पश्चिम बंगाल में बीजेपी की शानदार जीत के महज तीन हफ्तों बाद राज्य के शैक्षणिक संस्थानों में वैचारिक बदलाव की प्रक्रिया में तेजी दिखाई देने लगी है। ऐसा इसलिए क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से संबद्ध संगठन उन परिसरों, स्टाफ रूम और शैक्षणिक नेटवर्कों में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए आक्रामक रूप से आगे बढ़ रहे हैं जिन पर लंबे समय से वामपंथी दलों और तृणमूल कांग्रेस का वर्चस्व रहा है।
उत्तर बंगाल की कॉलेज कैंटीन से लेकर कोलकाता के विश्वविद्यालय विभागों तक बिना ज्यादा शोर-शराबे के स्पष्ट रूप से बदलाव दिख रहा है।
पश्चिम बंगाल की छात्र राजनीति में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) दशकों तक हाशिए में रही लेकिन राज्य में बीजेपी की जीत के बाद अचानक उसकी सदस्यता के लिए आने वाले आवेदनों में बढ़ोतरी हुई है। साथ ही व्हाट्सऐप पर जानकारी हासिल करने वालों की संख्या भी बढ़ी है और परिसर में यूनिट बनाने के लिए भी ज्यादा निमंत्रण मिल रहे हैं।
एबीआरएसएम को मिल रहा अभूतपूर्व समर्थन
शिक्षकों, प्रोफेसरों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों के बीच भारतीय शिक्षण मंडल और अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षणिक महासंघ (एबीआरएसएम) को अभूतपूर्व समर्थन मिल रहा है। चुनाव नतीजों ने लगभग आधी सदी में पहली बार बंगाल के वैचारिक और राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया है।
आरएसएस के वरिष्ठ नेता जिष्णु बसु ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, “हिंदू राष्ट्रवाद और ‘वंदे मातरम्’ गीत की उत्पत्ति बंगाल की धरती से हुई है। कई दशकों तक यह कोशिश की गई कि हम अपने इतिहास, संस्कृति और जड़ों को भूल जाएं। अब बंगाल ने अपनी जड़ों की ओर लौटने का फैसला किया है।”
एबीआरएसएम का दावा है कि बंगाल में उसके सदस्यों की संख्या 10 हजार से भी कम थी लेकिन अब यह एक लाख के पार जा सकती है। संगठन ने कहा है कि शिक्षकों, कॉलेज कर्मचारियों और विश्वविद्यालय के कर्मचारी उसके साथ जुड़ना चाहते हैं।
कई जिलों में ऐसे शिक्षक, जो पहले संघ से जुड़े संगठनों के साथ आने में हिचकिचाते थे, अब बंद कमरे में आयोजित ओरिएंटेशन बैठकों में शामिल हो रहे हैं। दूसरी ओर, ऐसे छात्र जो पहले ABVP की रैलियों से दूर रहते थे, अब खुद कार्यक्रम आयोजित करना चाहते हैं।
कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में बन रहा एबीवीपी का नेटवर्क
एबीवीपी नेताओं ने दावा किया कि चुनाव नतीजों से पहले उनके छात्र संगठन की उपस्थिति केवल 96 कॉलेजों में थी लेकिन महज दो सप्ताह में यह संख्या 400 से अधिक हो गई है। एबीवीपी का कहना है कि औपचारिक सदस्यता अभियान 9 जून से शुरू होगा लेकिन उससे पहले ही कई कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में नेटवर्क बनना शुरू हो गया है।
एबीवीपी दक्षिण बंगाल के सचिव नीलकंठ भट्टाचार्य ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, ”विभिन्न कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के कई छात्र हमसे संपर्क में हैं और एबीवीपी में शामिल होना चाहते हैं तथा अपने कॉलेजों या विश्वविद्यालयों में एबीवीपी की इकाइयां खोलना चाहते हैं। लेकिन टीएमसी के विपरीत, एबीवीपी में शामिल होने के लिए सही प्रक्रिया का पालन करना और आने से पहले पूरी जांच-पड़ताल करना आवश्यक है।”
कई परिसरों में समितियों की तुरंत घोषणा करने के बजाय एबीवीपी के आयोजकों ने व्हाट्सऐप ग्रुप बनाए हैं साथ ही आने वाले नेताओं की जांच भी की जा रही है।
शिवसेना जैसा होगा TMC का हाल?
पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन हुए दो हफ्ते से ज्यादा का समय बीत चुका है। राज्य में तीन कार्यकाल तक अपना एकछत्र राज चलाने वालीं पूर्व सीएम ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी चुनाव हारने के बाद से चुनौतियों का सामना कर रही है, क्योंकि लगातार उसके नेता पार्टी छोड़ रहे हैं। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर।
