UP Politics: उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव अगले साल फरवरी मार्च में होने हैं। इसके चलते विपक्षी इंडिया गठबंधन के प्रमुख घटक दल यानी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने उन सीटों की पहचान करने के अपने प्रयासों को तेज कर दिया है। इन्हें वे आपस में बांट सकते हैं। हालांकि, दोनों सहयोगी दल यह स्वीकार करते हैं कि सीटों के बंटवारे का यह प्रयास एक कठिन प्रक्रिया होने वाली है।

एक तरफ AICC की लीडरशिप ने अपने सचिवों को उन सीटों की पहचान करने के लिए कहा है जिन पर वह अपने वरिष्ठ राज्य सहयोगी के साथ बातचीत में सौदेबाजी करेगी। दूसरी ओर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी सीट बंटवारे के मुद्दे पर सभी 75 जिलों के अपने पार्टी नेताओं से फीडबैक ले लिया है।

अखिलेश ने दिया पार्टी के नेताओं को निर्देश

समाजवादी पार्टी के सूत्रों ने बताया है कि अखिलेश ने राज्य भर के अपने वरिष्ठ नेताओं, सांसदों और विधायकों से अपने-अपने जिले में एक सीट की सिफारिश करने को कहा है, जिसे पार्टी बातचीत के शुरुआती चरण में कांग्रेस को दे सकती है। अखिलेश कांग्रेस के लिए 60-80 सीटों की सूची को अंतिम रूप दे रहे हैं। साथ ही सपा के संभावित उम्मीदवारों की पहचान भी कर रहे हैं, ताकि वार्ता विफल होने की स्थिति में भी उनके संभावित उम्मीदवारों का चयन किया जा सके।

कांग्रेस में दो धड़े

कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों ने कहा कि पार्टी लगभग 120 सीटों की मांग के साथ बातचीत शुरू करेगी लेकिन सपा के साथ गठबंधन के हिस्से के रूप में वह अंततः लगभग 80 सीटों पर समझौता कर सकती है।

उत्तर प्रदेश कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने कहा है कि वे पार्टी हाई कमांड को सपा के साथ गठबंधन न करने के लिए मनाने की कोशिश करेंगे। एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा, “बीजेपी यही चाहती है कि कांग्रेस और सपा का गठबंधन हो, जिससे वे तुष्टीकरण, सपा के कानून-व्यवस्था के पुराने रिकॉर्ड और अन्य मुद्दों पर हम पर हमला कर सकें।” उन्होंने यह भी कहा कि वे जल्द ही राहुल गांधी से मिलकर उन्हें सपा के साथ हाथ न मिलाने के लिए मनाएंगे।

कांग्रेस नेता ने दावा किया, “हमें चुनाव के बाद सपा के साथ गठबंधन करने में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन चुनाव में साथ जाना हमारे लिए आत्मघाती होगा।” दोनों दलों के कुछ नेता इस बात से सहमत हैं कि यदि वे जल्द ही सीट बंटवारे के समझौते को अंतिम रूप देने में सक्षम हो जाते हैं, तो उनके गठबंधन को बढ़ावा मिलेगा क्योंकि इससे उन्हें और उनके उम्मीदवारों को अपनी-अपनी सीटों पर तैयारी करने में शुरुआती बढ़त मिलेगी। हालांकि, सच यही है कि मामला काफी पेचीदा है।

दोनों तरफ असहमति की आवाजें

सपा और कांग्रेस के शीर्ष नेता 2027 के चुनावों के लिए गठबंधन बनाने के इच्छुक हैं। वहीं उनके दूसरे या तीसरे दर्जे के नेताओं का एक वर्ग इसके पक्ष में नहीं दिख रहा है, क्योंकि उन्हें अपने संभावित उम्मीदवारों के लिए कम सीटों का डर है।

सपा के कई नेताओं का दावा है कि राज्य में कांग्रेस का कोई मजबूत जनाधार नहीं है। इसके विपरीत, कुछ कांग्रेस नेताओं का कहना है कि कांग्रेस की वजह से ही सपा-कांग्रेस गठबंधन 2024 के लोकसभा चुनावों में राज्य की 80 में से 43 संसदीय सीटें जीत सका।

उनका तर्क है कि राहुल गांधी के 2024 के “संविधान बचाओ” नारे ने विभिन्न समूहों, विशेषकर दलितों को प्रभावित किया, जिससे उनके गठबंधन को भाजपा पर जीत हासिल करने में मदद मिली। इसके अलावा सपा के नेता 2022 के विधानसभा चुनावों का हवाला देते हैं, जब दोनों पार्टियों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था। उस समय कांग्रेस को 403 सीटों में से केवल दो सीटें ही जीतने का मौका मिला था और उसे मात्र 2.33% वोट मिले थे।

गठबंधन में लगातार बढ रहा तनाव

सपा और कांग्रेस के रिश्ते हमेशा उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं। अक्टूबर 2023 में दोनों पार्टियों के बीच तीखी नोकझोंक हुई है। उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने अखिलेश को ” छोटा-मोटा” कहा था इसकी शुरुआत तब हुई जब कांग्रेस ने मध्य प्रदेश चुनावों में सपा को कोई सीट देने से इनकार कर दिया, जिसके चलते सपा को 30 सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित करने पड़े।

2024 के लोकसभा चुनावों से पहले अखिलेश ने कांग्रेस पर जमकर हमला बोला और उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। हालांकि कई दिनों के तनाव के बाद राहुल गांधी से बातचीत के बाद उन्होंने आखिरकार कांग्रेस से सुलह कर ली। इसके बाद सपा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया और उसे 17 सीटें आवंटित कीं, जिससे कई लोग हैरान रह गए। उनके गठबंधन के पीछे एक अहम कारण यह समझ थी कि अगर वे अलग-अलग रास्ते अपनाते, तो राज्य में मुस्लिम वोट बंट सकते थे।

अखिलेश को नाराज कर रही है कांग्रेस

सीट शेयरिंग को लेकर सपा-कांग्रेस में किसी भी तरह की बातचीत नहीं हुई है लेकिन कांग्रेस नेताओं के बयान लगातार अखिलेश को नाराज कर रहे हैं। पिछले महीने पार्टी के दो दलित नेता, एआईसीसी के अनुसूचित जाति विभाग के अध्यक्ष राजेंद्र पाल गौतम और उत्तर प्रदेश के सांसद तनुज पुनिया, बिना किसी पूर्व सूचना के बसपा प्रमुख मायावती के लखनऊ स्थित घर पहुंच गए। हालांकि, उनसे मिलने का कोई समय तय नहीं था, इसलिए वे उनसे मिल नहीं सके।

कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार उनका यह रवैया यह संकेत देने के उद्देश्य से था कि पार्टी के पास सपा के अलावा गठबंधन के अन्य विकल्प भी हो सकते हैं। कांग्रेस ने दोनों नेताओं को कारण बताओ नोटिस जारी किया लेकिन अखिलेश इससे खुश नहीं थे। उन्होंने अपने पार्टी नेताओं से कहा है कि वे राहुल गांधी से इस बात पर चर्चा करेंगे कि ऐसे घटनाक्रमों पर अंकुश लगाना आवश्यक है जो उनके गठबंधन की संभावनाओं को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

जून 2025 में कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने यह दावा करके विवाद खड़ा कर दिया कि 2027 के विधानसभा चुनावों में “80-17 का फॉर्मूला” काम नहीं करेगा। मसूद 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए हुए सीट बंटवारे के समझौते का जिक्र कर रहे थे। समाजवादी पार्टी ने पलटवार करते हुए पार्टी सांसद और अखिलेश के चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव ने कहा था कि सीट बंटवारे पर फैसला लेने का अधिकार मसूद के पास नहीं है।

फिर से सपा पर दबाव डालेगी कांग्रेस

कांग्रेस 2024 के चुनावों के बाद से यह दावा करती रही है कि सपा ने उसे सम्मानजनक संख्या में सीटें दीं थी, लेकिन कुछ सीटों की “गुणवत्ता” उसकी प्राथमिकताओं के अनुरूप नहीं थी। मतलब ये कि कांग्रेस को वो सीटें नहीं दी गईं, जहां बीजेपी विरोधी पार्टी को अनुकूल सामाजिक समीकरणों के कारण लाभ हो सकता था।

यह विवाद बाद में विधानसभा की 12 सीटों पर हुए उपचुनावों में फिर से सामने आया, जब कांग्रेस ने चुनाव न लड़ने का फैसला किया क्योंकि उसका मानना ​​था कि सपा द्वारा प्रस्तावित कुछ सीटें जीतने योग्य नहीं थीं। सपा जिन सीटों को कांग्रेस को देने के लिए तैयार थी, उनमें गाजियाबाद और खैर शामिल थे, जिन्हें भाजपा का गढ़ माना जाता है।

कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, 2027 के चुनावों के लिए भी पार्टी सपा पर उन सीटों को छोड़ने के लिए दबाव डालेगी जिनकी सामाजिक परिस्थितियां उसके पक्ष में होंगी। मुस्लिम समुदाय जैसे साझा समर्थक आधारों के कारण यह एक कठिन कार्य हो सकता है।

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देश के 5 राज्यों में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। इसके चलते कांग्रेस पार्टी अपने दलित और अल्पसंख्यकों के वोट बैंक को साधने की कोशिश कर रही है। इसीलिए पार्टी ने अपने अल्पसंख्यक और दलित विभाग के साथ राष्ट्रीय स्तर पर एक संयुक्त अभियान शुरू करने की प्लानिंग में जुटी हुई है। पढ़िए पूरी खबर…