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2019 लोकसभा चुनावों में 347 सीटों पर वोटों की गिनती में गड़बड़ी की श‍िकायत, SC ने चुनाव आयोग को भेजा नोटिस

याचिका में दावा किया गया है कि उनके शोध के दौरान अनेक विसंगतियों का पता चला। याचिका में कहा गया है कि ये विसंगतियां एक मत से लेकर 1,01,323 मतों की हैं जो कुल मतों का 10.49 प्रतिशत है।

Author December 13, 2019 4:13 PM
सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)

उच्चतम न्यायालय ने 2019 के लोकसभा चुनावों में 347 निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान और गणना में मतों की संख्या में कथित विसंगतियों की जांच के लिये दो गैर सरकारी संगठनों की जनहित याचिका पर शुकवार को निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी किया। प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने इसके साथ ही इन याचिकाओं को पहले से लंबित मामले के साथ संलग्न करते हुये कहा कि इन पर फरवरी, 2020 में सुनवाई होगी।

गैर सरकारी संगठन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स (एडीआर) और कॉमन कॉज ने अपनी याचिका में निर्वाचन आयोग को भविष्य के सभी चुनावों में आंकड़ों की विसंगति की जांच के लिये पुख्ता प्रक्रिया तैयार करने का निदेश देने का अनुरोध किया है। एडीआर ने अपने विशेषज्ञों की टीम के शोध आंकड़ों को हवाला देते हुये कहा है कि 2019 में सम्पन्न हुये चुनावों में विभिन्न सीटों पर मतदाताओं की संख्या और मत प्रतिशत और गिनती किये गये मतों की संख्या के बारे में आयोग द्वारा उपलब्ध कराये गये आंकड़ों मे गंभीर विसंगतियां हैं।

याचिका में दावा किया गया है कि उनके शोध के दौरान अनेक विसंगतियों का पता चला। याचिका में कहा गया है कि ये विसंगतियां एक मत से लेकर 1,01,323 मतों की हैं जो कुल मतों का 10.49 प्रतिशत है। याचिका के अनुसार छह सीटों पर मतों की विसंगतियां चुनाव में जीत के अंतर से ज्यादा थी। याचिका में किसी भी चुनाव के नतीजों की घोषणा से पहले आंकड़ों का सही तरीके से मिलान करने और इस साल के लोकसभा चुनावों के फार्म 17सी, 20, 21सी, 21डी और 21ई की सूचना के साथ ही सारे भावी चुनावों की ऐसी जानकारी सार्वजनिक करने का निर्वाचन आयोग को निर्देश देने का अनुरोध किया गया है।

याचिकाओं में कहा गया है कि चुनावों की पवित्रता बनाये रखने के लिये यह जरूरी है कि चुनाव के नतीजे एकदम सही हों क्योंकि संसदीय चुनावों में किसी प्रकार की विसंगतियों को संतोषजनक तरीके से सुलझाये बगैर दरकिनार नहीं किया जा सकता। याचिका के अनुसार निर्वाचन आयोग ने मतों के मिलान और चुनावी आंकड़ों के प्रकाशन के लिये कोई व्यवस्था नहीं बनायी है और इसीलिए वह इस संबंध में अपनायी गयी पद्धति को सार्वजनिक दायरे में रखने से बच रहा है।

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