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रूही सुल्ताना: कश्मीरी शिक्षिका ने दिखाई नई राह

रूही के मुताबिक, ‘मैं अपने छात्रों को पढ़ाने के लिए खेल-खेल (प्लेवे) की प्रक्रिया का इस्तेमाल करती हूं। मैं उन्हें पढ़ाने के लिए रचनात्मक तरीके इस्तेमाल करती हूं, ताकि छात्रों को कक्षा में सीखने के दौरान सभी कुछ उनके दिमाग में स्पष्ट हो सके।’

अपने अनूठे अंदाज में बच्चों को पढ़ाने पर रूही सुल्ताना को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

कश्मीर की एक महिला शिक्षिका रूही सुल्ताना को इस साल राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार प्रदान किया गया है। रूही अपने छात्रों को अनूठे अंदाज में खेल-खेल में पढ़ाती हैं। अपने इस पुरस्कार को उन्होंने अपने छात्रों और शिक्षा विभाग को समर्पित किया है।

मूल रूप से श्रीनगर नौशेरा क्षेत्र की रूही सुल्ताना प्राथमिक स्कूल में शिक्षक हैं। वे प्राथमिक विद्यालय डंगर पोरा, तेलबल श्रीनगर में सरकारी टीचर हैं। रूही ने उर्दू और कश्मीरी भाषाओं में बीएड (बैचलर आफ एजुकेशन) किया है। वहीं, सुलेख में तीन साल की डिग्री भी है। रूही कहती हैं, ‘मेरी शिक्षा सरकारी संस्थानों में हुई, क्योंकि मैंने अपनी एमए की डिग्री उर्दू और कश्मीरी भाषाओं में ली है। मैंने बीएड (बैचलर आफ एजुकेशन), सुलेख में एक डिग्री कोर्स और एक सर्टिफिकेट कोर्स हिंदी में किया है। मैं शिक्षक ही बनना चाहती थी। मुझे खुशी होती है, जब आसपास के छात्र मुझे प्रेरित करते हैं।’

रूही ने कहा, ‘मैं उर्दू और कश्मीरी विषयों के लिए एक कंटेंट क्रियेटर के तौर पर स्कूली शिक्षा से जुड़ी हूं। मैं दीक्षा में ई-कंटेंट क्रियेटर के रूप में काम करती हूं और श्रीनगर में आकाशवाणी पर प्रसारण के साथ ही छात्रों को आनलाइन क्लासेस भी उपलब्ध कराती हूं।’ वे कहती हैं कि एक शिक्षिका न केवल बच्चों को पढ़ाती है, बल्कि उन्हें मानवता के बारे में ज्ञान देकर एक बेहतर इंसान भी बनाती है।

रूही के मुताबिक, ‘मैं अपने छात्रों को पढ़ाने के लिए खेल-खेल (प्लेवे) की प्रक्रिया का इस्तेमाल करती हूं। मैं उन्हें पढ़ाने के लिए रचनात्मक तरीके इस्तेमाल करती हूं, ताकि छात्रों को कक्षा में सीखने के दौरान सभी कुछ उनके दिमाग में स्पष्ट हो सके।’ सुल्ताना के पति सुहेल भट को अपनी पत्नी को भारत के राष्ट्रपति से राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने की खबर पर गर्व है। वे कहते हैं, ‘मेरी पत्नी को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2020 मिला है। मुझे उस पर बहुत गर्व है। ये न केवल परिवार के लिए बल्कि शिक्षक बिरादरी और कश्मीर के लिए भी गर्व का क्षण है।’ सुल्ताना के मुताबिक, वे बोर्ड आफ स्कूल एजुकेशन से कंटेंट क्रिएटर के रूप में जुड़ी हैं।

साथ ही वे दीक्षा ई-कंटेंट में भी काम करती हैं। 49 वर्षीय सुल्ताना ‘लो कॉस्ट-नो कॉस्ट’ शिक्षण विधि में विश्वास रखती हैं। उनके अधिकांश छात्र जम्मू और कश्मीर में बकरवाल और गुर्जर समुदायों के गरीब परिवारों से हैं। सुल्ताना ने कम खर्च वाले पॉकेट बोर्ड, कार्ड और बच्चों के लिए अनुकूल अन्य तरीकों से अपने छात्रों को पढ़ाना चालू रखा।

वे कहती हैं कि कॉपियों और खाते खरीदना महंगा होता है। वे श्रीनगर में दुकान दर दुकान घूमकर प्लास्टिक के बड़े थैले या आटे की खाली बोरियां, इस्तेमाल की गई चीजें, दस्ते, यहां तक कि इस्तेमाल की गई चाय की पत्तियां तक मांग लेती हैं और अलग-अलग तरीके से छात्रों को पढ़ाने में उन वस्तुओं का इस्तेमाल करती हैं। वे कहती हैं, ‘मैं बोरियों का इस्तेमाल लिखने के लिए करती हूं। इस्तेमाल की गई बोतलों पर संज्ञा और शब्द विन्यास लिखती हूं। टॉफी के रैपर पर शब्द लिखकर बच्चों को उन्हें दुरुस्त करने को कहती हूं। गत्ते के बुरादे और चाय की सूखी पत्तियों का इस्तेमाल आकृतियां और अक्षर सिखाने में करती हूं।’

इस साल राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने डिजिटल माध्यम से पुरस्कार प्रदान किए। मौजूदा चुनौतीपूर्ण समय में जब स्कूल और शिक्षण गतिविधियां बाधित थीं, तब सुल्ताना के प्रयासों से प्राथमिक कक्षा के छात्रों का पठन-पाठन चलता रहा। उनके योगदान को देखते हुए राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए उनके नाम का चयन किया गया।

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