नसीमुद्दीन सिद्दीकी हाल ही में सपा में शामिल हुए हैं। सपा में आने से पहले नसीमुद्दीन सिद्दीकी तीन दशक तक बहुजन समाज पार्टी और 8 साल तक कांग्रेस में रहे। सपा ने नसीमुद्दीन सिद्दीकी को वरिष्ठ नेता आजम खान के जेल में जाने के बाद पैदा हुए राजनीतिक शून्य को भरने के मकसद से अपने साथ शामिल किया है।

आजम खान पिछले साल नवंबर में जेल से रिहा हुए थे लेकिन उसके लगभग 2 महीने बाद उन्हें रामपुर में सांसद-विधायकों की एक विशेष अदालत ने दो पैन कार्ड से जुड़े जालसाजी के मामले में 7 साल कैद की सजा सुनाई थी। इसके बाद आजम खान को फिर से जेल भेज दिया गया था।

अदालत ने आजम खान के बेटे और पूर्व विधायक अब्दुल्ला आजम खान को भी इसी मामले में 7 साल कैद की सजा सुनाई है।

मुलायम के साथी हैं आजम खान

आजम खान समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के साथी रहे हैं। खान को उत्तर प्रदेश में पार्टी का सबसे बड़ा मुस्लिम चेहरा भी माना जाता था। मुलायम सिंह के नेतृत्व में जब-जब समाजवादी पार्टी की सरकार बनी, आजम खान उसमें कैबिनेट मंत्री रहे और जब समाजवादी पार्टी की कमान अखिलेश यादव के हाथ में आई, तब भी आजम खान का दबदबा बरकरार रहा।

आजम के पास थे आठ मंत्रालय

2012 में जब अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, तब आजम खान के पास आठ मंत्रालय थे। तब विपक्षी दल आरोप लगाते थे कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सरकार में कई मुख्यमंत्री हैं। इनमें मुलायम सिंह यादव के अलावा उनके भाई शिवपाल यादव, चचेरे भाई रामगोपाल यादव और आजम खान को मुख्यमंत्री कहा जाता था।

मायावती सरकार में नंबर -2 थे सिद्दीकी

आजम खान की जैसी ही हैसियत नसीमुद्दीन सिद्दीकी की बसपा में थी। मायावती की सरकार में 2007 से 2012 के दौरान सिद्दीकी को भी नंबर दो माना जाता था।

सपा के एक वरिष्ठ नेता ने बताया, ‘नसीमुद्दीन सिद्दीकी लंबे समय से सपा नेतृत्व के संपर्क में थे। हमने सोचा कि अगर उन्हें सपा में शामिल नहीं किया गया, तो वे 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस का प्रचार करते समय मुस्लिम समुदाय के मुद्दों को मजबूती से उठा सकते हैं, जिससे कुछ मुस्लिम वोट हमारे सहयोगी दल की ओर जा सकते हैं।’

सपा के एक नेता का कहना था कि शुरुआती वक्त में पार्टी का एक गुट नसीमुद्दीन सिद्दीकी को पार्टी में शामिल करने को लेकर हिचकिचा रहा था। इसकी वजह 2017 में बसपा से जिस तरह उन्हें बाहर किया गया, यह थी।

मायावती पर लगाए थे आरोप

2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा की करारी हार के बाद नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने आरोप लगाया था कि मायावती ने उनसे 50 करोड़ रुपये की मांग की थी। इसके बाद बसपा प्रमुख ने उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में बाहर का रास्ता दिखा दिया था और उन्हें ‘टैपिंग ब्लैकमेलर’ करार दिया था। तब नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने सात ऑडियो क्लिप जारी किए थे और इनके जरिए आरोप लगाया था कि मायावती टिकट चाहने वाले उम्मीदवारों से पैसे की मांग कर रही थीं।

सिद्दीकी के आने से मिलेगी मदद

सपा नेता का कहना था कि ऑडियो क्लिप जारी करना बसपा के नेतृत्व के साथ विश्वासघात की तरह था और इसे लेकर सपा के भीतर चर्चा भी हुई थी लेकिन पार्टी नेतृत्व ने उन्हें अपने साथ लेने का फैसला किया क्योंकि नसीमुद्दीन सिद्दीकी का बुंदेलखंड और अवध के इलाकों में मुस्लिम समुदाय के बीच अच्छा-खासा असर है। सपा नेता ने यह भी कहा कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी के आने से पार्टी को मदद मिलेगी।

बसपा की सरकारों में मंत्री रहे सिद्दीकी

नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत बुंदेलखंड क्षेत्र के बांदा से की थी। वह 1991 में बांदा से चुनाव जीते और 1995, 97 और 2002 में बनी बसपा की सरकारों में मंत्री रहे। बसपा से निकल जाने के बाद नसीमुद्दीन सिद्दीकी 2018 में कांग्रेस में आए। कांग्रेस ने उन्हें पश्चिमी क्षेत्र का अध्यक्ष बनाया था।

2019 के लोकसभा चुनाव में नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने बिजनौर से चुनाव लड़ा लेकिन उन्हें करारी हार मिली और उन्हें केवल 2.34 प्रतिशत वोट ही मिले।

‘PDA’ फॉर्मूले को मिलेगी कितनी मजबूती?

सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा था कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी का पार्टी में शामिल होना बड़ी बात है क्योंकि इससे 2027 के विधानसभा चुनावों में पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) की जीत मजबूत होगी। क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर।