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शोध: वैज्ञानिकों ने तैयार की शीशे जैसी पारदर्शी लकड़ी

वैज्ञानिकों ने शीशे जैसी पारदर्शी लकड़ी तैयार की है, जो शीशे से पांच गुना ज्यादा मजबूत है। यह लकड़ी शीशे की तरह टूटती नहीं। इसे खिड़कियों में लगाया जा सकेगा। यह पारदर्शी लकड़ी गर्मी झेलने में शीशे से पांच गुना ज्यादा मजबूत है। पेड़ से निकाली लकड़ी को ‘ब्लीचिंग सॉल्यूशन’ और ‘पॉलिविनायल अल्कोहल’ की मदद से ट्रांसपेरेंट बनाया गया। इसे अमेरिका की मेरीलैंड और कोलोराडो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने मिलकर तैयार किया है।

बाल्सा नामक पेड़ से तैयार यह पारदर्शी लकड़ी कांच से पांच गुना अधिक मजबूत और गर्मी झेलने वाली होती है।

कोई लकड़ी कांच की तरह पारदर्शी हो सकती है? अमेरिका के वैज्ञानिकों ने पारदर्शी लकड़ी बनाने में कामयाबी हासिल की है, जो शीशे की तरह है। यह लकड़ी खिड़कियों में शीशे की जगह ले सकती है। इसे खास किस्म के पेड़, बाल्सा के पेड़ की लकड़ी से तैयार किया गया है। पारदर्शी लकड़ी को तैयार करने वाले वैज्ञानिकों का दावा है कि यह कांच से पांच गुना अधिक गर्मी झेलने में सक्षम है।

इसे अमेरिका की मैरीलैंड और कोलोराडो की यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने मिलकर तैयार किया है। शोधकर्ताओं की टीम ने सफलतापूर्वक लकड़ी को रंगीन बनाने वाले रसायन निकाल लिए। इस शोध से जुड़े पदार्थ वैज्ञानिक लियांगबिंग हू शोध के नतीजों को लेकर हैरान हैं और उत्साहित भी। वे कहते हैं, ‘ये हमारे लिए भी आश्चर्यजनक था। अब इसका इस्तेमाल उन जगहों पर भी किया जा सकेगा, जहां अब तक कांच इस्तेमाल होता रहा है।’

पर्यावरण के लिहाज से भी यह बेहतर है। पारदर्शी होने के बावजूद लकड़ी, लकड़ी ही रहेगी। यह जैविक रूप से भी आसानी से विघटित होगी। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि भविष्य में दरवाजे, खिड़की, मेज और अन्य क्षेत्रों में इसका इस्तेमाल होगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह शीशे का विकल्प साबित हो सकती है। शीशे का उत्पादन करने में हर साल 25 हजार टन कार्बन का उत्सर्जन होता है। जो खतरनाक है। इस लकड़ी का चलन बढ़ने पर शीशे के उत्पादन में कार्बन उत्सर्जन की समस्या के निजात मिल सकती है।

बाल्सा प्रजाति के पेड़ दक्षिण और अमेरिका अमेरिका में काफी पाए जाते हैं। इस लकड़ी को लेकर किए गए शोध के नतीजे विज्ञान पत्रिका ‘एडवांस्ड मैटीरियल्स’ में प्रकाशित किए गए हैं। लकड़ी को पारदर्शी बनाने के लिए वैज्ञानिकों ने सबसे पहले उसे पानी में उबाला। पानी में सोडियम हाइड्रोआक्साइड और अन्य रसायन भी डाले गए। दो घंटे तक उबलने के बाद लकड़ी में मौजूद ‘लिगनिन’ छूटने लगा। लिगनिन एक मॉलीक्यूल है, जो लकड़ी को भूरा और बादामी रंग देता है। लिगनिन निकलने के बाद इपोक्सी की परत चढ़ाई गई। इसने पारदर्शी लकड़ी को चार से छह गुना ज्यादा मजबूती दे दी।

शोध के तरीकों को यूं भी समझा जा सकता है। वैज्ञानिकों की टीम ने इस पेड़ की लकड़ी को ‘आक्सीडाइजिंग बाथ’ में रखा। यह एक तरह का ब्लीचिंग सॉल्यूशन था। ऐसा इसलिए किया गया था, ताकि लकड़ी से प्रकाश को अवशोषित करने वाले तत्व खत्म हो जाएं। लकड़ी का हर हिस्सा ब्लीच में डूबने के बाद आर-पार दिखने लगा। इसके बाद ‘पॉलिविनायल अल्कोहल पॉलिमर’ मिलाया गया। इससे यह पारदर्शी लकड़ी में पूरी तरह से तब्दील हो गया। बाद में इसे रगड़कर और साफ किया गया।

वैज्ञानिकों का कहना है कि यह पारदर्शी लकड़ी शीशे की तरह टुकड़े होकर बिखरेगी नहीं, बल्कि मुड़ जाएगी। यह लकड़ी ग्रीन हाउस गैसेज की ऊर्जा को नष्ट होने से रोकेगी। इस लकड़ी का प्रयोग बढ़ता है तो शीशे के उत्पादन के कारण होने वाले कार्बन का उत्सर्जन घटेगा। इससे जलवायु परिवर्तन के बुरे असर को कम किया जा सकेगा। ट्रांसपेरेट लकड़ी तैयार करने के लिए इसी पेड़ को क्यों चुना। इस पर वैज्ञानिकों का कहना है, यह पेड़ सूरज की रोशनी को अधिक अवशोषित करता है। इसलिए यह तेजी से बढ़ता है। इससे पहले भी पारदर्शी लकड़ी को तैयार किया गया है, लेकिन वतर्मान में जो प्रयोग हुआ है उसमें पारदर्शिता एकदम शीशे की तरह है।

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