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शोध: 50 दिन ही सक्रिय रहती हैं प्रतिरक्षक कोशिकाएं

मुंबई के जेजे अस्पताल समूह ने अपने यहां कोरोना के संक्रमित मरीजों को लेकर किए गए एक शोध का निष्कर्ष जारी किया है। यह तथ्य सामने आया है कि किसी मरीज के शरीर में विकसित होने वाली प्रतिरक्षक कोशिकाएं (एंटीबॉडी) 50 दिन से ज्यादा नहीं रहती हैं। शोध टीम के प्रमुख डॉ. निशांत कुमाकर का कहना है कि हमने जेजे, जीटी और सेंट जॉर्ज अस्पताल के 801 स्वास्थ्य कर्मियों पर अध्ययन किया। इनमें 28 लोग कोरोना संक्रमित हो गए।

शोध के प्रमुख डॉ. निशांत कुमाकर के मुताबिक, 801 स्वास्थ्य कर्मियों का आरटी-पीसीआर की मदद से कोरोना की जांच की गई, जिसमें 28 लोग कोरोना संक्रमित निकले। जून में जब इन स्वास्थ्य कर्मियों का सीरो-सर्वे किया गया तो इन 28 मरीजों के शरीर में एंटीबॉडी नहीं मिली।

कोरोना विषाणु के संदर्भ में रोग प्रतिरोधी क्षमता और संक्रमण से उबरे लोगों में प्रतिरक्षक कोशिकाएं (एंटीबॉडी) को लेकर दुुनिया भर में कई शोध चल रहे हैं। एंटीबॉडी पर हाल में एक शोध भारत के चिकित्सकों ने किया है। यह अध्ययन मुंबई के जेजे अस्पताल समूह के कोरोना प्रभावित कर्मचारियों पर किया गया है, जो संक्रमण से उबर गए। इस शोध से यह तथ्य सामने आया है कि कोविड-19 एंटीबॉडी शरीर में दो महीने से भी कम समय तक रह पाते हैं।

इस शोध के प्रमुख डॉ. निशांत कुमाकर के मुताबिक, 801 स्वास्थ्य कर्मियों का आरटी-पीसीआर की मदद से कोरोना की जांच की गई, जिसमें 28 लोग कोरोना संक्रमित निकले। जून में जब इन स्वास्थ्य कर्मियों का सीरो-सर्वे किया गया तो इन 28 मरीजों के शरीर में एंटीबॉडी नहीं मिली। इस शोध को सितंबर में इंटरनेशनल जर्नल आफ कम्यूनिटी मेडिसिन और पब्लिक हेल्थ में छापा जाएगा।

जेजे अस्पताल सीरो सर्वे में तीन हफ्ते और पांच हफ्ते पहले 34 और मरीज कोविड-19 से संक्रमित निकले। तीन हफ्ते वाले समूह में 90 फीसद मरीजों में एंटीबॉडी थी और पांच हफ्ते वाले समूह में 38.5 फीसदी मरीजों में एंटीबॉडी थी।

अभी तक सीरो-सर्वे के बारे में कहा जाता है कि किसी मरीज के शरीर में एंटीबॉडी होने से उसे दोबारा कोरोना विषाणु नहीं हो पाता है, लेकिन हांगकांग में एक शख्स को दोबारा कोरोना विषाणु होने से स्वास्थ्य महकमों में हड़कंप मच गया है। इसके बाद मुंबई के अस्पताल का शोध सामने आया है। इन विश्लेषणों में सामने आया है कि एंटीबॉडी जल्द ही गल जाती है।

डॉ. कुमार कहते हैं कि इन विश्लेषणों के आधार पर टीके की रणनीति पर दोबारा काम करने की जरूरत है। जेजे अस्पताल की शोध टीम कहती है कि कोरोना संक्रमित मरीजों को टीके की एक डोज के बजाय ज्यादा डोज देनी चाहिए।

विश्व में हुए अन्य शोध बताते हैं कि जो बिना लक्षण वाले कोरोना मरीज हैं, उनमें गंभीर कोरोना मरीजों या लक्षण वाले मरीजों की तुलना में कम एंटीबॉडी बनती हैं। जो मरीज लंबे समय से लक्षण वाले कोरोना का शिकार रहे उनके शरीर में तीन से चार महीने के लिए एंटीबॉडी बनी रहती हैं।

अभी भी कोविड-19 संक्रमण के लिए प्रतिरक्षा की प्रणाली पर कई तरह के शोध जारी हैं। उन्होंने कहा कि इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि ये इम्यूनोग्लोबिन जी नहीं है। इम्यूनोग्लोबिन जी सबसे ज्यादा पाई जाने वाली एंटीबॉडी होती है। शोधकर्ताओं का मानना है कि शरीर में पैदा होने वाली ये एंटीबॉडी या तो टी सेल्स हैं या न्यूट्रालाइजिंग एंटीबॉडी है कोरोना के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने में काम करता है।

पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन आफ इंडिया के महामारी विशेषज्ञ गिरिधर आर बाबू ने कहा, ह्यजिन मरीजों में कोरोना के लक्षण लंबे समय तक रहते हैं उनमें कम से तीन-चार महीने तक एंटीबॉडीज होती हैं।ह्ण एंटीबॉडी को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन के तकनीकी प्रमुख मारिया वान केरखोव का बयान आ चुके है कि जिन मरीजों में हल्का भी लक्षण है, उनमें संक्रमण के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता के संकेत दिखते लगते हैं।

हालांकि, यह अभी तक पता नहीं चल सका है कि ये वह क्षमता कितनी मजबूत होती है और कितने दिनों तक शरीर में रहती है। शोध के दौरान इस तरह के मामलों को समझने की कोशिश की जाती है कि मरीज में किस तरह का संक्रमण हुआ है और ठीक हुए मरीज की न्यूट्रलाइजिंग एंटीबॉडी कैसी है।

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