“UAPA, राजद्रोह की धारा असंवैधानिक”, पूर्व जजों ने दी राय- दुरुपयोग रोकने के हों सख्त उपाय

बकौल जस्टिस लोकुर, “अब…सॉफ्ट टॉर्चर जैसी कुछ चीज है। हम थर्ड और सेकेंड डिग्री टॉर्चर के तरीके जानते हैं, पर आपके पास सॉफ्ट टॉर्चर भी है।”

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महाराष्ट्र के पुणे में यूएपीए वापस लेने की मांग करते हुए ऐक्टिविस्ट और प्रदर्शनकारी। (एक्सप्रेस आर्काइव फोटोः अतुल हॉरिजन)

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जजों ने अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन ऐक्ट (यूएपीए) और राजद्रोह की धारा को असंवैधानिक करार दिया है। उनका कहना है कि इन कानूनों का दुरुपयोग रोकने के लिए सख्त उपाय किए जाने चाहिए।

ऐसे सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जजों में जस्टिस मदन बी लोकुर, जस्टिस आफताब आलम, जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस वी गोपाल गौड़ के साथ पटना हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अंजना प्रकाश हैं। शनिवार (24 जुलाई, 2021) को सेंटर फॉर ज्यूडीशियल अकाउंटिबिलिटी एंड रिफॉर्म द्वारा आयोजित वेबिनार में उन्होंने यूएपीए और राजद्रोह कानून पर अपनी राय जाहिर की।

टॉप कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मदन बी लोकुर और चिंता संदेह जताया कि क्या देशद्रोह और आतंकवाद से निपटने वाले एक खंड और कानून को पूरी तरह से खत्म कर दिया जाएगा? हालांकि, उन्होंने इनके दुरुपयोग से बचाने के उपाय सुझाए।

वह बोले, “यह कहना अच्छा है कि यूएपीए, देशद्रोह कानून जाना चाहिए। लेकिन जैसा कि मैंने कहा, मुझे नहीं लगता कि ये जाने वाले हैं। संभवतः नेशनल सिक्योरिटी ऐक्ट (एनएसए) का अब इस्तेमाल किया जाएगा। ऐसे में लोग स्थितियों का सामना कैसे करेंगे? एक ही तरीका है- जवाहदेही। यह दो तरह से हो सकती है। पहली- वित्तीय जवाबदेही, जहां मुआवाजा दिया जाना चाहिए। एक बार जब अदालतें, पुलिस या अभियोजन पक्ष से यह कहना शुरू कर दें कि आप बेहतर तरीके से पांच या 10 लाख रुपये का भुगतान करें, तो मुझे लगता है कि वे शायद अपने होश में आ जाएंगे।”

बकौल जस्टिस लोकुर, “अब…सॉफ्ट टॉर्चर जैसी कुछ चीज है। हम थर्ड और सेकेंड डिग्री टॉर्चर के तरीके जानते हैं, पर आपके पास सॉफ्ट टॉर्चर भी है।”

जस्टिस लोकुर ने कैदियों से ठसाठस भरी जेलों, वहां साफ-सफाई के न होने और नाबालिगों के लिए पर्याप्त भोजन की कमी का हवाला उदाहरण के तौर पर दिया। कहा, आपके पास हनी बाबू (दिल्ली विवि के शिक्षक, जो मुंबई की जेल में हैं) जैसे लोग हैं, जिनकी आंख की स्थिति बड़ी खराब हालत में है। ऐसा लगता है कि वह अपनी आंख खो देंगे, तभी उन्हें अस्पताल भेजा जाएगा, पर उससे पहले कुछ नहीं होगा। स्टैन स्वामी के बारे में हर किसी ने बात की। पर उन्हें पहले इलाज क्यों नहीं मिला? क्या यह टॉर्चर नहीं है?

जस्टिस आलम ने एनसीआरबी आंकड़ों का हवाला दिया और कहा कि यूएपीए सजा देने के बजाय बेगुनाह लोगों को परेशान करने वाला साबित हुआ है। उनके अनुसार, “2019 में 2361 यूएपीए केस पेडिंग थे। 33 मामलों में 113 को दोषी करार दिया गया, जबकि 64 केस में बरी हुए और 16 केस में डिस्चार्ज किए गए। मामलों के निपटारे की दर कम और पेडिंग की अधिक दर के साथ, भले ही मामला विफल हो जाए, आरोपी आठ या 13 साल बाद भी कैद से बाहर आ सकता है…। मामला बनता नहीं, पर आरोपी को भुगतना पड़ता है।”

जस्टिस गुप्ता का कहना था कि यहां तक कि आईपीसी (राजद्रोह) के सेक्शन 124ए को खत्म कर दिया जाना चाहिए। उन्होंने इसके साथ ही यूएपीए को असंवैधानिक बताया।

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