300 तक कर्मचारियों वाली कंपनियां बिना इजाजत लोगों को निकाल सकेंगी, 15 दिन का नोटिस काफ़ी; जानें संशोधित मसौदे की और बातें

सुंदर के मुताबिक, "ज्यादातर चीजें इलेक्ट्रॉनिक प्रक्रिया पर छोड़ दी गई हैं, जिसका मतलब है कि कंपनियां या नियोक्ता, छोटे या बड़े या फिर ट्रेड यूनियन या श्रम विभाग/ट्रिब्यूनल इन सभी के पास इलेक्ट्रॉनिक कम्युनिकेशन सिस्टम होना जरूरी है। यह बड़ा टास्क है।"

Author Translated By अभिषेक गुप्ता नई दिल्ली | Updated: October 31, 2020 9:15 AM
trade unions, labour laws, new labour laws passed, Industrial Relations Codeतस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फाइल फोटो)

संसद में पिछले महीने तीन लेबर कोड्स का रास्ता साफ होने के बाद रोजगार मंत्रालय ने इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड के लिए ड्राफ्ट रूल्स का पहला सेट जारी कर दिया है। मसौदे में संशोधन के तहत कर्मचारियों के लिए हड़ताल करने से जुड़ी परिस्थितियों में बदलाव कर दिया गया है। साथ ही 100 के बजाय अब 300 की संख्या तक कर्मचारियों वाली कंपनियां अब बिना सरकार की इजाजत लोगों को निकाल सकेंगी। यही नहीं, 15 दिन का नोटिस भी काफी माना जाएगा।

ड्राफ्ट रूल्स (एक महीने तक के लिए इन्हें जन प्रतिक्रिया के लिए रखा गया था) में अधिकतर संपर्क/कम्युनिकेशन के लिए इलेक्ट्रॉनिक मेथड्स का प्रस्ताव है, जिसमें सभी औद्योगिक इकाइयों के लिए ई-रजिस्टर मेंटेन करना है। साथ ही छंटनी (Lay-Offs) के संबंध में कंपनियों को 15 पहले नोटिस, हटाए जाने (Retrenchments) पर 60 दिन पहले नोटिस और कंपनी बंद करने पर 90 दिन पहले नोटिस देना होगा।

हालांकि, नियमों में मॉडल स्टैंडिंग ऑर्डर को छोड़ दिया गया है और ट्रेड यूनियनों के लिए रूल्स का निर्माण राज्य सरकारों पर छोड़ दिया है। इस कदम पर एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह देश भर में नियम बनाने में विचलन पैदा करेगा।

XLRI में प्रोफेसर और लेबर इकनॉमिस्ट केआर श्याम सुंदर ने बताया, “मॉडल स्टैंडिंग ऑर्डर सबसे अहम चीज थी। केंद्र सरकार इसे बना सकती है और कंपनियां उसे अमल में ला सकती हैं और तब वह जाकर स्टैंडिंग ऑर्डर होगा। सरकार हो सकता है कि इसके लिए अधिसूचना का इस्तेमाल करे। पहले इसका इस्तेमाल नियमों के साथ किया जाता था, पर अभी तक इसे नहीं लाया गया है, जो कि सही प्रक्रिया नहीं है।”

राजनीतिक सहयोग से संबंधित नियम या फंड्स का इस्तेमाल या फिर ट्रेन यूनियंस के लिए मोलतोल और बात करने वाले परिषद को भी राज्य सरकारों द्वारा आखिरी रूप दिया जाना बाकी है। सुंदर के मुताबिक, “ज्यादातर चीजें इलेक्ट्रॉनिक प्रक्रिया पर छोड़ दी गई हैं, जिसका मतलब है कि कंपनियां या नियोक्ता, छोटे या बड़े या फिर ट्रेड यूनियन या श्रम विभाग/ट्रिब्यूनल इन सभी के पास इलेक्ट्रॉनिक कम्युनिकेशन सिस्टम होना जरूरी है। यह बड़ा टास्क है।”

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