क्या है शरिया? जानें- तालिबान की नजर में कैसा है इस्लामिक कानूनी सिस्टम

मरियम वेब्स्टर के मुताबिक ‘शरिया’ एक अरबी शब्द है जिसका मतलब होता है ‘कुरान पर आधारित इस्लामिक कानून।’ हालांकि कुरान में बताए गए रास्तों के मतलब अलग-अलग निकाले जाते हैं।

तालिबान के खिलाफ विरोध करती अफगानी महिलाएं। फोटो- रॉयटर्स

अफगानिस्तान में जब से तालिबान ने कब्जा किया है, वहां की महिलाओं में खौफ देखा जा रहा है। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान तालिबान ने वादा किया था कि शरिया कानून के तहत महिलाओं को छूट दी जाएगी और वे कंधे से कंधा मिलाकर चल सकेंगी। बस उन्हें इस्लामिक कानून को पालन करना होगा। तालिबान ने यह भी स्पष्ट तौर पर कह दिया है कि अफगानिस्तान में लोकतंत्र नहीं होगा बल्कि शरिया कानून लागू किया जाएगा।

क्या है शरिया?
मरियम वेब्स्टर के मुताबिक ‘शरिया’ एक अरबी शब्द है जिसका मतलब होता है ‘कुरान पर आधारित इस्लामिक कानून।’ हालांकि कुरान में बताए गए रास्तों के मतलब अलग-अलग निकाले जाते हैं। एक इस्लामिक जानकार के मुताबिक शरिया अपने आप में कुरान पर आधारित वे तौर-तरीके हैं जिनपर चलकर मुसलमान इस्लाम पर अमल कर सकते हैं।

शरिया कि एक व्याख्या के मुताबिक महिलाओं को बहुत सारे अधिकार दिए जा सकते हैं लेकिन दूसरी व्याख्या कहती है कि महिलाओं को ज्यादा अधिकार देना ठीक नहीं है। कुछ जानकार यह भी कहते हैं कि महिलाओं पर पाबंदी लगाना शरिया का उल्लंघन है। इस बात को लेकर बहस चलती ही रहती है कि असल में शरिया के तहत महिलाओं को क्या दर्जा दिया गया है। अलग-अलग देश अपने हिसाब से इसकी व्याख्या करके नियम बना देते हैं।

शरिया कानून के पांच अलग-अलग स्कूल हैं। चार सुन्नी सिद्धांत हैंः हनबली, मलिकी, शफी और हनफी और एक शिया सिद्धांत है, शिया जाफरी।

अफगानिस्तान के पुराने रेकॉर्ड की बात करें तो जब तालिबान ने पहले कब्जा किया था तो महिलाओं पर काफी पाबंदियां लगा दी थीं। बुर्का जरूरी कर दिया था और महिलाओं का स्कूल-कॉलेज जाना भी बंद कर दिया गया था।

तालिबानियों की नज़र में क्या है इस्लामिक कानून?
तालिबानियों की शरिया की अपनी अलग व्याख्या है। उनके मुताबिक महिलाएं घर से निकल तो सकती हैं लेकिन अकेले नहीं। उनके साथ किसी का होना जरूरी है चाहे वह बच्चा ही क्यों न हो। महिलाओं को 12 साल से ऊपर के लड़कों और बाहर के लोगों से मिलने की इजाज़त नहीं थी।

तालिबानियों के मुताबिक इस्लाम में संगीत, नृत्य हराम है। अपने पिछले शासनकाल में उन्होंने की रेडियो स्टेशन बंद करवा दिए थे। फिल्लों की शूटिंग रोक दी गई थी। पिछले शासन में शर्तों के साथ तालिबान ने महिलाओं को शिक्षा की आजादी दी थी। हालांकि वे ऐसे कॉलेज या मदरसे में नहीं जा सकती थीं जहां पुरुष भी पढ़ते हों। जो महिलाएं नृत्या या गायन की शिक्षा लेती थीं उन्हें सख़्त सज़ा दी जाती थी।

पिछले कुछ दिनों में देखा गया है कि तालिबानी लड़ाके महिलाओं के पोस्टर पोतकर सफेद कर रहे हैं। दरअसल उनका कहना है कि महिलाओं के पोस्टर मैगजीन या होर्डिंग में नहीं छपने चाहिए। तालिबान ने महिलाओं के हाई हील पहनने पर रोक लगा दी थी और बुर्का पहनना अनिवार्य कर दिया था। तालिबानी महिलाओं को भी कड़ी सजा देते थे, जैसे भीड़ के सामने उन्हें कोड़ों से मारा जाता था। सार्वजनिक रूप से प्रताड़ित किया जाता था। कई बार तो भीड़ के बीच पत्थर से हत्या कर दी जाती थी।

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