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वैज्ञानिक पीएम भार्गव अपना पद्म भूषण लौटाएंगे

देश में ‘बढ़ती असहिष्णुता और बिगड़ते माहौल’ के मद्देनजर शीर्ष वैज्ञानिक पीएम भार्गव ने कहा कि वे अपना पद्म भूषण पुरस्कार लौटाएंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी सरकार..

देश में ‘बढ़ती असहिष्णुता और बिगड़ते माहौल’ के मद्देनजर पुरस्कार लौटाने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रुख की निंदा का सिलसिला थमता नजर नहीं आ रहा। ऐसे हालात के खिलाफ बढ़ते विरोध में गुरुवार को इतिहासकार भी लेखकों, कलाकारों, फिल्मकारों और वैज्ञानिकों के साथ शामिल हो गए। इसी कड़ी में शीर्ष वैज्ञानिक पीएम भार्गव ने कहा कि वे अपना पद्म भूषण पुरस्कार लौटाएंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी सरकार भारत को ‘हिंदू धार्मिक निरंकुश तंत्र’ में बदलने की कोशिश कर रही है।

बुद्धिजीवियों के विरोध प्रदर्शनों की लहर में वैज्ञानिकों के दूसरे समूह के शामिल होने के बीच रोमिला थापर, इरफान हबीब, केएन पणिक्कर और मृदुला मुखर्जी सहित 53 इतिहासकारों ने देश में ‘अत्यंत खराब माहौल’ से उत्पन्न चिंताओं पर कोई आश्वासनकारी बयान न दिए जाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला बोला।

इतिहासकारों ने अपने बयान में दादरी घटना और मुंबई में एक किताब के लोकार्पण कार्यक्रम को लेकर सुधींद्र कुलकर्णी पर स्याही फेंके जाने की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि वैचारिक मतभेदों पर शारीरिक हिंसा का सहारा लिया जा रहा है। तर्कों का जवाब तर्क से नहीं बल्कि गोलियों से दिया जा रहा है। इसमें कहा गया, जब एक के बाद एक लेखक विरोध में अपने पुरस्कार लौटा रहे हैं, ऐसे में उन स्थितियों के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की जा रही जिनके चलते विरोध की नौबत आई।
इसके स्थान पर मंत्री इसे कागजी क्रांति कहते हैं और लेखकों को लिखना बंद करने की सलाह देते हैं। यह तो ऐसा कहने के समान हो गया कि यदि बुद्धिजीवियों ने विरोध किया तो उन्हें चुप करा दिया जाएगा। बयान में कहा गया कि शासन जो देखना चाहता है, वह कालक्रम, जांच के स्रोतों और विधियों की परवाह किए बिना एक तरह का नियम-कानून वाला इतिहास, भूतकाल की गढ़ी गई छवि, इसके कुछ पहलुओं को गौरवान्वित करना और अन्य की निंदा करने जैसा है।

इतिहासकारों ने मुद्दे पर प्रधानमंत्री की चुप्पी पर चिंता जताई। उन्होंने कहा- और जब यह उम्मीद की जाती है कि स्थितियों में सुधार के बारे में सरकार प्रमुख कोई बयान देंगे, वे केवल आम तौर पर गरीबी के बारे में बोलते हैं, और इस कारण राष्ट्र प्रमुख को एक बार नहीं, बल्कि दो बार आश्वासनकारी बयान देना पड़ता है। बयान में ऐसा माहौल सुनिश्चित करने का आग्रह किया गया जो स्वतंत्र और निडर अभिव्यक्ति, समाज के सभी तबकों के लिए सुरक्षा और बहुलतावाद के मूल्यों व परंपराओं की रक्षा के लिए हितकर हो, जो कि भारत का विगत में हमेशा एक गुण रहा है।

उधर देश में बढ़ती असहिष्णुता के विरुद्ध वैज्ञानिकों के एक समूह के राष्ट्रपति को प्रतिवेदन दिए जाने के बाद और कई वैज्ञानिक उनके विरोध में शामिल हो गए हैं और ‘जिस तरह से विज्ञान व तर्क का क्षरण किया जा रहा है’ उस पर उन्होंने चिंता प्रकट की है। उन्होंने कहा, असहिष्णुता के इसी माहौल और तर्क की अस्वीकृति के कारण दादरी में मोहम्मद अखलाक सैफी को पीट-पीटकर मार डाला गया, प्रो कलबुर्गी, डॉ नरेंद्र दाभोलकर और गोविंद पनसारे की हत्या कर दी गई। जाने-माने वैज्ञानिक पुष्प मित्र भार्गव ने कहा कि वे अपना पद्म भूषण पुरस्कार लौटा रहे और उन्होंने आरोप लगाया कि राजग सरकार भारत को ‘हिंदू धार्मिक निरंकुशतंत्र’ में बदलने का प्रयास कर रही है।

पद्म भूषण से सम्मानित अशोक सेन, पीएम भार्गव और पी बलराम समेत वैज्ञानिकों व विद्वानों ने कहा कि कलबुर्गी 12 वीं सदी के सुधारक बासव से जुड़े वाचन साहित्य पर एक प्राधिकार थे। बासव ने संस्थागत धर्म, जाति और जातीय भेदभाव का विरोध किया था। उन्होंने कहा कि इसी तरह दाभोलकर और पनसारे ने अंधभक्ति और अंधविश्वास के खिलाफ अपने संघर्ष के माध्यम से वैज्ञानिक प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया।

उन्होंने ऑनलाइन प्रकाशित एक बयान में भारतीय संविधान का हवाला देते हुए कहा कि भारतीय सभ्यता वाकई एक बहुलवाद है जिसमें कई पद्धतियां और समुदाय हैं और जो एक-दूसरे को स्थान प्रदान करता है व सभी धर्मावलंबियों के त्योहार व अन्य चीजों का सम्मान होता है। उन्होंने समाज के सभी अन्य वर्गों से देश में तर्क व वैज्ञानिक प्रवृत्ति पर हो रहे हमले के खिलाफ आवाज मुखर करने की अपील की।

हैदराबाद में कोशिकीय और आणविक जीवविज्ञान केंद्र (सेंटर फार सेल्युलर एंड मोलिक्यूलर बायोलाजी) की स्थापना करने वाले पीएम भार्गव ने कहा 1986 में मिले अपने पुरस्कार को वे लौटाएंगे, क्योंकि उन्हें महसूस हो रहा हे कि देश में ‘डर का माहौल’ है और यह तर्कवाद, तार्किकता और वैज्ञानिक सोच के खिलाफ है। पुरस्कार लौटाने को लेकर उन्होंने यह भी कहा कि ‘इसका कारण यह है कि वर्तमान सरकार लोकतंत्र के रास्ते से दूर जा रही है और देश को पाकिस्तान की तरह हिंदू धार्मिक निरंकुशतंत्र में बदलने की ओर अग्रसर है। यह स्वीकार्य नहीं है। मैं इसे अस्वीकार्य मानता हूं। उन्होंने आरोप लगाया कि कई पदों पर उन लोगों की नियुक्ति की गई, जिनका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से कोई ना कोई संबंध था। भार्गव ने मोदी सरकार पर वादे पूरे नहीं करने का भी आरोप लगाया और कहा एक वैज्ञानिक के तौर पर मैं सिर्फ पुरस्कार ही लौटा सकता हूं।

भार्गव ने कहा, भाजपा संघ का राजनीतिक मुखौटा है, स्वामी संघ ही है। उन्होंने कहा- मैं अपना पुरस्कार अगले हफ्ते लौटाऊंगा। मंगलवार को वैज्ञानिकों के एक समूह ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से असहिष्णुता की घटनाओं पर चिंता जताते हुए उस पर उचित कार्रवाई करने की याचना की थी। वैज्ञानिक भी लेखकों और फिल्मकारों के उस विरोध में शामिल हो गए हैं जिसे भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार ने गढ़ा गया विरोध कहा था। इन पर प्रहार करते हुए केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने गुरुवार को कहा कि पुरस्कार लौटाने वालों में अधिकतर कट्टर भाजपा विरोधी तत्व हैं। जेटली ने पटना में कहा- आप उनके ट्वीट और विभिन्न सामाजिक व राजनीतिक मुद्दों के रुख को देखें। आप उनके भीतर काफी हद तक कट्टर भाजपा विरोधी तत्व पाएंगे।

भार्गव ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उनका कदम राजनीति से प्रेरित नहीं है। उन्होंने कहा, असहमति, असहमति होती है और एक ऐसा विशेष बिंदु होता है जिससे आप असहमत होते हैं। उन्होंने कहा, मैं यूपीए सरकार का भी कटु आलोचक रहा हूं। मैंने अपनी किताब ‘ए क्रिटिक एगेंस्ट द नेशन’ में यूपीए सरकार की आलोचना की है, लेकिन यूपीए सरकार हमें नहीं बताती थी कि हमें क्या खाना है, कैसे कपड़े पहनना चाहिए और न ही हमें नैतिकता का पाठ पढ़ाती थी। कई बार कई अन्य तरीकों से विरोध करने की बात कहते हुए भार्गव ने कहा- असहमति के लिए अब स्थान घट रहा है। और देश का माहौल उस जगह पहुंच गया है जहां पर कुछ बड़ा करने की जरूरत है।

इससे पहले बढ़ती असहिष्णुता और इस पर साहित्य अकादेमी की चुप्पी के विरोध में कृष्णा सोबती, नयनतारा सहगल, अशोक वाजपेयी, उदय प्रकाश, मंगलेश डबराल, राजेश जोशी और के वीरभद्रप्पा जैसे अग्रणी नामों सहित कम से कम 36 लेखक अपने साहित्य अकादेमी पुरस्कार लौटा चुके हैं और के सच्चिदानंद सहित पांच लेखक अकादेमी के कार्यकारी मंडल या अन्य पदों से इस्तीफा दे चुके हैं। इसी के बाद अकादेमी को पिछली 23 अक्तूबर को आपातकालीन बैठक बुलाकर कन्नड़ लेखक एमएम कलबुर्गी व अन्य की हत्या के खिलाफ कड़ा बयान जारी करना पड़ा था।

‘भार्गव घोर भाजपा विरोधी’
विख्यात वैज्ञानिक पीएम भार्गव के पद्म भूषण पुरस्कार लौटाने की घोषणा की तीखी आलोचना करते हुए भाजपा ने उन्हें ‘हेट मोदी ब्रिगेड’ का सदस्य और सोनिया गांधी के ‘चीयरलीडर’ बताते हुए आरोप लगाया कि उन्हें तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने वैज्ञानिकों उपलब्धियों के लिए नहीं बल्कि ‘राजनीतिक’ कारणों से वह पुरस्कार दिया था। भाजपा के प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा राव ने कहा कि भार्गव ने इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल थोपे जाने के खिलाफ एक शब्द नहीं कहा और आपातकाल समाप्त होने के तुरंत बाद उन्हें किसी ‘शीर्ष कार्य’ के लिए पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

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