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अनिल देशमुख मामलाः कपिल सिब्बल ने ऑफ किया वीडियो तो जज बोले- लगता है चले गए, हरीश साल्वे का तंज- उनकी दलीलों से सिस्टम भी क्रैश हुआ

सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल कुछ देर के लिए स्क्रीन पर नहीं दिखे। वे उस दौरान अपना तर्क रखने के लिए एक पुराने फैसले का अध्ययन कर रहे।

Anil Deshmuk Case, Supreme Courtकांग्रेस नेता और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिबल। (फोटो- एपी फाइल)

महाराष्ट्र के पूर्व गृह मंत्री अनिल देशमुख पर लगे वसूली के गंभीर आरोपों की सीबीआई जांच को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को वर्चुअल सुनवाई हुई। इस दौरान अनिल देशमुख का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने जांच को गैरजरूरी बताते हुए कई तर्क रखे। हालांकि उनके तर्क पर कोर्ट ने असहमति जताते हुए सीबीआई जांच रोकने की मांग खारिज कर दी।

सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल कुछ देर के लिए स्क्रीन पर नहीं दिखे। वे उस दौरान अपना तर्क रखने के लिए एक पुराने फैसले का अध्ययन कर रहे। इस पर मामले की सुनवाई कर रही बेंच के प्रमुख न्यायमूर्ति एसके कौल ने कहा, “वे शायद चले गए हैं।” उनकी बात पर वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने चुटकी ली, कहा उनकी दलीलें सुनकर सिस्टम भी क्रैश हो गया। हालांकि थोड़ी देर बाद ही वरिष्ठ अधिवक्ता अपनी दलीलों के साथ फिल से स्क्रीन पर आ गए।

कोर्ट में महाराष्ट्र के पूर्व गृहमंत्री अनिल देशमुख की तरफ से पक्ष रखते वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि मामले में कोई भी कार्रवाई होने से पहले हमें भी सुना जाना चाहिए था। कहा कि 100 करोड़ वसूली का आरोप बिना किसी ठोस आधार के लगाए गए हैं। इसलिए इसकी सीबीआई से जांच गैरजरूरी है।

इस पर कोर्ट ने कहा कि किसी भी मामले में एफआईआर आरोपी से पूछकर नहीं लगाए जाते हैं। आरोप ऐसे व्यक्ति का है, जो गृह मंत्री का विश्वासपात्र था। अगर ऐसा नहीं होता तो उसे कमिश्नर जैसा बड़ा पद नहीं मिलता। यह कोई राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का केस नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि मामले की जांच किस एजेंसी से कराई जाए यह आप नहीं तय कर सकते हैं।

इससे पहले बॉम्बे हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति जीएस कुलकर्णी की खंडपीठ ने सोमवार को CBI से कहा था कि वह पिछले महीने पूर्व मुंबई पुलिस आयुक्त की ओर से जारी लेटर बम में उठाए गए मुद्दों पर 15 दिनों के भीतर अपनी प्रारंभिक जांच पूरी करे। फैसले के कुछ ही घंटे बाद देशमुख ने अपना पद छोड़ दिया था।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा था कि मामले में स्वतंत्र एजेंसी की जांच नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा और लोगों में विश्वास पैदा करने के लिए जरूरी है।

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