फिल्म “सतलुज” के रिलीज होने और OTT प्लेटफॉर्म ZEE5 से हटाए जाने के महज दो दिनों के भीतर ही पंजाब के उग्रवाद के काले दौर (Dark Decade) पर फिर से चर्चा शुरू हो गई है। पाकिस्तान की सीमा से लगने वाला माझा क्षेत्र जिसने उग्रवाद और पुलिस कार्रवाई दोनों का सबसे ज्यादा सामना किया। वहां के बुजुर्ग आज भी उस दर्द को एक पंजाबी शब्द से याद करते हैं- ‘संताप'(गहरा दुख या पीड़ा)। यह स्मृति बताती है कि पंजाब दोबारा उस दौर में नहीं लौटना चाहता है।
पंजाब में उग्रवाद किसी एक फिल्म, एक भाषण, एक नेता या किसी एक घटना के कारण नहीं पनपा। यह वर्षों की राजनीतिक और सामाजिक नाराजगी का परिणाम था। 1966 में पंजाब के पुनर्गठन में कई विवादास्पद मुद्दे अनसुलझे रह गए। इनमें प्रमुख थे- पंजाब और पड़ोसी राज्यों के बीच नदियों के पानी का बंटवारा, चंडीगढ़ पर अधिकार का विवाद और राज्य का ज्यादा स्वायत्तता देने की मांग। हालांकि, इन मुद्दों ने सीधे तौर पर हिंसा को जन्म नहीं दिया, लेकिन इन्होंने लोगों में असंतोष और अलगाव की भावना पैदा की, जिसने बाद में उग्रवाद के लिए जमीन तैयार करने में रोल निभाया।
पंजाब का काला दौर
राजनीतिक और प्रशासनिक गलतियों की एक सीरीज के कारण स्थिति और भी बिगड़ गई। 1978 में बैसाखी के दिन अमृतसर में निरंकारी संघर्ष हुआ, जिसमें जरनैल सिंह भिंडरांवाले के नेतृत्व में 13 सिख प्रदर्शनकारी मारे गए और बाद में आरोपियों को बरी कर दिया गया। इस घटना ने सिख शैक्षणिक संस्थान (Sikh seminary Damdami Taksal) के नव नियुक्त प्रमुख भिंडरांवाले को प्रसिद्धि दिलाई।
इसके बाद सिलसिलेवार हत्याओं का सिलसिला शुरू हुआ, जिसकी शुरुआत 1980 में निरंकारी प्रमुख गुरबचन सिंह की हत्या से हुई, और फिर 1981 में पंजाब केसरी के संपादक लाला जगत नारायण की हत्या हुई, जो भिंडरांवाले के कट्टर आलोचक थे। भिंडरांवाले दोनों ही मामलों में संदिग्ध थे, लेकिन उन्हें बरी कर दिया गया। तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री जैल सिंह ने स्वयं संसद में कहा था कि उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं है। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस, भिंडरांवाले को शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) के प्रतिसंतुलन के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही थी। एसएडी एक क्षेत्रीय पार्टी थी जिसने आपातकाल के खिलाफ सबसे कड़ा प्रतिरोध किया था और जिसके हजारों कार्यकर्ताओं को जेल भेजा गया था।
लेकिन जल्द ही भिंडरांवाले ने अपनी मनमानी करना शुरू कर दिया और 1982 में अपने सशस्त्र अनुयायियों के साथ स्वर्ण मंदिर परिसर में स्थानांतरित होने के बाद वहां से एक समानांतर प्रशासन चलाने लगे। खुद को कमजोर स्थिति में पाकर, बिखरे हुए अकाली नेताओं ने पंजाब के लिए अधिक स्वायत्तता की मांग करने के लिए धर्म युद्ध मोर्चा शुरू करने के लिए उनके साथ गठबंधन किया।
केंद्र और अकाली दल के बीच विफल वार्ता अंतिम झटका साबित हुई। इसके बाद 1983 में स्वर्ण मंदिर परिसर की किलेबंदी (डीआईजी ए.एस. अटवाल परिसर से बाहर निकलते ही गोली मारकर हत्या कर दी गई)। फिर जून 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार हुआ, जिसमें सैकड़ों, कुछ लोगों का कहना है कि हजारों, जिनमें सेना के जवान भी शामिल थे, मारे गए और अकाल तख्त को व्यापक रूप से नुकसान पहुंचा। इसके बाद अक्टूबर 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या और उसके बाद हुए भयावह सिख विरोधी नरसंहारों ने एक राजनीतिक संकट को एक पूर्ण विकसित विद्रोह में बदल दिया।
उग्रवाद में इजाफा
राजनीतिक चिंताओं के साथ-साथ कई गहरे व्यक्तिगत कारणों ने भी उग्रवाद को हवा दी। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध का नायक मेजर जनरल शबेग सिंह को माना जाता है। जिन्होंने बाद में भिंडरांवाले को स्वर्ण मंदिर परिसर को मजबूत करने में मदद की थी, उसको सेवानिवृत्ति से कुछ समय पहले ही भ्रष्टाचार के आरोप में सेना से बर्खास्त कर दिया गया था। उस समय यह माना गया था कि उन पर यह आरोप मनगंढ़त और बढ़ा-चढ़ाकर लगाए गए थे।
इसी तर गुरबचन सिंह मनोचाहल, जो बाद में भिंडरांवाले टाइगर फोर्स ऑफ खालिस्तान (बीटीएफके) नामक एक उग्रवादी संगठन बनाकर पंजाब के सबसे खूंखार उग्रवादियों में से एक बन गया। उसको भी सेना से बर्खास्त कर दिया गया था। बताया जाता है कि उसने छुट्टी से देर से लौटने पर अपशब्द कहने वाले एक अधिकारी की नाक तोड़ दी थी।
पंजाब में हिंसा भड़कने के बाद, सीमा पार से हथियार, प्रशिक्षण और रसद सहायता बेरोकटोक आने लगी। ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान स्वर्ण मंदिर परिसर से भागकर पाकिस्तान पहुंचे अकाल फेडरेशन के तत्कालीन अध्यक्ष कंवर पाल सिंह धामी ने बताया कि वह उस वक्त हैरान रह गए, जब पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के एक ब्रिगेडियर ने उन्हें स्वर्ण मंदिर का मॉडल दिखाया। उस मॉडल में केवल पूरे परिसर का नक्शा ही नहीं था, बल्कि यह भी दिखाया गया था कि ऑपरेशन के दौरान धामी किस जगह पर मौजूद थे।
इसके बाद के वर्षों में पंजाब हिंसा और भय के अथाह सागर में डूब गया। उग्रवादियों ने हत्याओं, बम विस्फोटों, नरसंहारों की लहरें चलाईं और तालिबानी फरमान जारी किए कि क्या पहनना है और कैसे जश्न मनाना है, जबकि राज्य के उग्रवादी विरोधी अभियानों पर ज्यादतियों के आरोप लगे। कई हिंदू व्यापारी पंजाब छोड़कर भाग गए। आम पंजाबियों को इस संघर्ष का खामियाजा भुगतना पड़ा। इसी दौरान लंदन में रहने वाले सोहन सिंह जैसे अलगाववादी नेताओं ने पाकिस्तान समर्थित नेटवर्क की मदद से इस अशांति का फायदा उठाकर खालिस्तान आंदोलन को आगे बढ़ाने की कोशिश की।
खालड़ा का जीवन और संघर्ष
यह तर्क दिया जा सकता है कि दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म “सतलुज”, जो मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है, पंजाब में उग्रवाद की पूरी कहानी नहीं बयां करती। ऐसा इसलिए है क्योंकि इसका उद्देश्य कभी ऐसा करना था ही नहीं। यह फिल्म खालरा नामक एक व्यक्ति की कहानी है,जिसने उग्रवाद पर राज्य की जीत के दौरान हुए कथित मानवाधिकार उल्लंघनों और पुलिस की ज्यादतियों को उजागर करने का साहस किया।
अमृतसर के सामाजिक कार्यकर्ता और बैंक निदेशक खालड़ा को इस नेक काम की ओर तब प्रेरणा मिली जब उन्हें अपने एक सहकर्मी का शव मिला, जो लापता हो गया था और जिसका अंतिम संस्कार कर दिया गया था।
इसके बाद खालड़ा ने अमृतसर के तीनों श्मशान घाटों के रिकॉर्ड की जांच की। जांच में पता चला कि असामान्य रूप से बड़ी संख्या में 2,000 शव लावारिस पड़े थे। माता-पिता लंबे समय से उन बेटों को लेकर व्याकुल थे जिन्हें पंजाब पुलिस पूछताछ के लिए उठा ले गई थी और जो कभी वापस नहीं लौटे। साथ ही, कई ऐसे पुलिस एनकाउंटर की भी कहानियां सामने आईं, जिनमें लगभग एक जैसी परिस्थितियों में कथित उग्रवादियों के पुलिस नाकों पर गोली चलाने का दावा किया गया और बाद में उन्हें मार गिराए जाने की बात कही गई।
खालड़ा ने देश को इस भयावह वास्तविकता का सामना करने के लिए मजबूर किया। 1995 में उनके अपहरण और हत्या के बाद सीबीआई ने अपनी 1996 की रिपोर्ट के अनुसार, अमृतसर के इन तीन स्थलों पर 2,097 अवैध दाह संस्कारों की पुष्टि की और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने बाद में लगभग 2,059 “अवैध दाह संस्कारों” को स्वीकार किया।
पंजाब के तत्कालीन डीजीपी केपीएस गिल, जिन्हें पुलिसकर्मियों और उनके प्रशंसकों द्वारा राज्य में उग्रवाद को कुचलने के लिए “सुपरकॉप” का नाम दिया गया था। वह अक्सर यह तर्क देते थे कि मानवाधिकार अभियान बड़ी मुश्किल से हासिल की गई शांति को कमजोर करते हैं। कई अन्य लोगों का मानना है कि खालड़ा ने देश को यह याद दिलाया कि उग्रवाद के खिलाफ लड़ाई में भी कानून का शासन खतरे में नहीं पड़ सकता। ये दोनों दृष्टिकोण पंजाब की जनमानस में आज भी मौजूद हैं।
मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के तुरंत बाद खालड़ा का लापता हो जाना और पुलिसकर्मियों के हाथों उन पर हुए अत्याचार उस युग के सबसे काले और शर्मनाक अध्यायों में से एक हैं। यह कहना कि कोई फिल्म पुराने घावों को कुरेदकर उग्रवाद को फिर से भड़का सकती है, तर्कहीन है। पंजाब की त्रासदी किसी सिनेमा हॉल में नहीं जन्मी थी। यह वर्षों से अनसुलझे राजनीतिक संघर्षों से पनपी थी। उन जटिल परिस्थितियों को फिल्म में नहीं दिखाया जा सकता। लेकिन उन्हें भुलाया जा सकता है। और इतिहास को भूलना, चाहे वह हाल का ही क्यों न हो, उसे दोहराना है। यह खतरनाक है।
‘सतलुज’ पर सरकारी पैनल की सख्त सिफारिश, राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर देश में ब्लॉक रखने की सलाह
दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म ‘सतलुज’ को लेकर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को मिली जानकारी के अनुसार, एक सरकारी पैनल ने फिल्म की समीक्षा के बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को सिफारिश की है कि इसे भारत में जनता के लिए ब्लॉक रखा जाए। 3 जुलाई को रिलीज होने के महज दो दिन बाद ही यह फिल्म ओटीटी प्लेटफॉर्म ZEE5 से हटा दी गई थी। पढ़ें पूरी खबर।
