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Shaheed Diwas 2018: आजादी के 70 साल बाद भी नहीं मिला शहीद का दर्जा, शहीद सुखदेव के रिश्तेदार भड़के, बताया शर्मनाक

Shaheed Diwas 2018: क्रांतिकारी सुखदेव के परिजनों का कहना है कि भारत की आजादी के 70 सालों बाद भी उन्हें शहीद का दर्जा नहीं दिया गया है, इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या हो सकता है।
नाराजगी जताते हुए वीर क्रांतिकारी सुखदेव के परिजनों का कहना है कि भारत की आजादी के 70 सालों बाद भी उन्हें शहीद का दर्जा नहीं दिया गया है, इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या हो सकता है। (image source-ANI)

आज 23 मार्च के दिन ही साल 1931 में भारत के वीर सपूतों भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को लाहौर की सेंट्रल जेल में फांसी दी गई थी। पूरा देश आज के दिन भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव के बलिदान को याद कर रहा है, लेकिन हैरानी की बात है कि आजादी के 70 साल बीत जाने के बाद भी आज तक इन वीर सपूतों को सरकार की ओर से ‘शहीद’ का दर्जा नहीं दिया जा सका है। इस पर नाराजगी जताते हुए वीर क्रांतिकारी सुखदेव के परिजनों का कहना है कि ‘भारत की आजादी के 70 सालों बाद भी उन्हें शहीद का दर्जा नहीं दिया गया है, इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या हो सकता है। उन्होंने भारत के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी, लेकिन सरकार ने उनके बलिदान दिवस पर एक छुट्टी को भी मंजूरी नहीं दी है!’ भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव के परिजनों की मांग है कि इन तीनों को शहीद का दर्जा दिया जाए। इसे लेकर परिजनों ने आज दिल्ली में प्रदर्शन भी किया।

उल्लेखनीय है कि पिछले साल दिसंबर में भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को शहीद का दर्जा देने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई थी। हाईकोर्ट की बेंच ने यह कहकर याचिका खारिज कर दी कि वह ऐसा कोई निर्देश जारी नहीं कर सकती। याचिका में कहा गया था कि आजादी की लड़ाई में मारे गए लोगों को शहीद का दर्जा देना बेहद जरूरी है, ये उनका कानूनी अधिकार है। इस तरह से हम उन शहीदों के प्रति अपनी कृतज्ञता भी जाहिर कर पाएंगे।

भगत सिंह और राजगुरु ने साल 1928 में ब्रिटिश पुलिस ऑफिसर जॉन सांडर्स की लाहौर में गोली मारकर हत्या कर दी थी। इस मामले की जांच के लिए तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इर्विन ने एक विशेष आयोग का गठन किया था। इसके बाद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को लाहौर जेल में 23 मार्च 1931 को फांसी दे दी गई। तीनों महान क्रांतिकारियों की फांसी के बाद पूरे देश में अंग्रेज सरकार के खिलाफ उबाल आ गया था। तीनों क्रांतिकारी इसके बाद राष्ट्रवाद के प्रतीक बन गए। बता दें कि फांसी के वक्त भगत सिंह और राजगुरु की उम्र सिर्फ 23 साल और सुखदेव की उम्र सिर्फ 22 साल थी।

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