शाम के 4 बजे हैं। बिहार के मधुबनी जिले में महरैल रेलवे स्टेशन के एक प्लेटफॉर्म पर दो ट्रक खड़े हैं। पास ही एक गाय पॉलीथीन की शीटों से भरी रेलवे पटरियों को पार कर रही है। दूसरे प्लेटफ़ॉर्म के दूसरे छोर पर महिलाओं का एक समूह ट्रेन का इंतजार कर रहा है। वे इस लगभग खाली स्टेशन पर अकेली यात्री हैं।

अधिकांश लोगों के लिए महरैल रेलवे स्टेशन पूर्वी मध्य रेलवे जोन के सकरी-झंझारपुर-लौकहा बाजार लाइन पर स्थित एक शांत, साधारण सा स्टेशन है, जिसे देखते ही नजर अंदाज किया जा सकता है। लेकिन राम शंकर कुशवाहा के लिए, यह जगह उनके दिल के बेहद करीब है, जहां उन्होंने घंटों ट्रेनों के सपने देखे हैं। यहीं पर वे ट्रेन में बैठने का मौका पाने के लिए इंतजार करते थे, भले ही वह सिर्फ अगले स्टेशन तक ही क्यों न हो। आखिर, उनका घर मधुबनी के महेशपुरा गांव में मात्र 400 मीटर दूर है।

यह वही जगह है जहां 15 साल के शंकर ने एक अनजान ट्रेन में सवार होकर आखिरकार मध्य प्रदेश के ग्वालियर में लगभग 1000 किलोमीटर दूर अपना सफर तय किया, एक ऐसा कृत्य जिसने अंततः उन्हें 21 सालों तक अपने परिवार से अलग कर दिया।

36 साल के शंकर अपने परिवार से फिर से मिल पाए

7 सितंबर को 36 साल के शंकर अपने परिवार से फिर से मिल पाए। यह सब ग्वालियर के डीएसपी संतोष पटेल के फेसबुक पर पोस्ट किए गए एक वीडियो की वजह से हुआ। पटेल ने सरकारी आश्रम ‘स्वर्ग सदन’ का दौरा किया था, जहां शंकर पिछले आठ सालों से रह रहे थे। वहां उन्होंने एक वीडियो बनाया जिसमें ‘मुरेठा’ (उत्तर भारत के किसान सिर पर जो पारंपरिक पगड़ी पहनते हैं) पहने एक व्यक्ति ने अपना परिचय बिहार के आनंद नगर के शंकर कुशवाहा के तौर पर दिया।

डीएसपी संतोष पटेल ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “मैं उनकी मुस्कान से प्रभावित हुआ और मैंने अपनी पोस्ट में इसका जिक्र किया, जिससे आखिरकार उन्हें ढूंढने में मदद मिली। मुझे बहुत खुशी है कि मेरी पोस्ट की वजह से एक व्यक्ति अपने परिवार से दोबारा मिल सका।”

4 सितंबर, 2026 को जन्माष्टमी के दिन शंकर के सबसे बड़े भाई ललित की नजर फेसबुक पोस्ट पर पड़ी। बाइक के पुर्जों का कारोबार करने वाले पुजारी ललित शास्त्री कहते हैं, “कांपते हाथों से मैंने डीएसपी संतोष पटेल की पोस्ट में दिए नंबर पर डायल किया।”

शंकर को रेल यात्राओं से बचपन से ही लगाव था

शंकर को रेल यात्राओं से बचपन से ही लगाव था। उनके पिता राजेंद्र के अनुसार, वह अक्सर लोकल ट्रेन में चढ़ जाते थे और एक-दो घंटे बाद लौट आते थे। 6 दिसंबर 2005 को शंकर ने एक ऐसी रेल यात्रा शुरू की जिसने उन्हें दो दशकों से अधिक समय तक अपने परिवार से अलग कर दिया। यह विवाह पंचमी का दिन था और महेशपुरा राम और सीता के दिव्य विवाह के उत्सवों से गुलजार था, एक ऐसा आयोजन जिसने देश भर से साधुओं और संन्यासियों को आकर्षित किया।

शंकर कहते हैं, “अयोध्या के एक साधु ने मुझसे पूछा कि क्या मैं उनके साथ जाना चाहता हूं। मैंने उनसे पूछा कि वे कैसे यात्रा कर रहे हैं, तो उन्होंने कहा, ‘ट्रेन से’।” अतिरिक्त कपड़े पैक करने की परवाह किए बिना, शंकर अयोध्या के लिए रवाना हो गए। आगे क्या हुआ, यह अभी भी अस्पष्ट है, ट्रेन यात्राओं के बीच धुंधला सा याद है। लेकिन पुलिस और परिवार दोनों का मानना ​​है कि वह एक जगह से दूसरी जगह भटकते रहे, उन्हें यह पता नहीं था कि वे कहां हैं या उन्हें कहां जाना है।

शंकर के सबसे बड़े भाई ललित शास्त्री कहते हैं, “वह ‘झंझरपुर’ और ‘झारखंड’ को लेकर अक्सर भ्रमित रहते थे, उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं था कि जहां पहला मधुबनी का एक ब्लॉक था, वहीं दूसरा बिहार के दक्षिण में स्थित एक पूरा राज्य था।” 2018 में, ग्वालियर के आश्रम स्वर्ग सदन ने शंकर को शहर के रेलवे स्टेशन पर पाया।

मुझे ठीक से याद नहीं कि मैं ग्वालियर कैसे और कब पहुंचा- शंकर

शंकर मानते हैं, “मुझे ठीक से याद नहीं कि मैं ग्वालियर कैसे और कब पहुंचा।” उन्होंने कहा, “मुझे याद है कि मैं कई सालों तक ग्वालियर रेलवे स्टेशन के आसपास ही रहा, प्लेटफार्मों पर या खुले में सोता था। मुझे भीख मांगना पसंद नहीं था, इसलिए मैं राहगीरों या दुकानदारों द्वारा दिए गए खाने पर गुजारा करता था और सड़क किनारे ढाबों पर छोटे-मोटे काम करता था।”

आश्रय गृह के प्रभारी पवन सूर्यवंशी ने बताया, “हमने उनके ठीक होने तक उनकी मेडिकल देखभाल की। ​​उन्होंने दिल्ली में रहने वाले अपने एक भाई के बारे में भी बताया। बाद में अधिकारियों को पता चला कि वह उनके भाई लल्लन कुशवाहा थे।”

शंकर की 21 साल की पीड़ा बिहार और पड़ोसी उत्तरी राज्यों में फैली एक व्यापक समस्या की ओर इशारा करती है, जहां लोग, विशेष रूप से नाबालिग, घर से भागे हुए और कठिनाइयों के कारण कमजोर लोग, प्रमुख रेलवे नेटवर्क के माध्यम से गायब हो सकते हैं और अपने घर से सैकड़ों या हजारों किलोमीटर दूर पहुंच सकते हैं।

बिहार रेलवे पुलिस से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, 2019 से 2021 के बीच बिहार भर में 16,559 बच्चों के लापता होने की सूचना मिली थी। इनमें से आधे से भी कम यानी 7,219 बच्चों को बचाया गया या वापस लौटाया गया। 2025 में बिहार भर में 14,699 बच्चों के लापता होने की सूचना मिली थी, जिनमें से 7,772 बच्चों का पता लगाया जा सका था।

हालांकि, इस बात का कोई विशिष्ट डेटा नहीं है कि सोशल मीडिया ने लापता लोगों को ट्रैक करने में कैसे मदद की है, लेकिन जीआरपी और राज्य पुलिस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रही है, ‘खोया-पाया’ नागरिक पोर्टल और ट्रैकचाइल्ड जैसे प्लेटफार्मों से लेकर राष्ट्रीय डेटाबेस तक और कभी-कभी सोशल मीडिया का भी।

ये तो शंकरबा है- लक्ष्मी देवी

महेशपुरा में कुशवाहा परिवार के साधारण, एक छत वाले मिट्टी के घर में वापस आकर ललित को उम्मीद जगी, क्या यह उनका खोया हुआ भाई हो सकता है जो इतने साल पहले घर छोड़कर चला गया था? उनकी 70 वर्षीय माता लक्ष्मी देवी याद करती हैं कि उन्होंने तब कहा था, “मैंने कहा था: ‘अरे, ये तो शंकरबा है, मेरा बच्चा।” उन्होंने कहा, “मेरा बेटा विवाह पंचमी पर लापता हो गया था और भगवान कृष्ण के जन्मदिवस जन्माष्टमी पर मिला। हमारे लिए ऐसा है मानो आज मेरे शंकर का पुनर्जन्म हुआ हो।”

लेकिन नौकरशाही की बाधाओं ने प्रक्रिया में देरी की, शंकर के पास कोई पहचान पत्र नहीं था, वह कभी स्कूल नहीं गया था और स्थानीय झंझारपुर पुलिस स्टेशन के अधिकारियों को आधिकारिक पहचान पत्र पर साइन करने के लिए घंटों तक मनाना पड़ा। इसके बाद के दिनों में, शंकर के बड़े भाई लल्लन कुशवाहा और उनके चचेरे भाई संजीव कुमार ग्वालियर के लिए ट्रेन में सवार हुए, जहां शंकर ने उन्हें तुरंत पहचान लिया।

मां लक्ष्मी देवी कहती हैं, “जब मुझे पता चला कि वह कहां है, तो मैंने अपने सबसे बड़े बेटे ललित से कहा कि वह मुझे हर छोटी से छोटी जानकारी दे और वीडियो कॉल करने में मेरी मदद करे। जब हमने वीडियो कॉल की, तो शंकर रोने लगा।” ग्वालियर से शंकर ने ट्रेन से घर वापसी की यात्रा शुरू की। पटना में, जब उनका भाई उनके लिए पैंट और कमीज खरीद रहा था, तभी शंकर ने एक अनुरोध किया, उन्हें अपने झड़ते बालों को ढकने के लिए एक टोपी चाहिए थी।

मधुबनी में राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित कन्हौली चौक पर, 500 लोगों का एक समूह मिथिला पाग और पीले कपड़े के साथ उनका स्वागत करने और उनके साथ घर वापस जाने के लिए इंतजार कर रहा था, जहां उनके माता-पिता और उनका पसंदीदा व्यंजन ‘बचका और बारी’ उनका इंतजार कर रहे थे।

अब मैं कह सकता हूं कि हमारे तीन बेटे हैं- राजेंद्र कुशवाहा

उनके 75 वर्षीय पिता राजेंद्र कुशवाहा कहते हैं, “सालों तक मैंने दो से आगे गिनना छोड़ दिया था। अब मैं कह सकता हूं कि हमारे तीन बेटे हैं, ललित, लल्लन और शंकर।” कुशवाहा परिवार के मिट्टी के घर में वापस आकर, शंकर अपनी मां के साथ परिवार के आंगन में चारपाई पर बैठा धीरे-धीरे बातें कर रहा है। शंकर के यहां आने के बाद से बहुत कुछ बदल चुका है, लल्लन दिल्ली में एक कारखाने में ड्राइवर है, ललित ने अब संस्कृत में स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त कर ली है और परिवार के घर का एक कमरा प्रमाणपत्रों और स्मृति चिन्हों से भरा हुआ है, जिनमें से अधिकांश ललित के हैं।

उसकी मां लक्ष्मी कहती हैं, “सबसे छोटा होने के कारण शंकर को हमेशा लाड़-प्यार मिलता था।” उन्होंने आगे कहा, “उसने स्कूल जाने से इनकार कर दिया, और दो बार दाखिला कराने की कोशिश नाकाम होने के बाद, हमने उसे यूं ही छोड़ दिया।” शंकर के लापता होने के कुछ वर्षों बाद तक, उनका परिवार उनकी तलाश करता रहा, लेकिन बिहार से बाहर कभी नहीं गया। उन्होंने गुमशुदा व्यक्ति की औपचारिक रिपोर्ट भी दर्ज नहीं कराई, क्योंकि उन्हें अब भी उम्मीद थी कि वह एक दिन ट्रेन से वापस घर लौट आएंगे। लेकिन जैसे-जैसे साल बीतते गए, यह उम्मीद भी धूमिल होती गई।

वे बीते हुए साल अब भी उनके बीच एक लंबा फासला बनकर खड़े हैं और शंकर की याददाश्त अभी भी धुंधली होने के कारण, वह अपने परिवार को सब कुछ नहीं बता सकते। लेकिन उन्हें सबसे ज्यादा याद है कि उन्होंने अयोध्या में अपने शुरुआती कुछ दिन कैसे बिताए थे।

वे कहते हैं, “अयोध्या छोड़ने के बाद मैंने पटना के एक मंदिर में कुछ समय बिताया, जहां मैं भोजन के बदले फर्श साफ करता था। मैं कीर्तनों में भाग लेता था और समय बिताता था।” लेकिन सिर्फ परिवार ही नहीं, बल्कि और भी लोग उसके वापस आने से खुश हैं।

स्थानीय स्कूल शिक्षक राम कुमार महतो कहते हैं, “इतने वर्षों बाद हमने ऐसी वापसी कभी नहीं देखी। इससे पूरे गांव में उम्मीद की किरण जगी है। अब हमारा ध्यान शंकर को सार्थक रूप से व्यस्त रखने पर होना चाहिए।” उनके परिवार की भी यही राय है। ललित कहते हैं, “शंकर हृष्ट-पुष्ट और शारीरिक श्रम करने में सक्षम है। वह पशुपालन में अच्छा कर सकता है। हमारी योजनाएं हैं, लेकिन हम चाहते हैं कि वह पहले अच्छी तरह से बस जाए। हमारी प्राथमिकता अभी यह सुनिश्चित करना है कि वह फिर से किसी बेवजह की राह पर न चल पड़े।”

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