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नई शिक्षा नीति: RSS से जुड़ी संस्था के विरोध के बावजूद विदेशी यूनिवर्सिटी को परमिशन, जानें क्या बदला

केंद्रीय कैबिनेट ने 34 साल बाद देश की नई शिक्षा नीति (NEP-2020) के ड्राफ्ट को मंजूरी दी है, इसे पूर्व इसरो प्रमुख के कस्तूरीरंगन के नेतृत्व वाली कमेटी ने तैयार किया है।

New Education Policy, NEP-2020, Indiaनई शिक्षा नीति 2020 को इसी हफ्ते कैबिनेट की मंजूरी मिल गई। (फाइल फोटो)

केंद्रीय कैबिनेट ने 34 साल बाद देश की नई शिक्षा नीति को मंजूरी दे दी है। इसमें देश के मौजूदा शिक्षा ढांचे को बदलने के लिए कई प्रस्ताव हैं। नई एजुकेशन पॉलिसी (NEP-2020) का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए इसरो के पूर्व प्रमुख के कस्तूरीरंगन की कमेटी ने देशभर की अलग-अलग संस्थाओं से जानकारियां लीं। इनमें एक बड़ी आवाज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की भी रही। बताया गया है कि आरएसएस से जुड़े कुछ लोगो भी शिक्षा नीति की ड्राफ्टिंग में शामिल रहे हैं। इसके लिए बकायदा संघ के कार्यकर्ताओं, भाजपा शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री, सरकार के प्रतिनिधि और शिक्षा नीति के ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष की मुलाकात भी हुई।

भाषा के फॉर्मूले पर: हालांकि, केंद्रीय कैबिनेट ने जिस शिक्षा नीति को मंजूरी दी है, उसमें सरकार बीच का रास्ता अपनाती दिखी है। माना जा रहा है कि संघ के सुझाव के मुताबिक ही एचआरडी मंत्रालय का नाम बदलकर शिक्षा मंत्रालय करने पर सहमति बनी। संघ की अन्य कई मांगों पर केंद्र सरकार ने दूरी बना ली। खासकर बच्चों के लिए एक स्टेज पर तीन भाषाओं के फॉर्मूले के प्रस्ताव पर। केंद्र सरकार ने उस प्रावधान को महत्व नहीं दिया है, जिसमें हिंदी को 6वीं क्लास के बाद अनिवार्य भाषा करार दिया गया था। खासकर तमिलनाडु के राजनीतिक दलों के विरोध के बाद, जिन्होंने इसे हिंदी को थोपने की तरकीब बताया था।

बता दें कि कस्तूरीरंगन कमेटी ने ड्राफ्ट का जो पहला प्रारूप केंद्र को सौंपा था, उसें कहा गया था कि क्लास-6 के आगे छात्र को पढ़ाई जाने वाली तीन भाषाओं में एक को बदलने की छूट दी जा सकती है। इससे हिंदी बोलने वाले राज्यों के छात्र हिंदी और अंग्रेजी के साथ देश की किसी अन्य भाषा को पाठ्यक्रम का हिस्सा रख सकते हैं। हालांकि, गैर-हिंदी भाषी राज्यों के लिए भी इसी फॉर्मेट को रखते हुए हिंदी-इंग्लिश के साथ स्थानीय भाषा को अनिवार्य किया गया था।

लेकिन केंद्रीय कैबिनेट ने बुधवार को जिस ड्राफ्ट को मंजूरी दी, उसमें भाषाई मामलों के लिए राज्यों को ज्यादा छूट दी गई है और कहा गया है कि किसी भी राज्य पर कोई भाषा नहीं थोपी जाएगी। यानी छात्र जो भाषा सीखेंगे वो राज्य सरकार, क्षेत्र और खुद छात्रों का चुनाव होगा, जब तक तीन में से दो भाषाएं स्थानीय ही होंगी।

विदेशी यूनिवर्सिटी के फॉर्मूले पर: दूसरी तरफ आरएसएस से जुड़े संगठन स्वदेशी जागरण मंच के कड़े विरोध के बावजूद नई शिक्षा नीति में विदेशी यूनिवर्सिटियों के लिए भारत में कैंपस खोलने का प्रावधान जोड़ा गया है। हालांकि, इसके साथ ही आरएसएस की भारत के प्राचीन ज्ञान पर जोर देने की बात को नई नीति में रखा गया है। ड्राफ्ट में कहा गया है कि इस तरह के तत्व छात्रों को स्कूली पाठ्यक्रम के जरिए सही और वैज्ञानिक जरियों से ही पढ़ाए जाएंगे। नई शिक्षा नीति पर आरएसएस से जुड़े लोगों ने कहा कि उनकी मांगों को माना गया और वे नई नीति से काफी खुश हैं।

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