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पूर्व IPS ने अपनी किताब में बताया, वोट बैंक साधने के लिए ठीक से नहीं की गई राजीव गांधी की हत्या की जांच

किताब में लिखा गया है कि LTTE को डर था कि कहीं राजीव गांधी 1991 में फिर से पीएम बनते हैं तो वे श्रीलंकाई सरकार का समर्थन करेंगे। महज एक डर के चलते LTTE ने देश के प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश रची।

rajiv gandhiराजीव गांधी (फाइल फोटो)।

देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की मई 1991 में हत्या से पहले कई सबूत हाथ लगने के बावजूद तमिलनाडु के स्थानीय प्रशासन ने इसकी जांच सही से नहीं की थी। मामले में मुख्य जांचकर्ता ने अपनी किताब में दावा किया है कि लिबरेशन ऑफ टाइगर्स ऑफ तमिल ऐलम (LTTE) के प्रति सहानुभूति रखने वाले तमिल वोटरों के तुष्टिकरण के लिए इन सबूतों को नजरअंदाज किया गया।

पूर्व आईपीएस अधिकारी अमोद कंठ ने अपनी किताब, ‘खाकी इन डस्ट स्टॉर्म’, में ये दावा किया है। तत्कालीन डिप्टी इंसपेक्टर जनरल ऑफ पुलिस ऑफ सीबीआई , ने राजीव गांधी हत्याकांड की जांच की थी। बता दें कि 21 मई 1991 को तमिलाडु के श्रीपेरंबदुर में LTTE चरमपंथियों ने पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या कर दी थी।

राजीव गांधी की हत्या से साल भर पहले एक राजनेता पद्मनाभ की हत्या से इस बात के सबूत मिल थे कि LTTE किसी बड़ी साजिश को अंजाम दे सकता है। श्रीलंकाई तमिल नेता की 12 साथियों समेत 15 जून, 1990 को हत्या कर दी गई थी। गौरतलब है कि राजीव गांधी और तमिल नेता की हत्या में हूबहू एक ही तरीका इस्तेमाल किया गया था। घटना के बारे में एक चश्मदीद ने पुलिस को जानकारी दी थी लेकिन मामले में कुछ नहीं किया गया।

कंठ ने लिखा है,“ राज्य सरकार ने मामले की जांच सही से नहीं की। ये माना जाता है कि 1991 लोकसभा चुनाव के चलते तमिल वोटरों को मद्देनजर रखते हुए मामले की जांच नहीं की गई।” पद्मनाभ हत्याकांड मामले के समय पर राज्य में डीएमके की सरकार थी लेकिन जनवरी 1991 के बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था।

डीएमके सांसद और प्रवक्ता टीकेएस एलनगोवन ने कंठ के दावों को खारिज करते हुए कहा कि हमने राजीव गांधी सरकार पर 13 वें संशोधन को लागू करने के लिए दबाव बनाया था। जब भारतीय पीस कीपिंग फोर्स को श्रीलंका भेजा गया और वहां तमिलों की हत्या की जाने लगी,तमिलों के खिलाफ हुए जुल्म को देखते हुए हमारे नेता करुणानिधि ने उनको रिसीव करने से मना कर दिया था।

पद्मनाभ की हत्या के बाद चरमपंथी श्रीलंका भाग गए थे और राजीव गांधी की हत्या से पहले अप्रैल 1991 में तमिलाडु लौटे थे। राजीव गांधी की हत्या को अंजाम देने वाली धनु उनके साथ तमिलनाडु आई थी। चश्मदीदों ने हत्यारों की पहचान की थी। जिससे मालूम चला था कि पद्मनाभ और राजीव गांधी की हत्या करने वाले एक ही लोग हैं। हैरानी की बात है कि तमिलनाडु पुलिस लंबे वक्त से राज्य में हो रही हिंसा को लेकर शांत रही जिसके पीछे LTTE का हाथ था।

किताब में लिखा गया है कि LTTE को डर था कि कहीं राजीव गांधी 1991 में फिर से पीएम बनते हैं तो वे श्रीलंकाई सरकार का समर्थन करेंगे। महज एक डर के चलते LTTE ने देश के प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश रची।

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