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शोध: हिमालयी क्षेत्र की नदियों में विलुप्त 33 मत्स्य प्रजातियां

बदलते जलीय पर्यावरण, बांधों के निर्माण से नदियों की बाधित अविरलता और अवैज्ञानिक दोहन के कारण हिमालयी क्षेत्र की नदियों में मछलियों की 33 महत्त्वपूर्ण प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गई हैं। अनियंत्रित व अत्यधिक मानव गतिविधियों के कारण इन जलस्रोतों में पाए जाने वाली मत्स्य जैव विविधता तथा इनका पारिस्थतिकी स्तर और मछलियों की उपलब्धता पर गहरा प्रभाव पड़ा है। इन कारणों से हिमालय क्षेत्र में अत्यधिक प्रभावित महाशीर, भारतीय ट्राउट व विदेशी ट्राउट प्रजाति की मछलियां हैं।

हिमालयी क्षेत्र से विलुप्त हो रही मत्स्य प्रजातियों में से एक महाशीर मछली।

हिमालयी क्षेत्र की मुख्य और सहायक नदियों की मत्स्य जैव विविधता पर संकट मंडरा रहा है। चार दशकों में इस क्षेत्र की विभिन्न मुख्य और उनकी सहायक नदियों में मछलियों की 33 महत्त्वपूर्ण प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गई हैं। विभिन्न शोध में आशंका जताई जा रही है कि वे प्रजातियां अपना व्यावसायिक व आखेट स्वरूप खो सकती हैं। हाल में गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के स्वामी रामतीर्थ परिसर के जंतु विज्ञान के वैज्ञानिकों की शोध रिपोर्ट में कहा गया है कि सिर्फ भागीरथी और उसकी सहायक नदियों में मछलियों की कम से कम 15 प्रजातियां लुप्त हो चुकी हैं। कई लुप्त होने वाली हैं। वैज्ञानिक इसके लिए बदलते जलीय पर्यावरण, बांधों के निर्माण से नदियों की बाधित अविरलता और अवैज्ञानिक दोहन को जिम्मेदार मानते हैं।

50 के दशक के आस-पास मध्य हिमालय क्षेत्र के विभिन्न जलस्रोतों से बड़े आकार की महाशीर मछलियों को पकड़ना आम बात थी। भीमताल झील से 22 किलोग्राम की महाशीर, यमुना नदी से 15-17 किलो की महाशीर एवं सरयू नदी से 30-35 किलो की महाशीर मिल जाती थी। लेकिन समय के साथ इस मछली का आकार व भार घटता ही चला गया। लेकिन वर्तमान में हिमालय क्षेत्रों से पकड़ी जाने वाली महाशीर मछली का औसत भार केवल 100-1500 ग्राम ही पाया जा रहा है।
ठंडे जलस्रोतों में पाई जाने वाली मत्स्य प्रजातियों की संख्या 258 हैं, जिनमें 203 प्रजातियां हिमालय क्षेत्र में और 91 दक्षिण पवर्तीय क्षेत्र में पाई जाती हैं। अनियंत्रित व अत्यधिक मानव गतिविधियों के कारण इन जलस्रोतों में पाए जाने वाली मत्स्य जैव विविधता तथा इनका पारिस्थतिकी स्तर और मछलियों की उपलब्धता पर गहरा प्रभाव पड़ा है। इन कारणों से हिमालय क्षेत्र में अत्यधिक प्रभावित महाशीर, भारतीय ट्राउट व विदेशी ट्राउट प्रजाति की मछलियां हैं।

जो 33 महत्त्वपूर्ण प्रजातियां लुप्तप्राय होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं, उनके बारे में ऐसी संभावना है कि वे अपना व्यावसायिक व आखेट स्वरूप खो सकती हैं। इनमें से तीन प्रजातियां (राइमस बोला, टिकोबारबस, कोनिरास्ट्रिस) लुप्तप्राय, आठ असुरक्षित प्रजातियां (मुख्यत: शाइजोथोरैक्स, रिचाडसोनी, टौर टौर, साइजोथोरेक्थीस प्रोजेस्टस) एवं सात प्रजातियों (डिप्टीकस मैकुलेटस, साइजहो पागोपसिस, स्टोलिजकी, साइजोथोरेक्थीस इसोसाइनस, ग्लिप्टोथोरैक्स रेटिकुलेटम) को दुर्लभ समूह में रखा गया है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक, बदलते जलीय पर्यावरण, बांधों के निर्माण से नदियों की अविरलता हो रही बाधित हो रही है। गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के स्वामी रामतीर्थ परिसर के जंतु विज्ञान के मत्स्य वैज्ञानिक प्रोफेसर एनके अग्रवाल ने गंगा और उसकी सहायक नदियों के पर्यावरण और मत्स्य जैव विविधता पर गहन शोध किया। उन्होंने पाया कि 80 के दशक में जहां भागीरथी नदी में मत्स्य संपदा की 39 प्रजातियां पाई जाती थी। वह अब घटकर 24 रह गई हैं। इसी प्रकार भिलंगना, अलकनंदा और मंदाकिनी नदियों में भी मत्स्य प्रजातियां कम हो गई हैं।

यह शोध रिपोर्ट को हाल में प्रकाशित किया गया है। शोध में बताया गया है कि भागीरथी नदी के 65 किमी लंबाई वाले क्षेत्र में एक के बाद एक मनेरी भाली परियोजना, टिहरी और कोटेश्वर जल विद्युत परियोजना से नदी जलाशयों के रूप में परिवर्तित हो गई हैं। इस कारण पर्वतीय नदियों के तेज प्रवाह एवं नदीय पर्यावरण की अभ्यस्त मत्स्य प्रजातियां अपने को गहरे पानी की झील में नहीं ढाल पाने के कारण वहां से विलुप्त हो गई हैं।

विदेशी कामन कार्प प्रजाति की मछलियों की तादाद बढ़ रही है। बांध बनने से पूर्व इस क्षेत्र की नदियों में स्नो ट्राउट, गार्रा, क्रोसोचिलस, ग्लिप्टोथौरेक्स, चीडो कैनिस सहित कई मछलियां नदी के तेज बहाव के साथ अभ्यस्त थी और नदी के तल पर पत्थरों के मध्य स्थित शैवाल और सूक्ष्म जलीय कीटों को खाकर जीवित रहती थी, लेकिन झील बनने के बाद यह स्थान समाप्त हो गए हैं।

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