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समझौता ब्लास्ट: जज ने की NIA की खिंचाई, लिखा-सबसे मजबूत सबूत ही दबा गए, स्वतंत्र गवाहों से भी पूछताछ नहीं की

साल 2007 में हुए समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट में अदालत ने चारों आरोपियों असीमानंद, कमल चौहान, राजिंदर चौधरी और लोकेश शर्मा को बीती 20 मार्च को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था।

Author Updated: March 29, 2019 12:14 PM
Samjhauta Blastसमझौता ब्लास्ट केस में अदालत ने चारों आरोपियों को बरी कर दिया है। (PTI Photo)

समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट के आरोपियों की रिहाई का आदेश देने वाले जज ने अपने फैसले में कहा है कि एनआईए सबसे मजबूत सबूत ही अदालत में पेश करने में नाकामयाब रही, साथ ही मामले की जांच में भी कई लापरवाही बरती गई। केन्द्रीय जांच एजेंसी एनआईए की खिंचाई करते हुए कहा कि ‘वह गहरे दुख और पीड़ा के साथ यह कर रहे हैं, क्योंकि एक नृशंस और हिंसक घटना में किसी को सजा नहीं मिली।’ साल 2007 में हुए समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट में अदालत ने चारों आरोपियों असीमानंद, कमल चौहान, राजिंदर चौधरी और लोकेश शर्मा को बीती 20 मार्च को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था। अब 28 मार्च को पंचकूला की विशेष अदालत का यह फैसला सार्वजनिक किया गया है।

बता दें कि 18 फरवरी, 2007 में भारत और पाकिस्तान के बीच चलने वाली ट्रेन ‘समझौता एक्सप्रेस’ में हुए धमाके में 68 लोगों की मौत हो गई थी। यह रेलगाड़ी अटारी रेलवे स्टेशन जा रही थी और हरियाणा के पानीपत में रेलगाड़ी की 2 बोगियों में बम धमाके हुए थे। इन धमाकों में मारे गए लोगों में 43 पाकिस्तान के निवासी थे, वहीं 10 भारतीय और 15 लोगों की पहचान नहीं हो सकी थी। अपने आदेश में पंचकूला की विशेष अदालत के जज जगदीप सिंह ने कहा कि “अभियोजन द्वारा पेश किए गए सबूतों में कई लापरवाही थी, जिससे इस हिंसक घटना में किसी को सजा नहीं हो सकी। आतंकवाद का कोई धर्म नहीं है, क्योंकि दुनिया का कोई भी धर्म हिंसा नहीं फैलाता है। अदालत का आदेश लोगों की जनभावना के आधार पर नहीं होने चाहिए या फिर किसी राजनीति से प्रेरित नहीं होने चाहिए। यह सिर्फ सबूतों के आधार पर होना चाहिए।”

जज ने कहा कि इस केस में ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया गया, जिससे यह साबित होता हो कि यह अपराध आरोपियों ने किया है। साथ ही कई स्वतंत्र गवाहों से भी पूछताछ नहीं की गई। जज जगदीप सिंह ने कहा कि एनआईए आरोपियों के बीच की बातचीत के सबूत भी पेश करने में नाकामयाब रही। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि ‘संदेह कभी भी साक्ष्य की जगह नहीं ले सकता।’

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