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‘नेटिविस्ट’ विधान को समाप्त कर देना चाहिए

डिप्टी एसोसिएट एडिटर उदित मिश्रा द्वारा संचालित ‘द इंडियन एक्सप्रेस थिंक माइग्रेशन’ शृंखला के दूसरे संस्करण में, पैनलिस्ट ने नेटिविस्ट नीतियों और प्रवासियों को राजनीतिक आवाज देने के तौर-तरीकों पर बातचीत की।

The Indian Express Think Migration Seriesद इंडियन एक्सप्रेस थिंक माइग्रेशन श्रृंखला के दूसरे संस्करण में पैनलिस्ट ने नेटिविस्ट नीतियों और प्रवासियों को राजनीतिक आवाज देने के तरीके पर बात की।

प्रवासियों पर लॉकडाउन का प्रभाव
चिन्मय तुम्बे : प्रवासियों के घर वापस जाने की अवधारणा हर महामारी का सबसे शैलीगत तथ्य है और इसलिए यह एक पहेली है कि शीर्ष-स्तरीय नीति निर्माण के समय इस पर विचार क्यों नहीं करते हैं। मैं आपको इतिहास से दो उदाहरण दूंगा। सबसे पहले, सन् 1911 में जब चीनी अधिकारियों (न्यूमोनिक प्लेग के दौरान) ने प्रवासी श्रमिकों के लिए रेल मार्ग बंद कर दिए। जब चीनी श्रमिकों को घर वापस जाना पड़ा तो एक पूर्ण मानवीय संकट उत्पन्न हो गया और सर्दी का मौसम होने के कारण उनमें से अनेक की मृत्यु हो गई। दूसरा उदाहरण हमारे अपने इतिहास से है जब 1890 में प्लेग से मुंबई त्रस्त हो गई थी। अंग्रेजों को यह भली-भांति ज्ञात था कि वे लोगों को घर वापस जाने पर अंकुश नहीं लगा पाएंगे, इसलिए उन्होंने विशेष गाड़ियों की व्यवस्था की। किसी भी नीति निर्माता को दो बातों का ध्यान रखना पड़ता है-न चाहते हुए भी हम प्रवासी श्रमिकों को जल्दी से जल्दी घर वापस कैसे पहुंचाएं, क्योंकि विषाणु के संक्रमण का फैलाव रोकना है। दूसरे, असीमित सामाजिक सुरक्षा को सुनिश्चित करने की जरूरत, जो कम से कम कुछ महीनों के लिए तो हो?

प्रिया देशिंगकर : घर वापसी करने वाले अनेक प्रवासी राज्य द्वारा प्रदत्त लाभ से वंचित रह गए। वे यह साबित नहीं कर सके कि वे पात्र लाभार्थी थे, उनके पास उचित दस्तावेज नहीं थे। वे यह साबित नहीं कर सके कि वे अंतरराज्यीय प्रवासी कामगार अधिनियम के तहत पंजीकृत थे। सूरत में लगभग दो मिलियन प्रवासी कामगार हैं और केवल 7,000 कामगार ही इस अधिनियम के तहत पंजीकृत हैं।

सत्यजीत राजन : जब तक भारतवासी इस तथ्य को स्वीकार नहीं करते हैं कि हम एक राष्ट्र हैं, तब तक यह राष्ट्रवाद नहीं चलेगा। राज्य प्रवासी श्रमिकों की देखभाल केवल इसलिए करने में सक्षम नहीं हुए क्योंकि वे कभी भी राज्यों के लिए महत्त्वपूर्ण नहीं रहे। अंतरराज्यीय प्रवासी कामगार अधिनियम, 1981 में आया और इसे महसूस करने में राज्यों को 40 साल लग गए।

The Indian Express Think Migration Series

नौशाद फोर्ब्स : हमने हरियाणा और झारखंड में जो विशेष कानून देखा है, वह वास्तव में नेटिविस्ट है और कारगर नहीं है। मुझे झारखंड विधान (झारखंड राज्य स्थानीय अभ्यर्थी रोजगार विधेयक, 2021) समझ में नहीं आया, जबकि यह देश के बाकी हिस्सों में प्रवासी श्रमिकों की आपूर्ति करने वाला एक बहुत बड़ा राज्य है। कौशल से युक्त झारखंड निवासी जो झारखंड में नहीं हैं, आप चाहते हैं कि वे यहां आएं क्योंकि वे स्थानीय स्तर पर अधिक रोजगार पैदा करेंगे और यदि आपके पास रोजगार से ज्यादा लोग हैं, तो आप चाहेंगे कि वे कहीं और काम करें और धन कमाकर भेजें। यह उस तरह का कानून है जिस पर सुप्रीम कोर्ट को प्रहार करना चाहिए और मेरे विचार से ऐसा ही होगा।

चिन्मय तुम्बे : झारखंड सरकार, जिसे वास्तव में झारखंड के बाहर अपने स्वयं के लाखों श्रमिकों के कल्याण के लिए प्रयास करना चाहिए, स्थानीय लोगों के लिए नौकरियों में 75 फीसद आरक्षण प्रदान करके आरक्षण नीति को बढ़ावा दे रही है, जो पर्याप्त उत्पादक है।

प्रवासी कामगारों की राजनीतिक आवाज पर
यामिनी अय्यर : पूर्णबंदी की चरम स्थिति के दौरान भी, वंदे भारत की उड़ानें लगातार जारी थीं। हमने अपने आंतरिक प्रवासी श्रमिकों के लिए ऐसा नहीं किया। यह प्रासंगिक है, क्योंकि यह मायने रखता है कि एक वर्ष बाद बजटीय दृष्टिकोण से भी केंद्र और राज्य दोनों ने इस समस्या का समाधान कैसे चुना। ग्रामीण (भारत) एक राजनीतिक आवाज है इसलिए उसके लिए कुछ हद तक अवसंरचनाएं तैयार की गईं, लेकिन शहरी कामगार, अनौपचारिक कामगार, जो कि आकस्मिक रूप से प्रवासी कामगार भी हैं, उनके साथ राजनीतिक आवाज नहीं है।

सत्यजीत राजन : कोई राज्य किसी भी चीज पर अपना पैसा तभी लगाना चाहता है जब उनके पास पैसा होता है। दुर्भाग्य से, इन लोगों के पास राजनीतिक आवाज नहीं है। तो हमें क्या करना चाहिए? हमें उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए, हमें उन्हें नए स्थान पर मतदाता बनने के लिए प्रशिक्षित करना चाहिए। इस तरह से वे समाज का हिस्सा बन जाते हैं, और उनके पास एक आवाज भी होगी।

प्रवासन उत्तम क्यों हैं?
नौशाद फोर्ब्स : प्रवासन वह है जिसमें आप वास्तव में एक बाजार के रूप में काम करते हैं, जहां लोग रोजगार के कम अवसर वाले स्थानों से रोजगार के अधिक अवसर वाले स्थानों की ओर जाते हैं, जहां प्रत्येक का जीवन बेहतर होता है, और परिणामस्वरूप, प्रवासी स्थानीय व्यक्तियों से संख्या में कम होते हैं अर्थात बराबर संख्या से कम।

राज्य सरकारें क्या कर रही हैं?
यामिनी अय्यर : आपको गंतव्य और स्रोत राज्यों के बीच अंतर करना होगा। कुछ अर्थों में, स्रोत राज्यों में धन एक प्रमुख मुद्दा है और गंतव्य राज्य में यह नहीं है। यदि केंद्र और राज्य एक साथ समन्वित अंदाज में काम करने में सक्षम हों तो धन की समस्या उतनी नहीं है। समस्या को दृश्यमान बनाना महत्त्वपूर्ण है, लेकिन उस दृश्यता पर कार्य करने के लिए संस्थागत वातावरण बनाना और भी महत्त्वपूर्ण है।

प्रवासी श्रमिक नीति का मसौदा
प्रिया देशिंगकर : मसौदा नीति का स्वागत और जश्न मनाने के अनेक कारण है। लेकिन मुझे लगता है कि यह बहुत कुछ राजनीतिक है क्योंकि यह वास्तविक राजनीतिक अर्थव्यवस्था को प्रतिबिंबित नहीं करता है कि प्रवासियों को कैसे रोजगार दिया जाता है, उनके अनुभव क्या हैं, श्रमिकों की भर्ती कैसे की जाती है, उन्हें उद्योग के भीतर कैसे रखा जाता है, और क्यों कुछ प्रकार की नौकरियों में विशेष प्रकार के प्रवासियों को प्राथमिकता दी जाती है। यह नेटिविस्ट नीति के प्रश्न से भी जुड़ा है जिसकी अंतर्निहित धारणा यह है कि हम अपने स्वयं के श्रमिकों को अपने राज्य में रखना चाहते हैं ताकि वे हमारी स्वयं की अर्थव्यवस्था में योगदान कर सकें। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह कारगर होगा? एक और बात यह कि मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि लैंगिक मुद्दा नीति की एक कमजोर कड़ी थी।

सत्यजीत राजन
अतिरिक्त मुख्य सचिव (श्रम एवं कौशल), केरल
डेढ़ महीने तक कोविड-19 का आघात झेल लेने वाले प्रवासी कामगारों को पूर्णबंदी की तैयारी के लिए या उन्हें घर जाने का समय नहीं देने और फिर उन्हें घर जाने के लिए कहने का निर्णय, अत्यन्त बुरा और कठोर था।

यामिनी अय्यर
अध्यक्ष एवं मुख्य अधिशासी, नीति अनुसंधान केंद्र
राजकोषीय परिषद की तात्कालिकता का महत्त्व अनेक लोगों द्वारा दुहराया गया। लेकिन यदि हम राज्यों को प्रवासी श्रमिकों के सामाजिक संकट का पर्याप्त रूप से समाधान करने में सक्षम बनाने हेतु राजकोषीय स्थान सृजित करने में सक्षम होना चाहते हैं तो इसकी आवश्यकता राज्य स्तर पर भी है।

चिन्मय तुम्बे
प्रोफेसर, आइआइएम-अहमदाबाद
हमारे पास वास्तव में कुछ ऐसे विभाग हैं जो विशेष रूप से प्रवासियों की समस्या पर विचार करते हैं, लेकिन अधिकतर उनका संबंध अंतर्राष्ट्रीय प्रवासियों से है। इस महामारी से आंतरिक प्रवासियों के स्रोत क्षेत्र जो कि पांच या छ: भारतीय राज्य हैं, में ऐसे विभागों की आवश्यकता का अनुभव किया गया।

शिल्पा कुमार
पार्टनर, ओमिड्यार नेटवर्क, भारत
गत वर्ष से अनेक प्रमाण मिले हैं कि प्रवासन का अत्यन्त महत्त्व है। और फिर भी, जब हम प्रतिक्रिया देखते हैं तो प्रत्येक के लिए देश भर में इससे भी अधिक सामाजिक सुरक्षा की आशा की गई है।
जैसा कि हम कोविड-19 की दूसरी लहर को देखते हैं तो यह उस अधूरे एजंडे को पूरा करने और उसके समाधान के विषय में कार्य करने का उपयुक्त समय प्रतीत होता है।

प्रिया देशिंगकर
प्रोफेसर, ससेक्स विश्वविद्यालय
जब विलंब से सरकारी सहायता की घोषणा की गई तो प्रवासी श्रमिकों तक इसे पहुंचा पाना संभव नहीं था। यह ऐसी भयानक स्थिति थीं, जहां सार्वजनिक तौर पर अनेक लोग मदद के लिए बेताब थे, लेकिन वे इसे प्राप्त करने में असमर्थ थे। यहां तक कि सरकार को भी हानि थी क्योंकि उसके पास यह डाटा नहीं था कि कौन कहां से था।

नौशाद फोर्ब्स
सह-अध्यक्ष, फोर्ब्स मार्शल और पूर्व अध्यक्ष, सीआइआइ
दीर्घकाल में अपने परिवार सहित लोगों का शहरों की ओर पलायन होना तथा शहरी नागरिक बनना ही विकास का स्वरूप होने वाला है। इसके साथ ही, उनके राजनीतिक अधिकार भी उन्हें प्राप्त होने चाहिए और मतदान का अधिकार भी।

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