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‘शतरंजी चाल’ से जम्मू कश्मीर में बंटवारे के समय आए शरणार्थियों के छीने गए अधिकार: संघ

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने आरोप लगाया है कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय को सुनिश्चित करने वाले भारतीय संविधान के अनुच्छेद 38 की काट में ‘‘शतरंजी चाल’’ चल के अनुच्छेद 35ए को आपत्तिजनक तरीके से संविधान में नत्थी कर दिया गया जिसके चलते जम्मू कश्मीर में बंटवारे के समय पाकिस्तान से आए समुदाय की पांचवी […]

Author July 21, 2015 12:30 AM

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने आरोप लगाया है कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय को सुनिश्चित करने वाले भारतीय संविधान के अनुच्छेद 38 की काट में ‘‘शतरंजी चाल’’ चल के अनुच्छेद 35ए को आपत्तिजनक तरीके से संविधान में नत्थी कर दिया गया जिसके चलते जम्मू कश्मीर में बंटवारे के समय पाकिस्तान से आए समुदाय की पांचवी पीढ़ी भी आज तक शरणार्थी है।

संघ के मुखपत्र ‘पांचजन्य’ के संपादकीय में कहा गया है कि इन शरणार्थियों के साथ ही जम्मू कश्मीर में रह रहे गोरखा और बाल्मिकी समुदाय की भी यही कहानी है।

इसमें कहा गया, ‘‘राज्य के अन्य नागरिकों के मुकाबले इन लाखों लोगों के अधिकार षडयंत्रकारी तौर तरीके अपनाते हुए सीमित रखे गए। हैरानी की बात है कि यह सब संविधान के नाम पर और अनुच्छेद 35ए को आगे रखते हुए किया गया।’’

लोकसभा चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी द्वारा ‘अच्छे दिन’ आने के नारे के संदर्भ में संपादकीय में कहा गया, ‘‘जाहिर है, देशव्यापी परिवर्तन के बाद अच्छे दिनों की आस सबको है। जम्मू कश्मीर के उन लाखों लोगों को भी जिनके सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक अस्तित्व को नकारने का काम अब तक महामहिम के आदेश का लबादा ओढ़ कर किया जाता रहा।’’

संघ ने कहा, ‘‘14 मई 1954 को शुरू हुई हजारों लोगों के साथ छल की इस कहानी में कौन कौन शामिल रहा और किसे अंधेरे में रखा गया, यह कहने का अब कोई मतलब नहीं क्योंकि राज्य की जनता के अधिकारों को काटने वाली वह निर्मम कुल्हाड़ी आज भी उसी तरह चल रही है।’’

उल्लेखनीय है कि इस समय केंद्र में भाजपा नीत नरेंद्र मोदी सरकार है और जम्मू कश्मीर में पीडीपी, भाजपा की गठबंधन सरकार है।

पांचजन्य के इसी अंक में प्रकाशित एक लेख में कहा गया है कि अपने आप को पंथनिरपेक्ष कहने वाली जम्मू कश्मीर सरकार हर साल 13 जुलाई को ‘शहीद दिवस’ मनाकर उन हिन्दुओं के जले पर खुलेआम नमक छिड़कती है जिन्हें एक मजहबी उन्मादी आंदोलन के कारण अलगाववादियों के हाथों निर्मम अत्याचार सहने पड़े थे।

लेख में कहा गया है कि 13 जुलाई 1931 को राज्य में घटी घटनाएं तब तक पूर्वाग्रह से मुक्त नहीं होंगी जब तक उनके पक्ष में प्रामाणिक और निष्पक्ष तथ्य नहीं रखे जायेंगे। ‘‘तभी तय हो पायेगा कि इन साम्प्रदायिक दंगों में पुलिस और सेना की गोलीबारी में मारे गए लोगों को क्या शहीद घोषित किया जाना चाहिए?’’

इसमें दावा किया गया कि एक ब्रिटिश सैनिक अधिकारी ने एक मजहबी उग्रवादी को रसोईए के रूप में पेशावर से कश्मीर में प्रवेश करने में मदद की थी और उसी के कथित भड़काऊ भाषणों के चलते उसे गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया गया। उसके मामले की सुनवाई जब 13 जुलाई 1931 को शुरू हुई तो उसी दिन श्रीनगर और अन्य उपनगरों में साम्प्रदायिक दंगे फैल गए जिसमें कथित तौर पर बड़े पैमाने पर हिन्दुओं के घर और दुकाने जलाये गए।

पांचजन्य में कहा गया, ‘‘पुलिस और सेना की गोलीबारी में 22 लोग मारे गए और आजादी के बाद यहां रहीं तमाम सेकुलर सरकारें हर साल इस ‘काले दिवस’ को ‘शहीद दिवस’ के रूप में मनाती आ रही है। मुस्लिमों के हाथों जुल्म के शिकार समुदायों के जले पर नमक छिड़कती रहीं और उन्माद की आग भड़काये रखी गई।’’

इसी लेख में संघ के वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश कुमार के हवाले से कहा गया कि जम्मू कश्मीर में पाकिस्तान का झंडा फहराने वालों के खिलाफ लोगों में भारी आक्रोश है और हर भारतवासी चाहता है कि ऐसे लोगों के खिलाफ केवल कानूनी कार्रवाई ही न हो बल्कि उन्हें पाकिस्तान भेज देना चाहिए।

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