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..तो सॉलिसिटर जनरल ने व्हाटसएप पर फैलाई जा रही अफवाह को ही बना दिया सरकारी तर्क? और चुपचाप सुनते रहे सुप्रीम कोर्ट के जज

कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने लिखा है, "जब वो सुप्रीम कोर्ट को व्हाटसैप विश्वविद्यालय का ज्ञान दे सकते हैं, तो न्याय का क्या होगा? और सोचिए देश कैसे हाथों में है?"

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता।

प्रवासी मजदूरों की दुर्दशा पर सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों स्वत: संज्ञान लेते हुए सुनवाई शुरू की थी। इस पर केंद्र सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए। उन्होंने सुनवाई के दौरान विपक्षी वकील कपिल सिब्बल को कयामत का पैगंबर करार दिया। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि तुषार मेहता ने कोर्ट के सामने एक ऐसी कहानी बताई जो व्हाटसएप पर फैलाई गई अफवाह है। कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने लिखा है, “जब वो सुप्रीम कोर्ट को व्हाटसैप विश्वविद्यालय का ज्ञान दे सकते हैं, तो न्याय का क्या होगा? और सोचिए देश कैसे हाथों में है?” सुरजेवाला ने इसके साथ एक न्यूज लिंक भी शेयर किया है, जो ‘द वायर’ पर प्रकाशित खबर है, जिसमें सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता द्वारा सुनाई गई कहानी पर रिपोर्ट छपी है।

जजों के सामने तुषार मेहता ने कहा कि प्रवासी मजदूरों की समस्या दूर करने, उन्हें सुरक्षित तौर पर घरों तक पहुंचाने के लिए केंद्र ने बहुत सारे काम किए हैं और बहुत से कदम उठाए हैं लेकिन कुछ लोगों को नकारात्मकता के अलावा कुछ नहीं दिखता। उन्होंने कहा कि कुछ आत्ममुग्ध प्रबुद्ध लोगों को देश का विकास और प्रयास रास नहीं आता। इसी के साथ उन्होंने कोर्ट को एक फोटो जर्नलिस्ट और गिद्ध की कहानी सुनाई।

एसजी ने सुनाया, “एक फोटोग्राफर था, जो 1983 में सूडान गया था। वहां भूख से कमजोर-लाचार-बेसहारा एक बच्चा गिरा पड़ा था। उसके बगल में एक गिद्ध बच्चे के मरने का इंतजार कर रहा था। उन्होंने इसकी फोटो खींची और यह फोटो NYT में प्रकाशित हुई और फोटोग्राफर को पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्होंने 4 महीने बाद आत्महत्या कर ली। एक पत्रकार ने उनसे पूछा था- बच्चे का क्या हुआ? उन्होंने कहा कि मुझे नहीं पता, मुझे घर लौटना था। फिर रिपोर्टर ने उससे पूछा- कितने गिद्ध थे? उसने कहा- एक, तब रिपोर्टर ने कहा- नहीं। वहाँ दो गिद्ध थे। एक कैमरा पकड़े हुए था। इसके बाद फोटोग्राफर ने खुदकुशी कर ली।”

‘लाइव लॉ’ ने कोर्टरूम के इस वाकया को हू-ब-हू छापा था। अल्ट न्यूज ने फैक्ट चेक करते हुए लिखा है कि तुषार मेहता ने जो कहानी कोर्ट को सुनाई वह कुछ दिनों से पीएम मोदी के समर्थकों के व्हाटसएप ग्रुप में वायरल हो रही थी। फैक्ट चेक में पता चला कि भूख से मरते उस बच्ची की तस्वीर पहली बार 1983 नहीं, 1993 में सामने आई थी। फैक्ट के मुताबिक, यह तस्वीर पहली बार 26 मार्च, 1993 को न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी थी। जब 30 मार्च, 1993 को बच्चे के भाग्य के बारे में पूछे गए सवालों पर संपादक घिर गए, तो न्यूयॉर्क टाइम्स ने स्पष्ट किया था, “कई पाठकों ने उस लड़की के भाग्य के बारे में पूछा है। फोटोग्राफर की रिपोर्ट है कि उसने गिद्ध का पीछा किया लेकिन यह पता नहीं चल सका कि बच्ची किसी केंद्र तक पहुंची या नहीं। ” हालांकि, दुनिया भर में आलोचना झेलने से अवसाद में गई फोटोग्राफर ने बाद में 27 जुलाई 1994 को आत्महत्या कर ली थी।

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