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राजनीति: दम तोड़ती नदियां

नदियों के जल प्रवाह और उनके जीवन की रक्षा के लिए समाज से लेकर सरकारों के स्तर पर जो उपेक्षा होती आई है, उसी का परिणाम है कि आज नदियों का जीवन समाप्त हो रहा है। देश की लगभग साढ़े चार हजार नदियां गायब हो चुकी हैं और उनकी अनुगामी बन कर अन्य नदियां अपना अस्तित्व समाप्त होने की बाट जोह रही हैं।

Author Updated: October 27, 2020 5:10 AM
नदी प्रदूषण बनी समस्‍या।

दिनेश प्रसाद मिश्र

नदियां मानव सभ्यता की जीवनधारा हैं, जो मानव जीवन के साथ-साथ समस्त जीव-जंतुओं एवं पेड़ पौधों सहित समस्त सभ्यता को जीवन का आधार प्रदान करते हुए उन्हें गति प्रदान करती हैं। लेकिन आज यही नदियां अपने अस्तित्व के संकट? से गुजर रही हैं। अगर यही हालात बने रहे तो वह दिन दूर नहीं जब नदियां सूख चुकी होंगी और उनका अस्तित्व ही नहीं बचेगा। इसलिए यहां यह प्रश्न उठता है कि जल की अगाध राशि से पूरित पृथ्वी की इन जीवन दायिनी नदियों की स्थिति ऐसी क्यों होती जा रही है? प्राकृतिक रूप से पर्याप्त जल प्राप्त होने के बाद भी इनमें जल का अभाव क्यों हो जा रहा है? जरा विचार करें तो नदियों की दयनीय दशा के कारण और समाधान हमारे समाज और व्यवस्था में ही मौजूद हैं।

आज नदियां देश एवं समाज के अनियंत्रित विकास का शिकार हो गई हैं। जहां एक ओर उनका पानी अनियंत्रित और असीमित मात्रा में कृषि भूमि की सिंचाई और औद्योगिक विकास के नाम पर निकाला जा रहा है, वहीं दूसरी ओर उनके प्रवाह पथ को विकास के नाम पर अतिक्रमण कर बाधित किया जा रहा है। साथ ही, नदियों के भरण क्षेत्र में निरंतर खड़े हो रहे कंकरीट के जंगलों के कारण वृक्षों के असीमित कटान से भूगर्भ में जल संवर्धन का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। प्रवाह पथ बाधित हो जाने के कारण वे अपने साथ कंक्रीट के जंगलों के मलबे, मिट्टी, पेड़-पौधे आदि स्वयं लाती हैं जो उनके प्रवाह पथ में जमा होकर स्वयं भी जल प्रवाह की राह को बाधित करते हैं और गाद को जन्म देकर उनके जल प्रवाह क्षेत्र को उथला बनाते हैं। नदियों में आया यह संकट पूर्णतया मानव निर्मित है जिस पर अंकुश लगा कर नदियों को जीवनदान दिया जा सकता है।?

उत्तर प्रदेश की गंगा, यमुना, गोमती, घाघरा, केन, राप्ती सहित अनेक नदियों में पानी घट कर नाम मात्र का रह गया है। इन्हें देख कर लगता है कि अब ये नदियां अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं। आज गंगा दुनिया की प्रदूषित नदियों में से एक है। गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए सरकारी स्तर पर लंबे समय से प्रयास चल रहे हैं, लेकिन अभी तक स्थिति में जरा फर्क नजर नहीं आया है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अपने अध्ययन में कहा है कि देश भर के नौ सौ से अधिक शहरों और कस्बों का सत्तर फीसद गंदा पानी नदियों में बिना शोधन के ही छोड़ दिया जाता है। कारखाने भी नदियों को प्रदूषित कर रहे हैं। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की यमुना और उसकी समीपवर्ती काली व हिंडन नदी इसके उदाहरण हैं।

इसी प्रकार ग्वालियर की स्वर्णरेखा नदी और मुरार नदी जो कभी इस शहर की जीवन रेखा हुआ करती थी, आज नाले में तब्दील हो चुकी है। यह स्थिति देश की ज्यादातर नदियों के साथ है। गंगा, यमुना, गोमती, नर्मदा, राप्ती, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, तापी, ब्रह्मपुत्र, झेलम, सतलुज, चेनाव, रावी, व्यास, सरयू, रामगंगा, बूढ़ी गंडक नदियां हों या इनकी सहायक नदियां, सभी अतिक्रमण और प्रदूषण से जूझ रही हैं।

नदियों के जल प्रवाह और उनके जीवन की रक्षा के लिए समाज से लेकर सरकारों के स्तर पर जो उपेक्षा होती आई है, उसी का परिणाम है कि आज नदियों का जीवन समाप्त हो रहा है। देश की लगभग साढ़े चार हजार नदियां गायब हो चुकी हैं और उनकी अनुगामी बन कर अन्य नदियां अपना अस्तित्व समाप्त होने की बाट जोह रही हैं। ऐसी नदियों का अस्तित्व केवल वर्षा ऋतु में सामने आता है। वर्षा ऋतु बीत जाने के बाद वह प्राय: जल विहीन होकर या तो सूख जाती हैं या फिर औद्योगिक कचरे, और जहरीले रसायनों का नाला बन जाती हैं।

नदियों में निरंतर कम हो रहे जलस्तर के कारण नदियां या तो मौसमी बनती जा रही हैं या तो पूरी तरह सूख रही हैं। केरल में भारत पूजा, कर्नाटक में काबिल, तमिलनाडु में कावेरी पलार, उड़ीसा में मुसल और मध्यप्रदेश में क्षिप्रा नदियां सूखने के कगार पर पहुंच गई हैं। इनकी अनेक सहायक छोटी-छोटी नदियां तो गायब ही हो गई हैं। गोदावरी पूर्व में कई जगहों पर सूख चुकी है। कावेरी अपना चालीस प्रतिशत जल प्रवाह खो चुकी है। कृष्णा और नर्मदा में लगभग साठ फीसद पानी कम हो चुका है।

आज देश के प्रत्येक शहर में अनेक ऐसे गंदे नाले हैं जो कभी नदी के रूप में बहा करते थे। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में बह रही यमुना नदी औद्योगिक कचरे और शहरी गंदगी के कारण अपना अस्तित्व खोने के कगार पर पहुंच चुकी है। शहर के कचरे और सीवर को ढोता हुआ यमुना नदी में पहुंचाने वाला नजफगढ़ नाला आज दिल्ली वासियों के लिए गंदा नाला है और उसे समस्त दिल्ली गंदे नाले के रूप में ही जानती है। किंतु यह तो शायद ही किसी के संज्ञान में होगा कि इस नाले का स्रोत कभी नजफगढ़ झील हुआ करती थी, जो साहिबी नदी से जुड़ी थी। किंतु समय के प्रवाह में अब साहिबी नदी और झील दोनों का ही अस्तित्व समाप्त हो चुका है और बचा है केवल नजफगढ़ का नाला।

इसी तरह लुधियाना का बूढ़ा नाला भी इसका एक उदाहरण है, जो एक पीढ़ी पूर्व निर्मल जल से युक्त प्रवाहमान बूढ़ी नदी के रूप में बहता था। किंतु अब वह भी एक गंदे नाले में बदल चुका है। प्रतिवर्ष बरसात के मौसम में मुंबई का जो हाल होता है. वह कम चिंताजनक नहीं है। पूरा शहर विशाल दरिया का स्वरूप ग्रहण कर लेता है और जनजीवन ठप हो जाता है। मुंबई में कभी जीवन रेखा के रूप में जानी जाने वाली मीठी नदी हुआ करती थी। इस नदी का अस्तित्व अब मिट चुका है और यह नाले में बदल चुकी है। इसका कारण अतिक्रमण रहा है। अतिक्रमण के कारण वर्षा ऋतु में यह नाला अवरुद्ध हो जाता है और पानी को बहाव का मार्ग न मिलने के कारण पूरा का पूरा शहर भयानक बाढ़ का सामना करता है।

देश की ज्यादातर नदियां पर्याप्त जल के अभाव और दूषित जल एवं औद्योगिक कचरे के संभरण से आज अपने मूल स्वरूप का परित्याग कर गंदे नाले में परिवर्तित होकर बहने के लिए बाध्य हैं। नदियों में हो रहा यह परिवर्तन मात्र उनका अपना स्वरूप परिवर्तनों नहीं है, अपितु उससे पारिस्थितिकी में भी प्रतिकूल बदलाव देखने को मिल रहे हैं। नदियां अपने अंतस्थल और तटवर्ती क्षेत्रों को प्रभावित करने के साथ-साथ अपने बहाव क्षेत्र से सैकड़ों मील दूर के परिवेश को भी प्रभावित करती हैं। यही कारण है कि नदियों में निवास करने वाले जीव-जंतु तो लगभग समाप्त ही हो रहे हैं, उनके समीप तटवर्ती इलाकों में रहने वाले जीव जंतु और पेड़ पौधों के साथ साथ मानव जीवन भी प्रभावित हो रहा है।

ऐसे विकट हालात से बचाव का एक ही रास्ता है कि व्यापक स्तर पर जल संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में कार्य कर भूगर्भ के जल स्तर को बढ़ाया जाए। तटवर्ती क्षेत्रों में व्यापक स्तर पर वृक्षारोपण हो, और नदियों के प्रवाह पथ में हुए अतिक्रमण को तत्काल कब्जा मुक्त करते हुए नदियों में जाने वाले औद्योगिक कचरे व प्रदूषित जल को नदियों में गिरने से अनिवार्य रूप से रोका जाए। ऐसा करने से ही मृत्यु की ओर उन्मुख हो रही नदियों को जीवनदान दिया जा सकता है। अन्यथा लुप्त हो चुकी अनेक छोटी नदियों की भांति विकास एवं सभ्यता, संस्कृति की आधार ये नदियां भी एक दिन इतिहास बन चुकी होंगी।

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