारियों द्वारा इस बहिष्कार को खत्म करने के प्रयास किए गए हैं, लेकिन अब तक उन्हें सफलता नहीं मिली है। केंद्र में बने स्टैंड से अपनी साइकिल निकालते हुए, सरमिष्ठा आंखों में आंसू लिए याद करती है कि कैसे ऊंची जाति के 50-60 ग्रामीणों ने उसे घेर लिया था, जिस दिन अधिकारी गांव के बिजली के खंभे पर उसका नौकरी की पुष्टि का पत्र चिपकाने आए थे।
मैं गांव वालों के सामने रो भी पड़ी- सरमिष्ठा
सरमिष्ठा ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “यह नवंबर के दूसरे हफ्ते की बात है। ग्रामीणों ने मुझे और मेरे पिता को बुलाया और मुझसे पूछा कि मैंने नौकरी के लिए आवेदन क्यों किया, जबकि मैं अनुसूचित जाति समुदाय से हूं। उन्होंने कहा कि अगर उनके बच्चे मेरे हाथ का बना खाना खाएंगे तो उन्हें देवताओं के प्रकोप का सामना करना पड़ेगा। मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की, यहां तक कि उनके सामने रो भी पड़ी, लेकिन किसी ने मेरी बात नहीं सुनी।”
20 नवंबर को जब उन्होंने आधिकारिक तौर पर सहायिका-सह-रसोइया के रूप में काम शुरू किया था, तब से आंगनवाड़ी केंद्र में उपस्थिति लगभग शून्य हो गई है, यहां तक कि तीन साल से कम उम्र के बच्चों के माता-पिता उन्होंने भी आना बंद कर दिया है।
आधिकारिक तौर पर, यह केंद्र स्तनपान कराने वाली मां के अलावा 42 बच्चों की देखभाल करता है। इनमें से 20 बच्चे 3 से 6 साल की उम्र के हैं, जिन्हें केंद्र आना अनिवार्य है और 22 बच्चे इससे कम उम्र के हैं जिन्हें राशन दिया जाता है। खाने में सत्तू, अंडे और लड्डू शामिल हैं। इनमें से केवल दो दलित बच्चे ही नियमित रूप से केंद्र आते हैं।
ग्रामीणों ने ऊंची जाति की आंगनवाड़ी कार्यकर्ता लिजारानी पांडव पर भी दबाव डाला कि वे सरमिष्ठा की नियुक्ति के बाद उस घर का इस्तेमाल करने से मना कर दें। 6 फरवरी से आंगनवाड़ी गांव के प्राइमरी स्कूल की दो इमारतों में से एक में चल रही है। सरमिष्ठा यहां हर दिन आती है, इस उम्मीद में कि नौकरी में तय दिनचर्या का पालन करने से गांव वाले मान जाएंगे। सुबह 7 बजे, वह साइकिल से नुगांव के दलित बहुल इलाके से दूर स्थित स्कूल जाती है, जमीन साफ करती है, बच्चों के लिए चटाई बिछाती है और इंतजार करती है।
कम से कम राशन तो ले जाएं- सरमिष्ठा
सरमिष्ठा ने कहा, “मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की कि अगर उन्हें मेरे हाथ के बने खाने से कोई दिक्कत है, तो कम से कम राशन घर ले जाएं। लेकिन उन्होंने मना कर दिया।” वह बताती हैं कि उन्हें न सिर्फ अपने लिए बल्कि अपने परिवार के लिए भी बहुत दुख हो रहा है। उन्होंने कहा, “हम अपने ही गांव में अजनबी जैसे हो गए हैं। मेरे माता-पिता और मेरी 86 साल की दादी मानसिक आघात से गुजर रहे हैं।”
21 साल की यह युवती अपने पिता चैतन्य सेठी को अपने सपनों को साकार करने के लिए प्रोत्साहित करने का श्रेय देती है। चैतन्य, जो एक एकड़ से भी कम जमीन पर खेती करते हैं और दूसरों के खेतों में काम करके अपना जीवन यापन करते हैं। उन्होंने केवल चौथी क्लास तक ही पढ़ाई की है। उन्होंने यह तय किया कि उनके तीनों बच्चे पढ़ाई करें।
सरमिष्ठा सबसे बड़ी है और उसके छोटे भाई-बहनों में से एक भाई भुवनेश्वर के एक प्राइवेट कॉलेज से डिप्लोमा कर रहा है और एक बहन 7वीं में पढ़ रही है। मां मिनाती बताती हैं कि गांव वालों को अपने बच्चों को सरमिष्ठा के घर पर पढ़ाने भेजने में कोई दिक्कत नहीं थी। उनका घर एक सरकारी योजना के तहत बना हुआ दो कमरों का कच्चा कंक्रीट का ढांचा था। मिनाती कहती हैं, “मेरी बेटी पढ़ी-लिखी है और बच्चों की अच्छी देखभाल करेगी। जब उसे योग्यता के आधार पर नौकरी मिली है तो उसके साथ भेदभाव क्यों होना चाहिए? क्या कानून उनके लिए और हमारे लिए अलग है।”
नुगांव में जातिगत विभाजन
उसे शक है कि सरमिष्ठा की उपलब्धियों से ईर्ष्या करने वाले कुछ प्रभावशाली ग्रामीण इस बहिष्कार के पीछे हैं। हालांकि, नुगांव में जातिगत विभाजन साफ तौर पर दिखाई देता है, भले ही इस पर खुलकर बात न की जाए। नुगांव के एंट्री गेट पर सात दलित परिवार एक साथ बसे हुए हैं, वहीं लगभग 90 ऊंची जाति के परिवार कुछ दूरी पर मौजूद हैं। परंपरा के अनुसार, दलित गांव के उत्सवों के दौरान दूसरों से दूर रहते हैं, जबकि ऊंची जाति के सदस्य शायद ही कभी उनके समारोहों में आते हैं।
हालांकि गरीबी सब को एक समान स्थिति में ला देती है, क्योंकि ज्यादातर समुदायों में घरों की छतें फूस की होती हैं। लोग ज्यादातर कम पढ़े लिखे होते हैं। उनके परिवार खेती पर निर्भर होते हैं। मुश्किल से दो-तीन परिवारों में ही सरकारी नौकरी करने वाले सदस्य होते हैं। नुगांव के कुलमणि राउत उन लोगों में से हैं जिनका चार साल का बेटा अब आंगनवाड़ी केंद्र नहीं जाता और न ही उन्हें अपनी दो साल की बेटी के लिए वहां से राशन मिलता है।
राउत ने कहा, “गांव वालों ने हमारे बच्चों को स्कूल न भेजने का फैसला कर लिया है। हम उन्हें भेजना चाहते हैं, लेकिन वे सरमिष्ठा के हाथ का बना खाना कैसे खाएंगे? ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।” कुछ लोग सरमिष्ठा की जाति का जिक्र करने से कतराते हैं।
केंद्रपाड़ा के सब-कलेक्टर अरुण कुमार नायक के अनुसार, शनिवार को गतिरोध खत्म करने के लिए हुई बैठक में ग्रामीणों ने अन्य बातों के साथ-साथ आंगनवाड़ी केंद्र के लिए एक स्थायी जगह की मांग की और उन्हें आश्वासन दिया गया कि ऐसा किया जाएगा। नायक का कहना है कि विश्वास बढ़ाने के प्रयास के तहत, अधिकारियों को सरमिष्ठा द्वारा पकाया गया खाना कराया जाएगा।
यह हमारे गांव का मामला- सरमिष्ठा
बहिष्कार जारी रहने की स्थिति में वे क्या करेंगे, इस बारे में पूछे जाने पर अधिकारी ने कहा, “अगर ग्रामीण अपना रवैया नहीं बदलते हैं, तो हम कानूनी मामलों सहित दंडात्मक कार्रवाई करेंगे।” सरमिष्ठा ने अपनी उम्मीदें कम रखी हैं, क्योंकि ग्रामीणों ने इस चेतावनी को भी नजरअंदाज कर दिया था कि अगर उनका बहिष्कार जारी रहा तो उन्हें मिलने वाली अन्य सरकारी सुविधाएं भी बंद कर दी जाएंगी। हाल ही में, दलित नेता और स्थानीय राजनेता भी सरमिष्ठा को मदद की पेशकश करने और ग्रामीणों को समझाने के लिए आ रहे हैं। हालांकि, जहां तक उसकी और उसके परिवार की बात है, 21 साल की युवती का कहना है कि वे इस मामले को कानूनी तौर पर भी आगे नहीं बढ़ाएंगे। आखिरकार, “यह हमारे गांव का मामला है।” दलित समुदाय की रसोइया, माता-पिता ने बच्चों को आंगनबाड़ी केंद्र भेजने से किया मना
