5 सितंबर को सचिन पायलट को पंजाब कांग्रेस का AICC महासचिव और प्रभारी नियुक्त किया गया। उन्होंने छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की जगह ली। पायलट की नियुक्ति को पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के खेमे के लिए राहत के तौर पर देखा जा रहा है जबकि अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के समर्थकों के लिए यह बड़ा झटका माना जा रहा है।

पंजाब कांग्रेस में चन्नी और वड़िंग खेमों के बीच लंबे समय से चल रही खींचतान के बीच संगठन में बड़े बदलाव की अटकलें लगाई जा रही थीं। हालांकि, राज्य कांग्रेस के भीतर बहुत कम लोगों को उम्मीद थी कि बदलाव पार्टी के महासचिव और राज्य प्रभारी के स्तर पर होगा।

यह घोषणा कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की उस बैठक के बाद हुई जिसकी अध्यक्षता लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने की थी। बैठक में पंजाब कांग्रेस में लंबे समय से चल रही गुटबाजी को लेकर चर्चा हुई। पायलट की नियुक्ति से संकेत मिलता है कि कांग्रेस पंजाब में बंटे हुए संगठन को नए सिरे से मजबूत करने की कोशिश कर रही है। हालांकि फिलहाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी (PCC) के अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को उनके पद से नहीं हटाया गया है।

चरणजीत सिंह चन्नी के खेमे में इस बदलाव को इस संकेत के तौर पर देखा जा रहा है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी नेतृत्व को लेकर उनकी चिंताओं को अब दिल्ली में कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व गंभीरता से सुन रहा है।

वड़िंग खेमे की प्रतिक्रिया

वहीं वड़िंग खेमे ने सार्वजनिक तौर पर सचिन पायलट की नियुक्ति का स्वागत किया है। लेकिन अंदरखाने इसे लेकर चिंता भी है। कुछ नेताओं को आशंका है कि AICC प्रभारी में बदलाव के बाद आगे चलकर प्रदेश कांग्रेस के नेतृत्व में भी बदलाव किया जा सकता है।

आपको बता दें कि भूपेश बघेल की नियुक्ति पंजाब के प्रभारी के तौर पर फरवरी 2025 में हुई थी। राज्य इकाई में एकजुटता लाने और लगातार मिल रही राजनीतिक चुनौतियों के बाद संगठन को मजबूत करने की यह जिम्मेदारी उन्हें दी गई थी। हालांकि, उनके कार्यकाल के दौरान पार्टी के अंदर मतभेद और गहरे होते गए।

जुलाई 2026 में कांग्रेस ने अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखने का फैसला किया। वहीं चरणजीत सिंह चन्नी को पार्टी की चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाया गया। इसके बाद दोनों खेमों के बीच खींचतान और बढ़ गई।

चन्नी खेमे में गुरदासपुर के सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा और फिरोजपुर के सांसद शेर सिंह घुबाया जैसे नेता शामिल हैं। इस खेमे ने वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने की मांग की थी। इसके साथ ही बघेल पर प्रदेश अध्यक्ष वड़िंग का पक्ष लेने का आरोप लगाया था।

पार्टी के भीतर यह धारणा मजबूत होने लगी कि AICC प्रभारी किसी एक खेमे के साथ हैं। इसका असर भी साफ दिखाई दिया। पार्टी के कार्यक्रमों में दोनों गुटों के समर्थकों ने एक-दूसरे के खिलाफ नारे लगाए, नेताओं के बीच झड़पें हुईं और पोस्टर को लेकर भी विवाद सामने आए। बघेल के पंजाब दौरे के दौरान कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं ने उनके कार्यक्रमों का बहिष्कार भी किया।

‘तटस्थ’ विकल्प के तौर पर पायलट

सचिन पायलट को कांग्रेस में अपेक्षाकृत ‘तटस्थ’ और ज्यादा सक्रिय नेता के तौर पर देखा जा रहा है। उन्होंने राजस्थान में संगठन की जिम्मेदारी संभाली है और 2013 की हार के बाद कांग्रेस को दोबारा मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई थी। वह केरल में चुनाव पर्यवेक्षक की जिम्मेदारी भी निभा चुके हैं।

पंजाब कांग्रेस के दोनों गुटों ने सार्वजनिक तौर पर पायलट की नियुक्ति का स्वागत किया है। चरणजीत सिह चन्नी ने इसे ‘महत्वपूर्ण फैसला’ बताते हुए हाईकमान का धन्यवाद किया। वहीं अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने पायलट की ‘ऊर्जा और सक्रियता’ की तारीफ की। सुखजिंदर सिंह रंधावा ने भी पायलट के नेतृत्व और लोगों से उनके जुड़ाव को सराहा।

फिलहाल पायलट की नियुक्ति का सबसे बड़ा असर यह हो सकता है कि नेतृत्व के सवाल पर लंबे समय से जारी संगठनात्मक गतिरोध टूटे। हालिया गुटबाजी से सीधे तौर पर जुड़े न होने के कारण नए AICC प्रभारी दोनों खेमों को बातचीत और साथ काम करने की कुछ गुंजाइश दे सकते हैं।

यह आने वाले दिनों में खास तौर पर महत्वपूर्ण हो सकता है। राहुल गांधी के प्रस्तावित पंजाब दौरे और इस महीने के अंत में होने वाली कांग्रेस की बस यात्रा से पहले पार्टी को एकजुट दिखने की जरूरत होगी।

पायलट का खुद का गुटबाजी से निपटने का अनुभव भी उनके काम आ सकता है। 2020 में राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ उनके मतभेद खुलकर सामने आए थे। उस घटनाक्रम से साफ हुआ था कि पार्टी के अंदर की खींचतान चुनावी संभावनाओं को कितना नुकसान पहुंचा सकती है। अब पंजाब में अलग-अलग नेताओं की महत्वाकांक्षाओं को संभालने में पायलट को अपने इसी अनुभव का इस्तेमाल करना होगा।

पायलट की नियुक्ति से कांग्रेस के संगठन में एक दिलचस्प समीकरण भी बना है। पंजाब के नेता सुखजिंदर सिंह रंधावा इस समय राजस्थान के AICC प्रभारी हैं जबकि राजस्थान के नेता सचिन पायलट को पंजाब की जिम्मेदारी दी गई है।

राजस्थान में 2028 में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में पंजाब में पायलट का प्रदर्शन राष्ट्रीय संगठन में उनकी भूमिका और राजनीतिक कद पर भी असर डाल सकता है।

असली चुनौती अभी बाकी

हालांकि, सिर्फ AICC प्रभारी को बदलने से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी क्योंकि प्रदेश नेतृत्व में कोई बदलाव नहीं किया गया है। अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग अब भी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हैं जबकि चन्नी खेमा लगातार उन्हें हटाने की मांग कर रहा है। ऐसे में मौजूदा प्रदेश नेतृत्व बने रहने तक सचिन पायलट को दोनों गुटों के बीच संतुलन बनाकर चलना होगा।

चन्नी खेमे के एक नेता ने नाम ना छापने की शर्त पर कहा, ”फिलहाल हम इस बदलाव से काफी खुश हैं। हमें डर था कि वड़िंग और बघेल के एक ही पक्ष में होने के कारण टिकट बंटवारे के समय बड़ा विवाद हो सकता है। अब कम से कम उम्मीद है कि पायलट चीजों को अलग नजरिए से देखेंगे और हमारी बात को ज्यादा खुले मन से सुनेंगे।”

उन्होंने आगे कहा, ”इसके साथ ही हमें भरोसा है कि वड़िग को जल्द ही बदला जाएगा क्योंकि चुनाव में अब ज्यादा समय नहीं बचा है और हमें पार्टी को जल्दी से चुनाव के लिए तैयार करना होगा।” बघेल की जगह पायलट को पंजाब कांग्रेस का प्रभारी बनाए जाने के बाद चन्नी खेमे में उत्साह साफ नजर आ रहा है।

सोमवार को अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने दिल्ली में सचिन पायलट से मुलाकात की। बैठक के बाद पत्रकारों से बात करते हुए पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि वह पायलट के साथ काम करने को लेकर उत्साहित हैं।

वड़िंग ने कहा, ”सचिन पायलट की देशभर में युवाओं के साथ-साथ बुजुर्गों के बीच भी अच्छी पकड़ है।” उन्होंने यह भी कहा कि भूपेश बघेल ने पंजाब में ‘बहुत अच्छा काम’ किया है।

हालांकि, राजस्थान की राजनीति में पायलट की अपनी गुटबाजी का इतिहास उनकी नई जिम्मेदारी को थोड़ा दिलचस्प बनाता है। पंजाब में अब उन्हें यह साबित करना होगा कि वह दूसरे नेताओं की महत्वाकांक्षाओं को भी उसी तरह संभाल सकते हैं जैसे कभी उन्होंने खुद अपने राजनीतिक हितों के लिए मजबूती से आवाज उठाई थी।

कांग्रेस के लिए पायलट की नियुक्ति इस बात की परीक्षा भी है कि क्या नया प्रभारी पार्टी में अनुशासन कायम कर सकता है और अलग-अलग गुटों को साथ लेकर एक मजबूत गठजोड़ बना सकता है ताकि बार-बार हाईकमान को दखल न देना पड़े।

अगर कांग्रेस पंजाब में एकजुट होकर चुनाव लड़ती है तो वह सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी को कड़ी चुनौती दे सकती है। लेकिन अगर पार्टी की अंदरूनी लड़ाई जारी रहती है तो इसका फायदा सत्तारूढ़ दल को मिल सकता है। सचिन पायलट की नियुक्ति से पंजाब कांग्रेस को एक नई शुरुआत का मौका जरूर मिला है। लेकिन इससे प्रदेश कांग्रेस में चल रहा सत्ता संघर्ष अपने आप खत्म नहीं हो जाता।

भूपेश बघेल की छुट्टी के बाद क्या राजा वड़िंग की भी होगी विदाई?

कांग्रेस हाईकमान ने आखिरकार भूपेश बघेल को पंजाब के प्रभारी के पद से हटा दिया। बघेल की जगह राजस्थान कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और युवा चेहरे सचिन पायलट को प्रभारी बनाया गया है। कांग्रेस हाईकमान के इस फैसले के बाद दो बड़े सवाल खड़े होते हैं। पहला यह कि क्या भूपेश बघेल के बाद पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग की भी छुट्टी होगी? दूसरा सवाल यह कि क्या हाईकमान के इस ताजा फैसले से पंजाब कांग्रेस में चल रही लड़ाई खत्म हो पाएगी?