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महाराष्ट्र के को-ऑपरेटिव बैंक में 513 करोड़ का घोटाला, पूर्व विधायक सहित 76 लोगों पर मामला दर्ज

इस बैंक की रायगढ़, पुणे और रत्नागिरी जिलों की 17 शाखाओं में लगभग 40,000 जमाकर्ता हैं। इसके बावजूद बैंक दबाव का सामना कर रहा था जिसके चलते पिछले साल निकासी 5,000 रुपये तक सीमित थी।

तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (एक्सप्रेस आर्काइव फोटो)

नवी मुंबई पुलिस ने मंगलवार को पनवेल स्थित कर्नाला नगरी सहकारी बैंक में 512.5 करोड़ रुपये की कथित अनियमितता के लिए एक पूर्व विधायक सहित 76 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। 512.5 करोड़ के गबन के आरोप में सहकारी बैंक के 12 पदाधिकारियों सहित 76 व्यक्तियों के खिलाफ सोमवार को एफ़आईआर दर्ज की गई है। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की रिपोर्ट के मुताबिक रायगढ़ जिले के सहयोग विभाग के विशेष ऑडिटर उमेश तुपे ने पूर्व किसानों और वर्कर्स पार्टी (पीडब्ल्यूपी) के विधायक और बैंक के संस्थापक-अध्यक्ष विवेकानंद पाटिल को मुख्य आरोपी बताया है। तुपे ने कहा कि जांच में पाया गया है कि लोन बिना किसी सिक्योरिटी के लिए गए थे और ये पैसे पाटिल द्वारा नियंत्रित ट्रस्टों के खातों में डाइवर्ट किए गए हैं।

इस बैंक की रायगढ़, पुणे और रत्नागिरी जिलों की 17 शाखाओं में लगभग 40,000 जमाकर्ता हैं। इसके बावजूद बैंक दबाव का सामना कर रहा था जिसके चलते पिछले साल निकासी 5,000 रुपये तक सीमित थी। बैंक उपाध्यक्ष, सीईओ और निदेशक मंडल के नाम पनवेल सिटी पुलिस स्टेशन में दर्ज़ की गई एफआईआर में हैं।

आरोपियों पर धोखाधड़ी, जालसाजी और दस्तावेजी सबूतों को गायब करने और द महाराष्ट्र प्रोटेक्शन ऑफ इंटरेस्ट ऑफ डिपॉजिटर्स अधिनियम 1999, और महाराष्ट्र सहकारी सोसायटी अधिनियम के तहत मामला दर्ज़ किया गया है।

चार महीने की छानबीन के बाद आरबीआई को ऑडिट रिपोर्ट सौंपी गई। रिपोर्ट में बताया गया है  कि आरोपियों ने बैंकिंग नियमों और विनियमों का उल्लंघन किया है। 2008 के बाद से बैंकों में राशि, गबन के इरादे से जमा की गई है और नकली उधारकर्ताओं के लोन के वितरण को सक्षम करने के लिए दस्तावेजी सबूतों में हेरफेर किया गया और उन्हें नष्ट कर दिया गया।

तुपे ने बताया ‘बैंक के वित्तीय लेनदेन के ऑडिटिंग के दौरान, यह पाया गया कि पदाधिकारियों ने लोन बिना बिना उचित कागजात उपलब्ध कराए ही वितरित कर दिए थे। व्यवसाय ऋण उन आवेदकों को वितरित किए गए थे जिनके पास कोई व्यवसाय था ही नहीं।

इसके अलावा लोन लेने वाले इस बात से अनभिज्ञ थे कि व्यावसायिक ऋण उनके नाम पर वितरित किए गए हैं और बाद में बैंक के अध्यक्ष विवेकानंद पाटिल द्वारा संचालित ट्रस्टों के खातों में भेज दिए गए।

 

धोखाधड़ी और जालसाजी ने बैंक को वित्तीय संकट में डाल दिया, जिससे ग्राहकों द्वारा दिसंबर में निकासी को 5,000 रुपये तक सीमित कर दिया गया। पहले भी, जमाकर्ताओं को बार-बार निकासी के लिए बैंक शाखाओं का दौरा करने के लिए बनाया जा रहा था।’

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