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दूसरी नज़र : ओआरओपी की रहस्यकथा

एक दूसरी रहस्य-कथा, जो हमें दिखाई जा रही है वह समान रैंक समान पेंशन (ओआरओपी) की है। वास्तव में, इसमें रहस्य की कोई बात नहीं है। सारे तथ्य रिकॉर्ड में और दस्तावेजों में दर्ज हैं...

एक दूसरी रहस्य-कथा, जो हमें दिखाई जा रही है वह समान रैंक समान पेंशन (ओआरओपी) की है। वास्तव में, इसमें रहस्य की कोई बात नहीं है। सारे तथ्य रिकॉर्ड में और दस्तावेजों में दर्ज हैं। मगर श्रेय लेने की आपाधापी में (और आलोचना को खारिज करने के लिए) ओआरओपी को रहस्य में लिपटे एक बड़े विवाद की तरह पेश किया जा रहा है।

सही तथ्य:

हमें सही तथ्य पता होने चाहिए। भारतीय सेनाएं स्वैच्छिक भर्ती पर आधारित सैन्यबल हैं; वे अनिवार्य या जबरन भर्ती की देन नहीं हैं। सिपाही या अधिकारी के रूप में पुरुष और स्त्रियां अनेक वजहों से सेना में भर्ती होते हैं, जिनमें रोजगार की सुरक्षा भी शामिल है। हालांकि सेना की नौकरी पक्की होती है, पर यह ऐसी नौकरी नहीं होती जो काम करने की पूरी उम्र तक कायम रहे। कोशियारी समिति की रिपोर्ट के मुताबिक पचासी फीसद फौजी अड़तीस साल और अन्य दस फीसद फौजी छियालीस साल की उम्र तक सेवानिवृत्त हो जाते हैं। इसके बाद उन्हें जीवनयापन के लिए काफी बरसों तक काम करना पड़ता है, पर सेवानिवृत्ति के बाद रोजगार की कोई गारंटी नहीं होती।

जल्दी सेवानिवृत्ति फौज को जवान और लड़ने में सक्षम बनाए रखने के लिए जरूरी है। लिहाजा, सम्मानजनक पेंशन एक आवश्यक तकाजा है। नई भर्तियों को आकर्षित बनाने के उद््देश्य से भी यह बात मायने रखती है, पर इसकी ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। सेना में क्षरण और पद-रिक्ति की दर इतनी ज्यादा है कि अगर उसे स्वैच्छिक भर्ती पर टिकाए रखना है तो यह जरूरी है कि संतुलित अनुपात में नई भर्तियां होती रहें। सम्मानजनक पेंशन का वादा नई भर्ती का अहम आधार है।

ओआरओपी सम्मानजनक पेंशन का मसला है। इसकी खूबियों और खामियों पर बहस का वक्त बीत चुका है। इस बारे में निर्णय यूपीए सरकार ने लिया था, जिसे राजग सरकार ने दोहराया। श्रेय दोनों को जाता है।

कुछ और निर्विवाद तथ्य: पिछले साल सत्रह फरवरी को वर्ष 2014-15 के लिए अंतरिम बजट पेश करते हुए मैंने कहा था: ‘‘यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान रक्षा सेवाओं से ताल्लुक रखने वाली पेंशन से संबंधित नियमों में तीन बार परिवर्तन अधिसूचित किए गए- 2006, 2010 और 2013 में। नतीजतन, 2006 से पहले और उसके बाद सेवानिवृत्त हुए फौजियों की चार श्रेणियों- हवलदार, नायब सूबेदार, सूबेदार और सूबेदार मेजर- में पेंशन संबंधी अंतराल काफी कम हो गए… इसलिए सरकार ने तय किया है कि अब सभी सेवानिवृत्त श्रेणियों में यह अंतराल पाटा जाए। मुझे यह घोषणा करते हुए खुशी हो रही है कि सरकार ने सेना के लिए समान रैंक समान पेंशन के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया है।’’

ओआरओपी क्या है:
पिछले साल छब्बीस फरवरी को रक्षा मंत्रालय ने ओआरओपी को परिभाषित किया और निम्नलिखित परिभाषा सेना के तीनों अंगों के प्रमुखों को भेजी गई:

‘‘ओआरओपी का अर्थ है समान सेवा अवधि के बाद समान रैंक से सेवानिवृत्त होने वाले फौजियों को समान पेंशन। उनके अवकाश ग्रहण करने की तारीख से इसका कोई लेना-देना नहीं है। और भविष्य में पेंशन में होने वाली बढ़ोतरी अपने आप उन पर भी लागू होगी, जो पहले सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इसका मतलब है कि पेंशन के नए लाभार्थियों और पहले के पेंशनयाफ्ता लोगों के बीच की खाई कम होगी। फिर, भविष्य में पेंशन में होने वाली वृद्धि का लाभ पहले के पेंशनयाफ्ता लोगों को भी मिलेगा।

चार पेज, बारह पैराग्राफ के इस पत्र ने संदेह की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी कि क्या किया जाना था। शर्तें, प्रक्रियाएं और क्रियान्वयन के तरीके विस्तार से बताए गए थे। इसके लिए 22 अप्रैल, 2014 को महा रक्षा लेखा नियंत्रक की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई, जिसे क्रियान्वयन के वित्तीय भार का विस्तृत हिसाब लगाने का काम भी सौंपा गया। यह बात विशेष रूप से कही गई कि चूंकि ओआरओपी की खातिर काफी खर्च आने का अनुमान है, इसलिए अतिरिक्त आबंटन की जरूरत पड़ेगी।

यह बार-बार कहा गया कि अंतरिम बजट में इस बाबत केवल पांच सौ करोड़ रुपए की व्यवस्था की गई। जैसा कि मैंने कहा, यह एक आनुमानिक व्यवस्था थी, और आबंटित राशि ओआरओपी के वादे के प्रति यूपीए सरकार की गंभीरता को जाहिर करती थी। अरुण जेटली ने 10 जुलाई 2014 के अपने बजट भाषण में इस वादे को दोहराया, लेकिन उन्होंने कितनी राशि मुहैया कराई? उन्होंने कहा, ‘इस साल की जरूरत पूरी करने के लिए हम और एक हजार करोड़ रुपए प्रस्तावित करते हैं।’

फिर, सरकार अगर-मगर क्यों कर रही है? सरकार क्यों अस्वीकार्य शर्तें जोड़ रही है, जो पिछली और वर्तमान, दोनों सरकारों की ‘प्रतिबद्धता’ को लचर बनाती हैं?

आपत्तियों को खारिज करें:

विवाद के बिंदु केवल नौकरशाही की अड़ंगेबाजी और एतराजों से निपटने में सरकार की नाकामी की वजह से हैं। किया गया वादा तमाम आपत्तियों से ऊपर है, अगर कुछ आपत्तियां जायज लगें तो भी। वादा ओआरओपी को एक अप्रैल 2014 से लागू करने का था, न कि एक जुलाई 2014 से। वादा समान सेवा-अवधि के साथ समान रैंक से सेवानिवृत्त होने वाले फौजियों को समान पेंशन देने का था, न कि समान पेंशन मंजूर करने में सेवानिवृत्ति की वजह पर गौर करने का। वादा भविष्य में पेंशन में होने वाली बढ़ोतरी का लाभ अपने आप पूर्व के पेंशनयाफ्ता फौजियों को देने का था, न कि हर पांच साल बाद समायोजन का।

दरअसल, ओआरओपी एक परिभाषित लाभ है, और यह राष्ट्रीय पेंशन व्यवस्था (एनपीएस) से भिन्न है, जो कि अंशदान आधारित योजना है। एक फौजी, जिसका सेवा-काल छोटा होता है, अपनी नौकरी के दौरान इतना अंशदान नहीं कर सकता कि उसके बल पर सम्मानजनक पेंशन पा सके। इसलिए ओआरओपी औचित्यपूर्ण है।

ओआरओपी को लागू करने की जो भी लागत आए उसकी व्यवस्था की जानी चाहिए। वर्ष 2010-11 में रिजर्व बैंक ने 15,009 करोड़ रुपए की अतिरिक्त राशि सरकार को हस्तांतरित की थी। किसने सोचा था कि रिजर्व बैंक 2015-16 में 65,896 करोड़ रुपए हस्तांतरित करेगा? अगर इरादा पक्का हो, तो रास्ता निकाला जा सकता है।

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