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RTI कानून में संशोधन विधेयक: प्रस्तावों को राज्यसभा की प्रवर समिति में भेजने की मांग

गजेंद्र सिंह आरटीआइ (सूचना का अधिकार) कानून में संशोधन विधेयक लोकसभा में पास होने के बाद अब राज्यसभा में गया है। लेकिन इसे लेकर विरोध की आवाज उठने लगी है। आरटीआइ कार्यकर्ताओं का सवाल है कि बिना सार्वजनिक सूचना जारी किए कानून में संशोधन का प्रस्ताव क्यों रखा गया। दिल्ली के अलावा अन्य राज्यों में […]

Author Published on: July 24, 2019 2:40 AM

गजेंद्र सिंह

आरटीआइ (सूचना का अधिकार) कानून में संशोधन विधेयक लोकसभा में पास होने के बाद अब राज्यसभा में गया है। लेकिन इसे लेकर विरोध की आवाज उठने लगी है। आरटीआइ कार्यकर्ताओं का सवाल है कि बिना सार्वजनिक सूचना जारी किए कानून में संशोधन का प्रस्ताव क्यों रखा गया। दिल्ली के अलावा अन्य राज्यों में भी प्रदर्शन चल रहा है। पिछले साल लखनऊ से आरटीआइ कार्यकर्ताओं ने हजारों लोगों से पोस्टकार्ड लिखवाकर दिल्ली भेजे थे। इन प्रस्तावों को पहले चयन समिति में भेजने की मांग की जा रही है।

विरोध जताने वालों में केंद्रीय सूचना आयुक्त एम श्रीधर आचार्युलू भी शामिल हैं, जिन्होंने पिछले साल सभी सूचना आयुक्तों को पत्र लिखकर इस प्रस्ताव को गलत बताया था। उन्होंने सभी सांसदों को पत्र लिखकर इस संशोधन को पास न होने देने की मांग की है। सतर्क नागरिक संगठन और सूचना के जन अधिकार का राष्ट्रीय अभियान (एनसीपीआरआइ) से जुड़ी अंजलि भारद्वाज कहती हैं कि संशोधन के लिए दिए गए तर्क बेबुनियाद हैं। अगर हम किसी स्वतंत्र संस्था के वेतन और सेवा नियमावली से जुड़े अधिकार सरकार को देंगे तो जाहिर है कि हम उनकी स्वतंत्रता भी छीनेंगे। बकौल अंजलि, ‘ऐसा कहीं नहीं लिखा है कि सांविधिक संस्था संवैधानिक संस्था के बराबर वेतन नहीं ले सकती।’

अंजलि कहती हैं कि हमारी मांग है कि इसे राज्यसभा में रखने से पहले प्रवर समिति (सेलेक्ट कमेटी) के पास भेजा जाए। दिल्ली में काफी पहले परिवर्तन संस्था से जुड़े रहे आरटीआइ कार्यकर्ता रामाश्रेय, लखनऊ में आरटीआइ कार्यकर्ता संजय शर्मा और तनवीर, बरेली में आरटीआइ कार्यकर्ता मुहम्मद खालिद जीलानी और डॉक्टर प्रदीप मिश्र कहते हैं कि संशोधन के बाद आरटीआइ कानून में सरकार का दखल इसे पंगु बनाएगा। मौजूदा कानून में किसी सुधार की गुंजाइश नहीं है।
संशोधन प्रस्ताव का आधार
मुख्य सूचना आयुक्त, सूचना आयुक्त, राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्तों का वेतन, भत्ते और सेवाकाल की शर्तों का निर्धारण केंद्र सरकार द्वारा होगा। केंद्र और राज्य के सूचना आयुक्तों के कार्यकाल की अवधि को भी केंद्र निर्धारित करेगा, जो मौजूदा समय में पांच साल है। चुनाव आयुक्त अनुच्छेद 324 (1) के तहत एक संवैधानिक संस्था है, जिस पर संविधान के अनुसार लोकसभा, विधानसभा और राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति के चुनाव कराने की जिम्मेदारी है, जबकि सूचना आयुक्त एक सांविधिक संस्था है जो आरटीआइ कानून 2005 के तहत बनाई गई है। इसलिए, शासनादेश के मुताबिक चुनाव आयोग और सूचना आयोग भिन्न हैं। संवैधानिक संस्था वह है, जिसके बारे में संविधान में व्यवस्था दी गई हो और सांविधिक संस्था वह है जिसे कोई कानून बनाकर स्थापित किया गया हो।

2005 से 2010 तक बतौर सूचना आयुक्त तैनात प्रोफेसर एमएम अंसारी कहते हैं कि प्रस्ताव के संशोधन से पहले इसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए था जोकि नहीं किया गया। अंसारी कहते हैं कि यह वही कानून है जिससे बड़े-बड़े घोटाले सामने आए। 2008 से 2013 तक केंद्रीय सूचना आयुक्त रहे एमएल शर्मा का कहना है कि अगर केंद्रीय और राज्य सूचना आयुक्तों की सेवा शर्तों में बदलाव किए जाते हैं तो इससे पद की गरिमा और शक्ति कम हो जाएगी।

पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्तों के तर्क

2005 से 2010 तक बतौर सूचना आयुक्त तैनात प्रोफेसर एमएम अंसारी कहते हैं कि प्रस्ताव के संशोधन से पहले इसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए था जोकि नहीं किया गया। अंसारी कहते हैं कि यह वही कानून है जिससे बड़े-बड़े घोटाले सामने आए। 2008 से 2013 तक केंद्रीय सूचना आयुक्त रहे एमएल शर्मा का कहना है कि अगर केंद्रीय और राज्य सूचना आयुक्तों की सेवा शर्तों में बदलाव किए जाते हैं तो इससे पद की गरिमा और शक्ति कम हो जाएगी।
मजबूत होगा कानून

विधेयक का मकसद अधिनियम को संस्थागत स्वरूप प्रदान करना, व्यवस्थित तथा परिणामोन्मुखी बनाना है। इससे आरटीआइ का ढांचा संपूर्ण रूप से मजबूत होगा और यह विधेयक प्रशासनिक उद्देश्य से लाया गया है।
-जितेंद्र सिंह, प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री

इस संशोधन के आने से कोई प्रभाव नहींं पड़ेगा। सिर्फ चुनाव आयोग की नियुक्ति और वेतन से संबंधित फैसले लेने का अधिकार अब केंद्र सरकार के पास होगा।
-विजय गोयल, राज्यसभा सांसद

वर्तमान संशोधन विधेयक अधिनियम को और सुव्यवस्थित और संस्थागत बनाएगा और साथ ही साथ आरटीआइ अधिनियम के निष्पादन में और भी आसानी लाएगा।
-जेपी नड्डा, राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष, भाजपा

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