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सरिता माली : मुंबई की झुग्गी से पहुंची अमेरिकी विश्वविद्यालय

वे अमेरिका की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी आफ कैलिफोर्निया, सांता बारबरा में हिंदी में पीएचडी करने के लिए दाखिला पा चुकी हैं।

सरिता माली मुंबई की झोपड़पट्टी में पैदा हुर्इं, नगर निगम के स्कूल में पढ़ीं और फिर सड़कों पर ट्रैफिक सिग्नल पर फूल बेचने के लिए गाड़ियों के पीछे दौड़ती रहीं। कुछ बनने का सपना हमेशा उनकी आंखों में समाया रहा। उन्हें अपने पिता की सीख हमेशा याद रही कि शिक्षा एकमात्र ऐसा हथियार है, जो उन्हें जहालत की इस जिंदगी से छुटकारा दिला सकता है। इसी सीख को सरिता ने जादू की छड़ी बना लिया, जिसने उनकी किस्मत पलट दी। वे अमेरिका की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी आफ कैलिफोर्निया, सांता बारबरा में हिंदी में पीएचडी करने के लिए दाखिला पा चुकी हैं। उस यूनिवर्सिटी ने उन्हे मेरिट और अकादमिक रिकार्ड के आधार पर अमेरिका की सबसे प्रतिष्ठित फेलोशिप में से एक ‘चांसलर फेलोशिप’ दी है।

उनके पिता उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले से ताल्लुक रखते हैं, जहां उनकी जाति को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में गिना जाता है। लेकिन रोजी-रोटी की तलाश में वह मुंबई आ गए और ट्रैफिक सिग्नल पर फूल मालाएं बेचने का काम शुरू किया। सरिता छठवीं कक्षा में पढ़ती थीं। तब से पिता के साथ उन्हें भी मुंबई के ट्रैफिक सिग्नल्स पर फूल बेचने के लिए गाड़ियों के पीछे दौड़ना पड़ता था।

दोनों बाप-बेटी को फूल बेचकर दिनभर में मुश्किल से तीन सौ रुपए कमाई होती थी। मुंबई के घाटकोपर इलाके के पास की झुग्गी में पली-बढ़ी सरिता का उसके पिता ने हर कदम पर साथ दिया। दसवीं के बाद सरिता ने इलाके के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया। वे पढ़ने की अपने पिता की इच्छा पूरी करना चाहती थी। पैसे बचाकर उन्होंने केजे सोमैया कालेज आफ आर्ट्स एंड कामर्स में दाखिला लिया।

अपने फेसबुक पोस्ट में सरिता माली ने अपने संघर्षों की दास्तां शेयर की है। उसने लिखा कि अमेरिका के दो विश्वविद्यालयों में मेरा चयन हुआ है- यूनिवर्सिटी आफ कैलिफोर्निया और यूनिवर्सिटी आफ वाशिंगटन। मैंने यूनिवर्सिटी आफ कैलिफोर्निया को वरीयता दी है। मुझे इस यूनिवर्सिटी ने मेरिट और अकादमिक रिकार्ड के आधार पर ‘चांसलर फेलोशिप’ दी है।

सरिता के अनुसार, ‘पिता हमसे कहते थे, अगर हम नहीं पढ़ेंगे तो हमारा पूरा जीवन खुद को जिंदा रखने के लिए संघर्ष करने और भोजन की व्यवस्था करने में बीत जाएगा। हम इस देश और समाज को कुछ नहीं दे पाएंगे और उनकी तरह अनपढ़ रहकर समाज में अपमानित होते रहेंगे।’ इसी भूख अत्याचार, अपमान और आसपास होते अपराध को देखते हुए 2014 में सरिता जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिंदी साहित्य में स्रातकोत्तर की उपाधि लेने आईं। जेएनयू में पढ़ाई करना भी सरिता के जीवन की सबसे बड़ी महत्तवाकांक्षा थी क्योंकि एक बार जब वह अपनी नानी के यहां गर्इं तो उसने देखा कि उनका ममेरा भाई जेएनयू में दाखिले की तैयारी कर रहा था।

उनके मामा ने उनकी मां को कहा कि जेएनयू में जो दाखिला पा जाता है, वह वहां से कुछ बनकर ही निकलता है। तीन साल की मेहनत के बाद सरिता को ओबीसी सीट पर हिंदी एमए प्रथम वर्ष में दाखिला मिल गया। साल 2014 में 20 साल की उम्र में जेएनयू में स्रातकोत्तर (पीजी) करने गई सरिता अब यहां से एमए, एमफिल की डिग्री लेकर इस साल पीएचडी की थीसिस जमा करने के बाद अमेरिका में दोबारा पीएचडी करने जा रही हैं। वहां वे ‘भक्ति काल के दौरान निम्नवर्गीय महिलाओं का लेखन’ विषय पर शोध करेंगी।

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