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जलवायु परिवर्तन से बदल रही पृथ्वी की धुरी

जलवायु परिवर्तन और तापमान में हो रही वृद्धि के चलते दुनिया भर में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिसका असर पृथ्वी की धुरी पर पड़ रहा है और उसके झुकाव में वृद्धि हो रही है।

Climateसांकेतिक फोटो।

जलवायु परिवर्तन और तापमान में हो रही वृद्धि के चलते दुनिया भर में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिसका असर पृथ्वी की धुरी पर पड़ रहा है और उसके झुकाव में वृद्धि हो रही है। पृथ्वी के ध्रुवों में जो संतुलन है वो अस्थिर हो रहा है। पृथ्वी पर उत्तर और दक्षिण दोनों ध्रुवों की स्थिति कभी भी स्थिर नहीं रहती है वो लगातार बदलती रहती है। पृथ्वी इन दोनों ध्रुवों को जोड़ने वाली एक अदृश्य रेखा के सहारे घूमती रहती है, जिसे पृथ्वी की धुरी या अक्ष कहा जाता है।

वैज्ञानिक पहले इसके लिए केवल प्राकृतिक कारकों जैसे महासागरीय धाराओं और पृथ्वी के भीतर गर्म चट्टानों और उनके पिघलने को ही वजह मानते थे। हालांकि सभी कारणों के बारे में तो वैज्ञानिक नहीं जानते पर हाल ही में किए शोध के अनुसार, 1990 के बाद से जिस तरह से धरती पर ग्लेशियरों में जमा करोड़ों टन बर्फ पिघल रही है। उनसे पृथ्वी के द्रव्यमान का जो वितरण है, उसमें बदलाव आ रहा है। इसका असर इसकी धुरी पर भी पड़ रहा है और उसमें बदला आ रहा है।

जर्नल जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स में छपे नए शोध के अनुसार, 1995 से ध्रुव दक्षिण से पूर्व की ओर खिसक रहे हैं। इनके खिसकने की गति के बारे में बात करें तो वो 1981 से 1995 की तुलना में 1995 से 2020 के बीच 17 गुना ज्यादा तेजी से खिसक चुके हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक, ध्रुवीय बहाव 1995 में पूर्व की ओर शिफ्ट हो गया और 1981 से 1995 की तुलना में 1995 से 2020 के बीच यह 17 गुना बढ़ गया।

इस शोध से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता शानशैन डेंग के अनुसार 1990 के दशक से जिस तरह से बढ़ते तापमान की वजह से तेजी से बर्फ पिघल रही है, वो ही धुरी की दिशा के बदलने के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेवार है। इस बारे में ज्यूरिख विश्वविद्यालय के जलवायु वैज्ञानिक विन्सेंट हम्फ्रे ने बताया कि पृथ्वी अपनी धुरी पर एक लट्टू की तरह ही घूमती है। उसके ऊपरी हिस्से से वजन हटा दिया जाए और दूसरी ओर कर दिया जाए तो उसके घूर्णन अक्ष में भी परिवर्तन हो जाता है। पृथ्वी के साथ भी ऐसा ही हो रहा है। इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों ने बहुत पहले ही प्रयास शुरू कर दिए थे। नासा और जर्मन एअरोस्पेस सेंटर के संयुक्त मिशन ‘ग्रेविटी रिकवरी’ और ‘क्लाइमेट एक्सपेरिमेंट’ शुरू किया गया था।

इसके तहत दो उपग्रह भी छोड़े गए थे। इस मिशन के आंकड़ों पर आधारित पिछले अध्ययनों ने ध्रुवों में आ रहे बदलावों के कुछ प्रमुख कारणों को उजागर किया है। उसके अनुसार उत्तरी घ्रुव के कनाडा से रूस की और ओर खिसकने के पीछे पृथ्वी की बाहरी क्रोड़ में पिघला हुआ लोहा एक कारण है। हम्फ्रे के अनुसार, हालांकि पृथ्वी की धुरी में यह जो परिवर्तन आया है, वो उतना बड़ा नहीं है कि उसका असर हमारे दैनिक जीवन पर पड़े इसका असर दिन की अवधि पर केवल कुछ मिलीसेकंड का ही पड़ेगा। उनके अनुसार यह स्पष्ट रूप से दिखाता है कि तरह इंसानी गतिविधियों का प्रत्यक्ष प्रभाव जमीन पर पानी के द्रव्यमान में होने वाले परिवर्तनों पर पड़ रहा है।

विश्लेषण के अनुसार कैलिफोर्निया, उत्तरी टेक्सास, बेजिंग और उत्तरी भारत के आसपास के क्षेत्रों में पानी के द्रव्यमान में बड़े बदलावों का पता चला है। यह सभी क्षेत्र अपनी कृषि संबंधी जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर भूजल का दोहन कर रहे है।
जर्नल जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स में छपे शोध के अनुसार, 1995 से ध्रुव दक्षिण से पूर्व की ओर खिसक रहे हैं।

वैज्ञानिक पहले इसके लिए केवल प्राकृतिक कारकों जैसे महासागरीय धाराओं और पृथ्वी के भीतर गर्म चट्टानों और उनके पिघलने को ही वजह मानते थे। अब पता चला है कि 1990 के बाद से जिस तरह से धरती पर ग्लेशियरों में जमा करोड़ों टन बर्फ पिघल रही है, उनसे पृथ्वी के द्रव्यमान का जो वितरण है, उसमें बदलाव आ रहा है। इसका असर इसकी धुरी पर भी पड़ रहा है और उसमें बदला आ रहा है।

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