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हितों के टकराव का आरोप गलत : सुप्रीम कोर्ट

याचिकाकर्ता हितों के टकराव का आरोप लगाते हुए अपनी याचिका में कह रहा है कि प्रधान न्यायाधीश को न्यायिक पक्ष को नहीं सुनना चाहिए या प्रशासनिक तौर पर मामलों को आबंटित नहीं करना चाहिए।

Author नई दिल्ली | November 15, 2017 2:23 AM
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि जजों के नाम पर कथित रिश्वत से जुड़े मामले की एसआइटी से जांच करने की मांग संबंधी याचिका की सुनवाई से प्रधान न्यायाधीश को अलग करने के लिए हितों के टकराव का आरोप लगाना अत्यंत अनुचित’ है। शीर्ष न्यायालय ने कहा कि दो दिन में दायर की गई याचिकाएं मामलों को आबंटित करने की प्रधान न्यायाधीश की शक्ति के इस्तेमाल को रोकने के लिए ‘स्पष्ट रूप से फोरम झटकने का प्रयास लगता है और इसकी कड़ी से कड़ी शब्दों में निंदा की जाती है।  न्यायमूर्ति आरके अग्रवाल, न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा और न्यायमूर्ति एम खानविलकर ने कहा, यह बहुत अनुचित है कि याचिकाकर्ता हितों के टकराव का आरोप लगाते हुए अपनी याचिका में कह रहा है कि प्रधान न्यायाधीश को न्यायिक पक्ष को नहीं सुनना चाहिए या प्रशासनिक तौर पर मामलों को आबंटित नहीं करना चाहिए।

अधिवक्ता कामिनी जायसवाल की दायर याचिका को खारिज करते हुए शीर्ष न्यायालय ने यह आदेश दिया। याचिका में जजों के नाम पर रिश्वत के कथित मामले में एसआइटी द्वारा जांच कराने की मांग की गई थी। पीठ ने कहा कि इस तरह के मामलों में हितों के टकराव का कोई मुद्दा नहीं बनता और इस तरह की निंदनीय टिप्पणी न्यायिक प्रशासन में हस्तक्षेप के समान है।शीर्ष अदालत ने आगे यह भी कहा कि सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालयों के किसी वर्तमान न्यायाधीश पर प्राथमिकी दर्ज नहीं की जा सकती। पीठ ने 1991 के एक संविधान पीठ के फैसले का जिक्र किया। संविधान पीठ ने तब कहा था कि उच्च न्यायपालिका के वर्तमान न्यायाधीशों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की अनुमति नहीं है। पीठ ने कहा कि इस प्रकार जो याचिकाएं दाखिल की गईं उनमें गलत तरीके से समझा गया कि जांच के लपेटे में उच्च न्यायपालिका है और इस अदालत में काम करने वाले उस मामले की निगरानी की जद में हैं। पीठ ने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सीबीआइ या पुलिस की मर्जी पर नहीं छोड़ा जा सकता। शीर्ष न्यायालय ने कहा कि मामले में सीबीआइ की तरफ से दर्ज कराई गई प्राथमिकी में सर्वोच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश का नाम नहीं है जिसमें मेडिकल कॉलेजों से जुड़े मामले के निपटारे के लिए रिश्वत लेने के आरोप लगाए गए थे।

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पीठ ने कहा, किसी न्यायाधीश के खिलाफ शिकायत और सीबीआइ द्वारा इसकी जांच को प्रचारित किया जाता है तो इसका न्यायाधीश और याचिकाकर्ताओं पर दूरगामी परिणाम होंगे। इसलिए कानून के तहत उचित कार्रवाई की जरूरत है। संविधान पीठ के 1991 के फैसले का जिक्र करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि इसने टिप्पणी की थी कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने की दिशा में अगर कार्यपालिका को न्यायाधीशों को अभ्यारोपित करने की शक्ति दे गई तो इसका दुरुपयोग होने की आशंका है।इसने कहा कि भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआइ) से विचार-विमर्श किए बगैर उच्च न्यायपालिका के न्यायाधीशों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज नहीं की जा सकती। और अगर सीजेआइ के खिलाफ आरोप हैं तो राष्ट्रपति को निर्णय करना है। पीठ ने कहा, सिविल न्यायाधीश, मुंसिफ के खिलाफ भी संबंधित अदालत के मुख्य न्यायाधीश की अनुमति के बगैर प्राथमिकी दर्ज नहीं की जा सकती और फिलहाल किसी वर्तमान न्यायाधीश के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई है। पीठ ने अपने आदेश में कहा, अन्यथा कोई भी निराधार आरोप किसी ईमानदार न्यायाधीश को बदनाम कर सकता है और छवि धूमिल हो सकती है। कोरीडोर में अगर कुछ होता है या ‘कोई किसी का नाम बेचने का प्रयास’ करता है तो भी किसी न्यायाधीश को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। पीठ ने कहा कि तथ्यों से स्पष्ट है कि मेडिकल कॉलेज मामले में शीर्ष अदालत ने पक्ष में कोई फैसला नहीं दिया है जिस सिलसिले में सीबीआइ ने प्राथमिकी दर्ज की है।
पीठ ने कहा, इसलिए यह आरोप लगाना या मान लेना असत्य और तुच्छता है कि मामला इस अदालत में लंबित था, जिसके लिए किसी को रिश्वत दी जानी थी।
गौरतलब है कि अधिवक्ता कामिनी जायसवाल ने वरिष्ठ वकील शांति भूषण और प्रशांत भूषण के माध्यम से मामले में न्यायमूर्ति खानविलकर के हटने की मांग की थी। खानविलकर ने खुद को मामले से हटाने से इनकार कर दिया था। पीठ ने कहा कि इस तरह की याचिका दायर कर संस्थान को नुकसान पहुंचाया गया है व इसकी ईमानदारी पर अनावश्यक संदेह पैदा किया गया है। याचिका में दावा किया गया था कि मेडिकल कॉलेजों से जुड़े मामलों के निपटारे के लिए कथित तौर पर रिश्वत लेने के आरोप लगाए गए थे। इसमें ओड़िशा हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश इशरत मसरूर कुद्दूसी भी आरोपी हैं। 19 सितंबर को दर्ज की अपनी एफआइआर में सीबीआइ ने ओड़िशा हाई कोर्ट के पूर्व जज इशरत मसरूर कुद्दूसी समेत कई लोगों को कथित भ्रष्टाचार के मामले में आरोपी बनाया था। कुद्दूसी पर भुवनेश्वर के एक दलाल के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट से 46 मेडिकल कालेजों में रजिस्ट्रेशन पर लगी रोक से राहत दिलाने की साजिश रचने का आरोप है। मामले में कुद्दूसी समेत कुल पांच लोगों को गिरफ्तार किया गया।

 

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