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शारदा स्‍कैम: तृणमूल सांसद लेते थे दो करोड़ सालाना, 1500 पत्रकारों को दी थी नौकरी

घोटाले से पूर्व केंद्रीय मंत्री और तब के कांग्रेस नेता मतंग सिंह और तत्कालीन कांग्रेसी (अब भाजपा में) हेमंत बिस्वा सर्मा का भी कनेक्शन रहा है। ईडी साल 2015 में हेमंत बिस्वा सर्मा की पत्नी से शरादा समूह से पैसे लेने के मामले में पूछताछ कर चुका है।

तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष और पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी के साथ कोलकाता पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार। (फोटो- पार्थ पॉल)

पश्चिम बंगाल में पिछले दिनों सीबीआई बनाम ममता बनर्जी की लड़ाई की जड़ में शारदा स्कैम है। आरोप है कि ममता बनर्जी की पार्टी के कई सांसद-विधायक इस घोटाले में शामिल रहे हैं। आरोप तो यहां तक हैं कि ममता के एक अभिनेता रहे सांसद ने शारदा समूह से दो करोड़ सालाना  ली और करीब 1500 पत्रकारों को नौकरियां बांटी। शारदा समूह की कहानी साल 2000 के आसपास शुरू हुई थी। तब राज्य के एक व्यवसायी सुदीप्तो सेन ने शारदा समूह की स्थापना की थी और कंपनी को सिक्योरिटी मार्केट रेग्यूलेटर सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) के तहत सूचीबद्ध करा उसे सामूहिक निवेश योजना के रूप में वर्गीकृत करवाया था। इसके बाद शारदा समूह ने छोटे-छोटे निवेशकों से कम निवेश में मोटा रिटर्न देने के नाम पर पैसे की उगाही की। इसके लिए शारदा समूह ने कंपनियों का एक समूह बनाया और पोंजी योजना की तरह, एजेंटों के बड़े नेटवर्क के सहारे कम समय में 2500 करोड़ रुपये जमा कर लिए। इस काम के एवज में एजेंटों को 25% से भी ज्यादा कमीशन दिए गए थे।

कुछ ही सालों में शारदा समूह फिल्मस्टार्स को बतौर ब्रांड एम्बेस्डर लॉन्च करा एक बड़ा ब्रांड बन गया। इनके अलावा पैसे को लोकप्रिय फुटबॉल क्लबों में निवेश किया गया। शरादा समूह के स्वामित्व में कई मीडिया आउटलेट्स खड़े किए गए। दुर्गा पूजा जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रमों के प्रायोजनों में भी उस पैसे का इस्तेमाल कर समूह को बड़े ब्रांड का रूप दिया गया। धीरे-धीरे यह योजना पड़ोसी राज्यों ओडिशा, असम और त्रिपुरा तक फैल गई और समूह में निवेशकों की संख्या बढ़कर 17 लाख के करीब पहुंच गई।

इसके बाद शारदा समूह ने सेबी के नियमों का उल्लंघन करते हुए पब्लिक को सुरक्षित डिबेंचर और रिडीम (नकदी) करने योग्य बॉन्ड जारी करने लगा। सेबी के नियमों के मुताबिक बिना बैलेंस शीट जारी किए कोई भी कंपनी 50 से ज्यादा लोगों से पैसे नहीं जमा करा सकती है। इनके अलावा बैलेंस शीट के बाद कंपनी को सेबी से इसके लिए इजाजत भी लेनी होती है लेकिन शारदा समूह ने नियमों को ताक पर रखकर अवैध कागजात जारी करने शुरू कर दिए। जब सेबी ने शारदा समूह को साल 2009 में रेड सिग्नल दिया तब कंपनी ने समूह को 230 कंपनियों में बांटकर एक जटिल कॉरपोरेट संरचना खड़ी कर दी।

सेबी की नोटिस के बाद भी समूह ने आम लोगों के लिए टूरिज्म पैकेज, फॉरवर्ड ट्रैवल और होटल बुकिंग, टाइमशैयर क्रेडिट ट्रांसफर, रियल एस्टेट, इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस और मोटरसाइकिल निर्माण से जुड़ी योजनाओं के माध्यम से पब्लिक से पैसा जुटाना जारी रखा। इसके साथ ही समूह ने थोकभाव में लगभग सभी निवेशकों को 50,000 रुपये दे दिया। साल 2009 तक पश्चिम बंगाल के राजनीतिक गलियारों में शारदा समूह के कथित धोखाधड़ी और उसके तरीकों पर चर्चा जोर पकड़ चुकी थी। साल 2012 में सेबी ने बिना उसकी अनुमति के निवेशकों से पैसा लेने पर रोक लगा दिया। इसके बाद जनवरी 2013 में तब अलार्म की घंटी बजनी शुरू हुई, जब पहली बार समूह का कैश इनफ्लो अपने आउटफ्लो से कम था। किसी पोंजी स्कीम में ऐसा ही अक्सर होता है।

अप्रैल 2013 तक आते-आते शारदा समूह की निवेश योजना ध्वस्त हो गई। इसके बाद निवेशकों और एजेंटों ने बिधाननगर पुलिस स्टेशन में एकसाथ सैकड़ों शिकायतें दर्ज कराईं। शिकायत दर्ज होते ही सुदीप्तो सेन 18 पन्नों का एक पत्र लिखकर राज्य से फरार हो गया। सेन ने अपने पत्र में कई राजनेताओं पर आरोप लगाया कि उनलोगों ने हथियार के बल पर घटिया योजानाओं में निवेश कराया, इस वजह से कंपनी बैठ गई। कुछ दिनों के बाद पुलिस ने मामले में प्राथमिकी दर्ज की और सुदीप्तो सेन को 20 अप्रैल, 2013 को सोनमर्ग में सहयोगी देबजानी मुखर्जी के साथ गिरफ्तार कर लिया।

जांच के दौरान पता चला कि शारदा समूह ने दुबई, दक्षिण अफ्रीका और सिंगापुर जैसे देशों में निवेश किया है। इसके बाद तत्कालीन ममता बनर्जी सरकार ने मामले से संबंधित सभी दर्ज प्राथमिकी की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया। लगभग उसी समय, सीबीआई ने भी असम में जांच शुरू की। वहां पुलिस एफआईआर के आधार पर प्रवर्तन निदेशालय ने भी मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत केस दर्ज किए और कई लोगों को गिरफ्तार किया। इसके बाद मई 2014 में, सुप्रीम कोर्ट ने इस घोटाले की अंतर-राज्यीय प्रकृति को देखते हुए सभी मामलों को CBI को सौंप दिया। पश्चिम बंगाल पुलिस की एसआईटी, जिसने अब तक एक साल की जांच की थी, को भी कहा गया कि वो केस से जुड़े सभी कागजात, सबूत और गिरफ्तार आरोपियों के विवरण सीबीआई को सौंप दे।

सुदीप्तो सेन ने अकूत संपत्ति अर्जित करने और कंपनी की ब्रांड इमेज बनाने के बाद नेताओं से मधुर रिश्ते बनाने शुरू कर दिए थे। इसके साथ ही सेन ने कई मीडिया घरानों का अधिग्रहण किया और बांग्ला फिल्मोद्योग में भी निवेश किया। अभिनेता और तृणमूल कांग्रेस के सांसद शताब्दी रॉय और मशहूर अभिनेता और राज्यसभा सांसद मिथुन चक्रवर्ती शारदा ग्रुप के ब्रांड एम्बेस्डर थे। इसके बाद समूह ने टीएमसी सांसद कुणाल घोष को एक मीडिया समूह का सीईओ नियुक्त किया था। तब घोष को प्रति माह 16 लाख रुपये का मासिक भत्ता दिया गया था। इस मीडिया हाउस में शारदा ने 988 करोड़ रुपये का निवेश किया था 1,500 पत्रकारों को काम पर रखा था। साल 2013 तक यह मीडिया हाउस पाँच भाषाओं में आठ समाचार पत्र छाप रहा था।

टीएमसी के जिन नेताओं का संबंध शारदा समूह से जुड़ा है, उसमें तत्कालीन टीएमसी सांसद श्रींजय बोस का भी नाम शामिल है। बोस भी इस समूह के मीडिया कंपनी के परिचालन में शामिल थे। तत्कालीन पश्चिम बंगाल सरकार में परिवहन मंत्री रहे मदन मित्रा ने भी शारदा समूह के कर्मचारी संघ का नेतृत्व किया था। शारदा समूह ने राज्य के नक्सल प्रभावित इलाकों के लिए पुलिस को पैट्रोलिंग के लिए मोटरसाइकिल भी दान किए थे। सरकार ने समूह से मिले मोटरसाइकिल और एम्बुलेंस नक्सल प्रभावित इलाकों में बंटवाए थे।

शरादा समूह घोटाले से पूर्व केंद्रीय मंत्री और तब के कांग्रेस नेता मतंग सिंह और तत्कालीन कांग्रेसी (अब भाजपा में) हेमंत बिस्वा सर्मा का भी कनेक्शन रहा है। ईडी साल 2015 में हेमंत बिस्वा सर्मा की पत्नी से शरादा समूह से पैसे लेने के मामले में पूछताछ कर चुका है। एजेंसी ने टीएमसी की सांसद अर्पिता घो। से भी पूछताछ की है। इनके अलाना करीब दर्जनभर विधायकों और सांसदों से भी मामले में पूछताछ हो चुकी है। श्रींजय बोस, मदन मित्रा, कुणाल घोष, मतंग सिंह को गिरफ्तार भी कर चुकी है।

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