सांसद शशि थरूर ने पश्चिम एशिया युद्ध को लेकर मोदी सरकार की रणनीति का बचाव किया है। उन्होंने जोर देकर कहा है कि सरकार की चुप्पी उसकी हार नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार रणनीति है।

इंडियन एक्सप्रेस में लिखे अपने लेख में शशि थरूर ने कहा है कि जो लोग इस समय पश्चिम एशिया युद्ध में सरकार की चुप्पी को उसकी कायरता बता रहे हैं, वे कूटनीति की जटिलताओं को समझ नहीं पा रहे हैं।

शशि थरूर के मुताबिक, इस मुश्किल दौर में सभी शक्तियों के साथ संतुलन बनाए रखना जरूरी हो गया है। उनका कहना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय कानून पर नजर डालें, तो कोई भी इस युद्ध को सही नहीं ठहरा सकता। यह संप्रभुता और शांतिपूर्ण समाधान के सिद्धांतों के खिलाफ है, जिनके लिए भारत कई दशकों से खड़ा रहा है।

विदेश नीति पर क्या बोले थरूर?

उन्होंने आगे लिखा कि किसी भी देश की विदेश नीति कोई अकादमिक सेमिनार की तरह नहीं होती, जहां सिर्फ सिद्धांतों पर चर्चा हो। शशि थरूर ने अपने लेख में कुछ पुरानी घटनाओं का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि भारत ने पहले भी कई बार राष्ट्रीय हित को सिद्धांतों से ऊपर रखा है।

उन्होंने 1956 के हंगरी संकट, 1968 में चेकोस्लोवाकिया में सोवियत हस्तक्षेप और 1979 में अफगानिस्तान पर सोवियत संघ के आक्रमण का उदाहरण दिया। इन मामलों में भारत ने खुलकर आलोचना नहीं की थी, क्योंकि उस समय सोवियत संघ भारत का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता और रणनीतिक साझेदार था। ऐसे में, खुलकर न बोलना भी रणनीति का हिस्सा रहा। इसी तरह, यूक्रेन युद्ध और ईरान से जुड़े मौजूदा हालात में भी वही रणनीति लागू होती दिख रही है।

सोनिया गांधी ने क्या कहा था?

शशि थरूर की ये टिप्पणियां ऐसे समय आई हैं, जब कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने इसी मुद्दे पर सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा था कि भारत सरकार की इस मामले में खामोशी हैरान करने वाली है। उनका कहना था कि जब किसी विदेशी नेता की हत्या जैसे मामलों में भारत संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून का खुलकर बचाव नहीं करता और निष्पक्षता से पीछे हटता है, तो सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठते हैं।

सवाल तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी उठने लगे हैं। उन्होंने अब तक ईरान युद्ध पर एक लाख करोड़ से भी ज्यादा खर्च कर दिए हैं। कभी सोचा है इतने रुपये में भारत और पाकिस्तान में क्या-क्या काम हो जाते, जवाब जानने के लिए जनसत्ता की इस विशेष सीरीज का रुख करें