जुलाई का महीना आते ही देशभर के स्कूलों में नए सत्र की शुरुआत हो जाती है। छोटे-छोटे बच्चे पहली बार बस्ता लेकर स्कूल पहुंचते हैं। हर माता-पिता का सपना होता है कि उनका बच्चा पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी करे और बेहतर जिंदगी जिए। लेकिन शिक्षा मंत्रालय के आंकड़े एक ऐसी तस्वीर दिखाते हैं जो चिंता बढ़ाने वाली है।
UDISE+ रिपोर्ट बताती है कि स्कूल में दाखिला लेने वाले 100 बच्चों में से 12वीं कक्षा तक सिर्फ 47 बच्चे ही अपनी पढ़ाई पूरी कर पाते हैं। बाकी बच्चे बीच रास्ते में ही स्कूल छोड़ देते हैं। सवाल है कि आखिर ऐसा क्यों होता है? जनसत्ता की स्पेशल आंकड़े बोलते हैं सीरीज में बात आज इसी पर…
| शिक्षा स्तर | स्कूल में बने रहने वाले बच्चे (Retention Rate) |
| प्राथमिक (कक्षा 1-5) | 98.90% |
| प्रीपरेटरी (कक्षा 3-5) | 92.40% |
| मिडिल (कक्षा 6-8) | 82.80% |
| सेकेंडरी/12वीं तक | 47.20% |
स्रोत: UDISE+ 2024-25, शिक्षा मंत्रालय
गरीबी सबसे बड़ी वजह
देश में लाखों परिवार ऐसे हैं जहां 14-15 साल की उम्र आते-आते बच्चों के सामने किताब या कमाई में से एक चुनने की नौबत आ जाती है। लड़के मजदूरी, खेत या दुकान पर लग जाते हैं। लड़कियां घर के काम और छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी संभालती हैं।
10वीं के बाद पढ़ाई का खर्च कई परिवारों के लिए मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट तेजी से बढ़ता है।
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स्कूल दूर है, इसलिए पढ़ाई छूट जाती है
प्राथमिक स्कूल तो लगभग हर गांव में हैं लेकिन 11वीं और 12वीं के स्कूल कई जगह आज भी 8-10 किलोमीटर दूर हैं। ग्रामीण इलाकों में सुरक्षित परिवहन की कमी के कारण खासकर बेटियों की पढ़ाई बीच में रुक जाती है।
लड़कियों के सामने अलग चुनौतियां
UDISE+, NFHS और कई सरकारी सर्वे बताते हैं कि माध्यमिक स्तर के बाद लड़कियों के स्कूल छोड़ने के पीछे कई सामाजिक कारण हैं। अलग और साफ-सुथरे टॉयलेट्स की कमी, मासिक धर्म के दौरान सुविधाओं का अभाव, सुरक्षा की चिंता, कम उम्र में शादी। इसी वजह से सेकेंडरी स्तर पर लड़कियों का ड्रॉपआउट बढ़ जाता है।
पढ़ाई में कमजोर नींव
सिर्फ स्कूल जाना ही काफी नहीं है। ASER (Annual Status of Education Report) बताती है कि आज भी बड़ी संख्या में बच्चे अपनी कक्षा के स्तर की किताब ठीक से नहीं पढ़ पाते और बुनियादी गणित करने में कठिनाई महसूस करते हैं। जब यही बच्चे 9वीं और 10वीं की कठिन पढ़ाई तक पहुंचते हैं तो कई पढ़ाई छोड़ देते हैं।
सरकार का लक्ष्य क्या है?
नई शिक्षा नीति (NEP 2020) का लक्ष्य है कि 2030 तक स्कूली शिक्षा में 100% Gross Enrolment Ratio (GER) हासिल किया जाए। इसके लिए सरकार समग्र शिक्षा अभियान, छात्रवृत्ति, डिजिटल शिक्षा, स्किल एजुकेशन और स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर पर काम कर रही है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ स्कूल में दाखिला दिलाना पर्याप्त नहीं है, बच्चों को 12वीं तक स्कूल में बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है।
हर साल करोड़ों बच्चे स्कूल की दहलीज पर अपने सपनों के साथ कदम रखते हैं। लेकिन अगर 100 में से सिर्फ 47 बच्चे ही 12वीं तक पहुंच पा रहे हैं तो यह केवल शिक्षा का नहीं बल्कि देश के भविष्य का भी सवाल है। स्कूल में दाखिला दिलाना पहली जीत है लेकिन असली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि हर बच्चा अपनी स्कूली शिक्षा पूरी कर सके।
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