फिल्म “सतलुज” इस वक्त विवादों में है। इस फिल्म को सार्वजनिक पहुंच से रोकने की सिफारिश करते हुए सरकार की समिति ने अपने आदेश में गैरकानूनी गतिविधियों (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) का हवाल दिया है। सरकारी पैनल ने कहा कि खालिस्तान से संबंधित प्रचार, विदेशी आधारित अलगाववादी लामबंदी और शत्रुतापूर्ण सूचना अभियान लगातार चिंता का विषय हैं। साथ ही कई खालिस्तान समर्थक संगठनों को यूएपीए के तहत आतंकवादी संगठनों के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
हनी त्रेहान द्वारा निर्देशित और दिलजीत दोसांझ अभिनीत यह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की कहानी के जीवन पर आधारित है। फिल्म में पंजाब में उग्रवाद के दौर में सैकड़ों लोगों के लापता होने की जांच के लिए चलाए गए उनके अभियान के बाद पुलिस हिरासत में उनकी मृत्यु को दर्शाती है। 3 जुलाई को रिलीज होने के दो दिन बाद ही इसे भारत में ZEE5 ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया था।
सरकार की अंतर-विभागीय समिति (आईडीसी) ने राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे को दो आधारों पर रखा: यूएपीए के तहत सूचीबद्ध खालिस्तान समर्थक संगठन और दूसरा पाकिस्तान द्वारा फिल्म का दुरुपयोग।
9 जुलाई के अपने आदेश में समिति ने कहा कि उसने पता लगाया है कि पंजाब की मौजूदा सुरक्षा स्थिति से यह तत्काल खतरा है कि फिल्म युवाओं में अलगाववादी असंतोष को पुनर्जीवित करने का एक हथियार बन सकती है।
यूएपीए के तहत कई खालिस्तान समर्थक संगठनों को आतंकवादी संगठनों के रूप में सूचीबद्ध किए जाने के साथ-साथ खालिस्तान-आधारित प्रचार के बारे में अपनी चिंताओं को व्यक्त करने के अलावा, आईडीसी ने कहा कि पंजाब की सीमा संवेदनशीलता, सीमा पार प्रचार और विदेशी-संबद्ध चरमपंथी पारिस्थितिकी तंत्र के कारण पंजाब में सुरक्षा स्थिति संवेदनशील है, जिससे उग्रवाद काल से संबंधित भावनात्मक रूप से आवेशित सामग्री के शत्रुतापूर्ण शोषण का जोखिम बढ़ जाता है।
इंडियन एक्सप्रेस ने शनिवार को सबसे पहले यह खबर दी थी कि समिति ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को सिफारिश की है कि मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित और दिलजीत दोसांझ अभिनीत इस फिल्म को आईटी अधिनियम की धारा 69ए के तहत प्रतिबंधित रखा जाए।
समिति ने यह भी पाया कि इस फिल्म का इस्तेमाल भारत-विरोधी राज्य और गैर तत्व यह भ्रामक नैरेटिव फैलाने के लिए कर सकते हैं कि भारतीय राज्य ने सिखों पर अत्याचार किया। पाकिस्तान पहले ही इस दिशा में कदम उठा चुका है। जिसमें पाकिस्तान स्थित कुछ तत्व इस फिल्म को भारतीय राज्य की क्रूरता और सिखों पर किए गए अत्याचार के सबूत के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसका उद्देश्य भारत में अलगाववादी विचारधारा फैलाना है। इस आदेश में सिख फॉर जस्टिस का जिक्र किया गया है, जो खालिस्तान समर्थक समूह है और जिसे यूएपीए के तहत एक गैरकानूनी संगठन घोषित किया गया है।
समिति ने यह भी पाया कि फिल्म का एकतरफा प्रस्तुतीकरण खालिस्तान समर्थक समर्थक प्रचारक के उस ढांचे से मेल खाता है, जिसमें यह दावा किया जाता है कि सिखों को सामूहिक रूप से निशाना बनाया गया, राज्य ने सच्चाई को दबाया, अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की आवश्यकता है, राज्य के प्रतिष्ठित व्यक्तियों के खिलाफ हिंसा का एक नैतिक संदर्भ है और यह उचित है और यह कि भारत के साथ पंजाब के संबंध सवालों के घेरे में हैं।
आदेश में आगे कहा गया है कि किसी फिल्म में अलगाव की खुली अपील करना जरूरी नहीं है। अगर वह ऐसी भावानात्मक और तथ्यों जैसी सामग्री उपल्बध कराती है, जिसे अलगाववादी प्रचार के आधार के रूप में इस्तेमाल किया जा सके तो वो भी अलगाववादी प्रचार को बल दे सकती है।
पंजाब का दर्द बताती है फिल्म सतलुज, लेकिन नहीं लौटेगा उग्रवाद का ‘काला दौर’
फिल्म “सतलुज” के रिलीज होने और OTT प्लेटफॉर्म ZEE5 से हटाए जाने के महज दो दिनों के भीतर ही पंजाब के उग्रवाद के काले दौर (Dark Decade) पर फिर से चर्चा शुरू हो गई है। पाकिस्तान की सीमा से लगने वाला माझा क्षेत्र जिसने उग्रवाद और पुलिस कार्रवाई दोनों का सबसे ज्यादा सामना किया। वहां के बुजुर्ग आज भी उस दर्द को एक पंजाबी शब्द से याद करते हैं- ‘संताप'(गहरा दुख या पीड़ा)। यह स्मृति बताती है कि पंजाब दोबारा उस दौर में नहीं लौटना चाहता है। पढ़ें पूरी खबर।
