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विशेष: स्त्री विमर्श के सात दशक

भारत में 20वीं सदी की अर्द्धशती की शुरुआत राजनीतिक और अन्य कारणों से अहम है। 1948 में महात्मा गांधी की हत्या होती है। इसी वक्त दुनिया के नक्शे पर एक और अहम कवायद होती है। सीमोन द बोउवार की किताब ‘द सेकेंड सेक्स’ छापेखाने से निकलती है और दुनिया भर की स्त्रियों को महसूस होता है कि उनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है पितृसत्ता के सिवा।

womenसीमोन के बहाने महिला विमर्श की व्याख्या

तारीख के हर्फ बदले समय में खारिज तो खैर नहीं होते, नए सवालों और संदर्भों से लैश जरूर हो जाते हैं। इस लिहाज से खास तौर पर स्त्री विमर्श के सात दशक हमें मौजूदा परिस्थिति में यह बताते हैं कि पितृसत्ता के खिलाफ संघर्ष कभी भी इकहरी नहीं हो सकता। बीते कुछ दिनों में जिस तरह की घटनाएं देश के विभिन्न हिस्सों में हुई हैं, वे भी यही जाहिर करती हैं कि मन, शरीर से लेकर भाषा और सोच तक पितृसत्ता का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष वर्चस्व हमारे समाज को आज भी नियंत्रित कर रहा है। तारीखी लिहाज से यह देखना खासा दिलचस्प है कि सात दशक पहले सीमोन द बोउवार ने स्त्री विमर्श की जो सैद्धांतिकी तय की थी, उसकी प्रासंगिकता की जमीन आज कितनी ठोस है। 

कोरोना संकट के बीच स्त्री संघर्ष और आस्मिता का सवाल फिर से सतह पर आ गया है। इस दौरान देश के अंदर और बाहर कई ऐसी घटनाएं घटीं, जो हमें यह सोचने पर विवश कर रही हैं कि आधुनिकता और विकास की चमक महिलाओं के मुद्दे पर अचनाक रोएंदार और नाखूनी क्यों हो जाती है। इस मुद्दे पर थोड़ी गहराई और धीरता के साथ विचार करें तो सवाल और संदर्भों के मौजूदा हवाले से निकलकर बात कुछ पहले से शुरू करनी होगी।

सात दशक लंबा पाठ
भारत में उन्नीसवीं सदी की अर्द्धशती की शुरुआत राजनीतिक और अन्य कारणों से अहम है। 1948 में महात्मा गांधी की हत्या होती है। इसी वक्त दुनिया के नक्शे पर एक और अहम कवायद होती है। सीमोन द बोउवार की किताब ‘द सेकेंड सेक्स’ छापेखाने से निकलती है और दुनिया भर की स्त्रियों को महसूस होता है कि उनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है पितृसत्ता के सिवा।

इस किताब में सीमोन स्त्री की पारंपरिक भूमिकाओं को कठघरे में खड़े कर उनकी आलोचना कर नई शब्दावली गढ़ती हैं। ध्यान देने की बात है कि इस वक्त तक दो विश्व युद्ध हो चुके थे। स्त्रीवाद की यह किताब युद्ध के खिलाफ भी पाठ है। विवाह और युद्ध पितृसत्ता की दो बुनियादी अवधारणा किस तरह स्त्री के खिलाफ है, यह समझने के लिए सीमोन के शब्द के साथ उनकी जिंदगी में भी झांकना होगा। इस जिंदगी में कुछ भी पारंपरिक और तयशुदा नहीं था। अगर कुछ था तो वह एक शिनाख्त या अस्मिता के तौर पर अपनी पहचान की उस सार्वभौमिकता को बचाए रखने की हसरत, जिसकी कुर्बानी महिलाओं से सबसे पहले ली जाती है।

आधी दुनिया की गुलामी
सीमोन की कहानी उनके प्रेमी सार्त्र के जिक्र के बिना अधूरी है। रिश्तों का शक्ति संबंध ही स्त्रीवाद की बुनियाद है। सीमोन ने सार्त्र के साथ शादी नहीं की थी। वे एक ही होटल में अलग-अलग मंजिल पर रहते थे। घूमने-पढ़ने और लिखने का अनोखा साथ। 1947 में सीमोन ने ‘द सेकेंड सेक्स’ पर काम करना शुरू किया। इसकी अनुवादक प्रभा खेतान ने अपनी किताब की भूमिका में लिखा है कि इसकी पांडुलिपि पढ़ते हुए सार्त्र ने कई जगह पर पुरुषों पर लगाए गए एकतरफा आरोपों को काटा।

यह किताब 1949 में प्रकाशित होती है। प्रभा खेतान के मुताबिक शुरू में सीमोन खुद को नारीवादी यानी पुरुषों के बीच स्त्री की स्वाभाविक स्थिति या यूं कहिए कि स्त्री के बुनियादी अधिकारों का समर्थक नहीं मानती थी। मगर वक्त के साथ उन्हें समझ आने लगा कि यह ‘आधी दुनिया’ की गुलामी का सवाल है। वो मानती हैं कि अमीर-गरीब, हर जाति और हर देश की महिला जकड़ी हुई है। स्त्री की समस्या साम्यवाद से भी नहीं सुलझ सकती।

विमर्श और हश्र
20वीं सदी के अर्द्धदशक में आई ‘स्त्री उपेक्षिता’ नारीवाद की अनिवार्य पाठ्यपुस्तक की तरह है। दुनिया भर में नारीवादियों ने इस किताब को अपने शोध अध्ययन का विषय बनाया। आज सत्तर साल बाद भारत स्त्रीवाद को लेकर कहां खड़ा है? जब तक खैरलांजी, गोहाना, मिर्चपुर, हाथरस जैसी बर्बरता कानों के सामने आकर नगाड़ा नहीं बजाती है तब तक हम सिर्फ विकास दर, आयात-निर्यात और विदेशी निवेश पर बात करते रहते हैं। फिर अचानक से आधी रात के बाद एक बलात्कार पीड़िता का शव जला दिया जाता है तो हम पुलिस सुधार के साथ घरेलू हिंसा बढ़ने पर भी बहस कर लेते हैं। हमारा संविधान और स्त्रीवाद की किताब ‘द सेकेंड सेक्स’ दोनों एक ही दौर की देन है। अगर आज हम संविधान के सत्तर साल के हासिल को देखेंगे तो उसमें जेंडर का पक्ष सबसे अहम हो जाता है।

यौनिक अलगाव
सीमोन की किताब के योगदान को सूत्रवाक्य में देखें तो स्त्रियों को लेकर हमारी समझदारी अब उस तार्किक समझ के आधार पर तय हो रही है कि इसे और किसी चीज से जोड़ने की जरूरत नहीं है। यह यौनिक नहीं लैंगिक अलगाव है। संविधान के दायरे में हमारे सामने 70 साल का जेंडर विमर्श है। इस सत्तर साल के जेंडर विमर्श के पहले औपनिवेशिक साम्राज्यवाद और दो विश्वयुद्ध ने दुनिया की राजनीति, संस्कृति और बाजार को एकध्रुवीय बनाने की कोशिश की। इससे पहले औपनिवेशिक साम्राज्यवाद, शीतयुद्ध, विश्वयुद्ध से लेकर भूमंडलीकृत बाजार तक के किसी भी दौर में महिला को हमेशा एक ऐसे उपकरण के तौर पर देखा गया जो सामान्य मानवीय अस्मिता से हमेशा कमतर रही है।

शब्द, धारणा और भाषा
सीमोन द बोउआर की किताब लोकप्रिय होने के बाद ‘सेक्स’ और ‘जेंडर’ की अलग-अलग व्याख्या हुई कि दोनों एक शब्द नहीं हैं। पितृसत्ता की बुनियाद ‘सेक्स’ नहीं ‘जेंडर’ के आधार पर खड़ी होती है। सीमोन का विमर्श यही है कि ‘जेंडर’ प्राकृतिक नहीं बल्कि सामाजिक निर्मिति है। स्त्री पैदा नहीं होती है, बनाई जाती है। यह हम समाज और राजनीति के हर बिंदु पर देखेंगे।

भाषा विज्ञान की बात करें तो उसमें भी स्त्री को कमतर समझने वाला समाज शामिल है। कोई भी ऐसी संज्ञा नहीं है जिसका ‘जेंडर’ नहीं है। ‘जेंडर’ के आते ही शब्द या तो स्त्रीलिंग, पुल्लिंग या नपुंसकलिंग होता है। ‘सेक्स’ और ‘जेंडर’ को एक-दूसरे से नत्थी कर सामाजिक और सांस्कृतिक धारणाओं और पूर्वग्रह के तहत स्त्रीलिंग की बनावट कर ली जाती है। पहाड़, पहाड़ी, समुद्र, नदी, यानी जो विशाल और ताकतवर है उसमें पौरुष है। जो ‘सुंदर’ और कोमल है उसमें स्त्री है।

समाज की पूरी सोच भाषा तक पहुंचती है। यही सोच लिंग को भी नियंत्रित करती है जिसका संदर्भ ‘सेक्स’ से है। यह यौनिक रिश्ते को भी नियंत्रित करती है। यहीं से बात शक्ति संबंध की आती है। जितने भी सामाजिक, पारिवारिक और निजी संबंध हैं उनमें किसी न किसी तरह का शक्ति संबंध होता है।

सवाल है कि यह शक्ति संबंध कैसा हो? यह शक्ति संबंध दो ही तरह का हो सकता है-बराबरी या गैरबराबरी का। मुंह काला करना, इज्जत लूटना जैसे शब्द अभी भी प्रचलित हैं, जो स्त्री को सिर्फ यौनिक शुचिता के दायरे में बांधने का शातिर खेल है।

सवाल नजरिए का
हालिया कुछ घटनाओं के बाद नारीवादियों ने सीधे सवाल किए कि स्त्री का बलात्कार हुआ की जगह पुरुष ने बलात्कार किया का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा सकता है। भारी जनदबाव के बाद सरकारी बयान आया- ‘उत्तर प्रदेश में माताओं-बहनों के सम्मान और स्वाभिमान को क्षति पहुंचाने का विचार रखने वालों का समूल नाश सुनिश्चित है’। सत्ता की यह भाषा स्त्री को सिर्फ पुरुष संरक्षित रिश्ते तक सीमित कर देती है।

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