पंजाब के मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर बनी फिल्म सतलुज इन दिनों पंजाब के कई गांवों में दिखाई जा रही है। ऐसा ही एक गांव लुधियाना के जंगपुर में है, जहां एक गुरुद्वारे के बगल में खाली प्लॉट में गुरुवार की रात को फिल्म की स्क्रीनिंग की गई।

यहां 85 इंच की स्क्रीन लगाई गई और फिल्म को देखने के लिए महिलाएं और पुरुष मौजूद रहे। बुजुर्गों के लिए कुर्सियां लगाई गई और युवा भी फिल्म देखने के लिए काफी संख्या में पहुंचे। सभी ने अपने सिर को रुमाल से ढका हुआ था।

जंगपुर और जितने भी गांवों में फिल्म दिखाई जा रही है, वहां के लोगों का कहना है कि पंजाब में वे काले दिन कभी भी वापस नहीं आने चाहिए।

अकाली दल, आप भी दिखा रही फिल्म

सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) ने सबसे पहले ऐलान किया था कि वह इस फिल्म को पंजाब के गांवों में दिखाएगी लेकिन अब शिरोमणि अकाली दल और सत्ताधारी आम आदमी पार्टी भी इस फिल्म को दिखा रहे हैं।

फिल्म में दिलजीत दोसांझ जसवंत सिंह खालड़ा की भूमिका में हैं। आम आदमी पार्टी ने लुधियाना के दुगरी इलाके में उस घर के पास इस फिल्म की स्क्रीनिंग की, जहां दिलजीत दोसांझ ने बचपन में म्यूजिक की पढ़ाई की थी।

केंद्र सरकार ने सतलुज फिल्म की समीक्षा के लिए जो कमेटी बनाई थी, उसने सिफारिश की है कि इस पर बैन जारी रहना चाहिए क्योंकि इससे राज्य की सुरक्षा को खतरा हो सकता है।

द इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में जसवंत सिंह खालड़ा की बेटी नवकिरण कौर खालड़ा का कहना है कि फिल्म को रोकने की कोशिश के बाद लोगों का ज्यादा ध्यान इस और गया है, लोग उस दौर के बारे में पढ़ रहे हैं, बात कर रहे हैं और सवाल भी पूछ रहे हैं।

एक स्क्रीनिंग के लिए दे रहे 5000 रुपये

जंगपुर में स्क्रीनिंग ढाका सीट के विधायक मनप्रीत सिंह अयाली के समर्थकों ने करवाई। मनप्रीत सिंह अयाली जेल में बंद निर्दलीय सांसद अमृतपाल सिंह की पार्टी अकाली दल वारिस पंजाब दे के उपाध्यक्ष हैं। यहां मौजूद जसदीप सिंह जस्सा बताते हैं कि उन्हें फिल्म की डाउनलोड की हुई कॉपी मिल गई और वे एक स्क्रीनिंग के लिए 5000 रुपये दे रहे हैं।

70 साल की गुरदेव कौर भी फिल्म देख रही थीं। फिल्म शुरू होने के 1 घंटे बाद उन्होंने कहा, “वह वक्त दुबारा नहीं चाहिए… वे बहुत खराब दिन थे।” 61 साल के जसवंत सिंह कहते हैं कि अगर फिल्म को ओटीटी से नहीं हटाया गया होता या विवाद नहीं होता तो शायद इसे देखने के लिए लोग गांव में इस तरह इकट्ठा नहीं होते। जब पंजाब में उग्रवाद चरम पर था तो जसवंत सिंह अपने पूरे परिवार को पश्चिम बंगाल ले गए थे। जसवंत सिंह उन दिनों सेना में थे।

यहां से 9 किलोमीटर दूर गहौर गांव में एक गुरुद्वारे के पास फिल्म की स्क्रीनिंग की गई। गर्मी और उमस के बावजूद 1000 से ज्यादा लोग इकट्ठे हुए। अकाली दल की ओर से आयोजित फिल्म की स्क्रीनिंग में लोगों को शरबत और समोसे भी खिलाए गए। अकाली दल के समर्थक बताते हैं कि उन्होंने एक गांव में लंगर भी लगाया।

…ऐसा दौर फिर कभी न लौटे

अकाली दल के कार्यकर्ता विक्की चौधरी बताते हैं कि उन्होंने मोही, गहौर और सवद्दी गांवों में फिल्म की स्क्रीनिंग की। 52 साल के चौधरी कहते हैं, “हम बस इतना चाहते हैं कि लोग अपने अतीत को जानें… और उससे सबक सीखें ताकि ऐसा दौर फिर कभी न लौटे।”

चौधरी बताते हैं कि उस दौरान उन्हें लुधियाना में रहने वाली उनकी चाची के घर भेज दिया था और महिलाएं अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर परेशान रहती थीं। लुधियाना शहर से 40 किलोमीटर दूर देहरका गांव में भी फिल्म की स्क्रीनिंग हुई। यहां अकाली दल के नेता चंद सिंह डल्ला ने ऐलान किया कि उनके पैतृक गांव में इस फिल्म का एक और शो होगा।

चाचा को जबरदस्ती ले गए लोग

एक ग्रामीण बताता है कि दल्ला के चाचा को 1990 के दशक की शुरुआत में उठा लिया गया था और वह कभी वापस नहीं लौटे। दल्ला बताते हैं, “यह शायद 1990 की बात है। मैं अपने चाचा बछित्तर सिंह के क्लिनिक में था। वे सेना से रिटायर्ड थे और डॉक्टर थे। सादे कपड़ों में कार्बाइन लिए चार लोग आए, मेरे चाचा को जबरदस्ती अपनी गाड़ी में बैठाया और ले गए। वह आखिरी बार था जब हमने उन्हें देखा था।” दल्ला बताते हैं कि तब यह पता लगाना ही मुश्किल होता था कि अपराधी कौन है और उनके ही गांव के लगभग 20 नौजवान मारे गए थे।

मुल्लांपुर के रहने वाले 75 साल के एक शख्स कहते हैं कि इस विवाद के पीछे राजनीति है। “फिल्म में कांग्रेस सरकारों के दौरान और बाद में जो कुछ हुआ, उसे दिखाया गया है। अलग-अलग पार्टियों के द्वारा फिल्म को गांवों में दिखाने के पीछे अपने-अपने राजनीतिक फायदे हैं।” वे कहते हैं कि केंद्रीय मंत्री और बीजेपी नेता रवनीत सिंह बिट्टू अपने दादा और पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह का बचाव कर रहे हैं।

काश वो दिन कभी वापस न आएं

फिल्म खत्म होने के बाद घर जाते वक्त 65 साल की सुखविंदर कौर याद करती हैं कि कैसे शाम 4 बजे तक बाजार बंद हो जाते थे और जब तक परिवार के सभी लोग सुरक्षित नहीं आ जाते थे, तब तक रात में घर में चूल्हा नहीं जलता था। सुखविंदर कौर कहती हैं कि कुछ लोग अभी भी हिंसा भड़काने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन लोग उन दिनों को कभी वापस नहीं आने देंगे।

24 साल के दिलीप सिंह कहते हैं कि अतीत से डरना नहीं चाहिए। सवद्दी गांव में शो खत्म होने के बाद अमन कहते हैं कि काश वो दिन कभी वापस न आएं।

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53 साल के किक्कर सिंह 1995 में पुलिस द्वारा जसवंत सिंह खालड़ा के अपहरण और हत्या के मुख्य गवाह थे। किक्कर सिंह ने कहा कि मैंने उसे कंग पुलिस स्टेशन के लॉक-अप में अपने हाथों से रोटी खिलाई। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर।