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रिजर्व बैंक : सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि पर चुप्पी क्यों

रिजर्व बैंक ने एमएसएमई के लिए एक मार्च, 2020 तक मानक श्रेणी (वैसा कर्ज जिसकी किस्त आ रही थी और जो एनपीए नहीं बना था) वाले ऋण के लिए मौद्रिक नीति में पुनर्गठन और समाधान रूपरेखा पर काम करने को लेकर केवी कामथ की अध्यक्षता में एक समिति गठित करने की घोषणा की। इसे दबाव वाले कर्जदाताओं और बैंकों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है।

रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास।

रिजर्व बैंक ने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) को लेकर चुप्पी साध ली है। 27 मार्च के बाद से केंद्रीय बैंक ने अपनी मौद्रिक नीति की समीक्षा पेश करते हुए परंपरा के विपरीत जीडीपी के बारे में कोई अनुमान नहीं दिया। चार अगस्त को भी चुप्पी रही। आरबीआइ की चुप्पी को लेकर कई तरह की आशंकाएं जताई जाने लगी हैंकि अगले एक साल अर्थव्यवस्था नकारात्मक अंकों में रह सकती है।

ऐसे में यह आशंका गहराने लगी है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत बेहद खराब है। पहले भी कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय एजंसियां वित्त वर्ष 2020-21 के लिए भारत के जीडीपी विकास अनुमान को काफी घटा चुकी हैं और इसे 1.5 से 2.5 फीसद के बीच कर चुकी हैं। रिजर्व के गवर्नर शक्तिकांत दास ने मौद्रिक नीति समीक्षा की ताजा बैठक के बाद अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) के हवाले से कहा कि इस वित्त वर्ष यानी 2020-21 में शून्य से 1.9 फीसद की दर से विकास का अनुमान लगाया है। आरबीआइ गवर्नर ने यह नहीं बताया कि भारत की आर्थिक विकास दर कितनी रहेगी। आइएमएफ का आकलन तो उन्होंने दिया, लेकिन अपना आकलन नहीं बताया।

बीते एक साल से अर्थव्यवस्था को लेकर बुरे आंकड़े सामने आ रहे हैं। भारत सरकार द्वारा जारी जीडीपी के अनुमान को लेकर आंकड़ों पर भी पहले संदेह जाहिर किया जाता रहा है। ऐसे में रिजर्व बैंक अगर कोई अनुमान पेश करता तो उस पर लोगों का ज्यादा भरोसा होता, लेकिन वह यह आंकड़ा पेश करने से बच रहा है और आशंकाएं बढ़ रही हैं। अर्थव्यवस्था को लेकर सरकार कई तरह के तर्क गढ़ रही है। मसलन, अंतरराष्ट्रीय एजंसियों ने कहा कि मई में औद्योगिक उत्पादन में 38 फीसद की गिरावट थी। लेकिन सरकार ने इसके आंकड़े सामने न रखने का तर्क दिया था कि हम एक ऐसे समय से गुजर रहे हैं, जैसा इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। इसलिए पुराने आंकड़ों से आज के समय की तुलना कर के कोई नतीजा निकालना ठीक भी नहीं है और तर्कसंगत भी नहीं। यही तर्क जीडीपी पर भी लागू होता है।

जीडीपी को लेकर बेशक रिजर्व बैंक और केंद्र सरकार ने चुप्पी साध रखी है, लेकिन देश और दुनिया की एजंसियां इसका हिसाब लगाने में जुटी हैं कि कोरोना संकट का भारत की जीडीपी पर कितना असर होगा। विश्व बैंक ने कहा कि इसमें 3.2 फीसद की गिरावट आ सकती है, जबकि अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष को यह गिरावट 4.5 फीसद होने का डर है। दूसरी कुछ एजंसियां पांच से 7.5 फीसद तक की गिरावट का अंदाजा लगा रही हैं। भारत की ही रेटिंग एजंसी इकरा का कहना है कि जीडीपी 9.5 फीसद तक गिर सकती है।
केंद्र सरकार के वित्तीय मामलों के विभाग का कहना है कि अर्थव्यवस्था तेजी से पटरी पर लौट रही है, लेकिन साथ ही अधिकारी यह भी चेताते हैं कि जिस तरह कोरोना के मामले बढ़ रहे हैं और बार-बार पूर्णबंदी लगाई या हटाई जा रही है, इससे हालात नाजुक बने हुए हैं और इस पर लगातार निगरानी की जरूरत है।

इन हालात में रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया जाना और कर्ज के पुनर्गठन के एलान से आम लोगों को कितना लाभ मिलेगा- यह सवालों के दायरे में है। रेपो दर चार फीसद पर कायम रखी गई है। कोराना संक्रमण की आर्थिक मार से बचने के लिए रिजर्व बैंक ने मार्च में कर्ज पर किस्तें चुकाने की जो छूट दी थी, वह अगस्त में खत्म कर दी है। सितंबर से हर कर्ज की किस्त चुकानी होगी। हालांकि, बैंकों को कर्ज पुनर्गठन की अनुमति दी है।

कोरोना काल का संकट शुरू होने पर रिजर्व बैंक ने एक मार्च 2020 से 31 मई 2020 तक मासिक भुगतान किस्तों पर छूट की घोषणा की थी। यानी किस्त नहीं चुकाने पर क्रेडिट स्कोर प्रभावित नहीं होगा। दूसरी बार इस अवधि को तीन महीने और बढ़ाकर 31 अगस्त, 2020 तक लागू कर दिया था। ताजा बैठक में समय बढ़ाने की घोषणा नहीं की गई। अब सितंबर से गृह ऋण, वाहन ऋण और व्यक्तिगत ऋण पर किस्त चुकानी होगी। बैंक कर्ज पुनर्गठन की अनुमति मांग रहे थे। रिजर्व बैंक ने उन्हें अनुमति दे दी है। अब बैंक अपने कर्जदारों के कर्ज भुगतान का समय चक्र बदल सकते हैं, अवधि बढ़ा सकते हैं या भुगतान अवकाश दे सकते हैं। लेकिन इसका लाभ किसे और कैसे मिलेगा, यह बैंक ही तय करेंगे। आरबीआइ ने सिर्फ उन्हीं कर्ज के पुनर्गठन की अनुमति दी है, जिनका 1 मार्च, 2020 की स्थिति में 30 दिन से ज्यादा का डिफॉल्ट नहीं था।

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