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10 महीनों में छह बार आमने-सामने आ चुके हैं मोदी सरकार और RBI

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि एनडीए सरकार के कुछ लोग तो निजी बातचीत में यहां तक कह रहे हैं,'' यहां तक कि रघुराम राजन भी इससे बेहतर थे।'' जबकि पटेल के पूर्ववर्ती रघुराम राजन ने जब आरबीआई को छोड़ा था, उस वक्त भी हालात अच्छे नहीं थे।

भारतीय रिजर्व बैंक के गर्वनर उर्जित पटेल। फोटो- रायटर्स

नई दिल्ली और मुंबई को देश में सत्ता और पैसे के केंद्र के तौर पर जाना जाता है। लेकिन अब इन्हीं दोनों धुरी यानी सरकार और रिजर्व बैंक के बीच मतभेद बढ़ रहे हैं। ये खुलासा टाइम्स आॅफ इंडिया में प्रकाशित रिपोर्ट में हुआ है। बता दें कि रिजर्व बैंक के गर्वनर उर्जित पटेल इस साल के शुरुआती कुछ महीनों से कुछ ज्यादा ही सुर्खियों में रहे हैं। इस वक्त के दौरान, सरकार और उर्जित पटेल के बीच कई मुद्दों के समाधान को लेकर कथित तौर पर तनातनी रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार और उर्जित पटेल के बीच काफी वक्त तक संवाद का भी अभाव रहा था।

रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार और रिजर्व बैंक के गवर्नर के बीच संबंधों में खटास के कारण डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य की जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं। विरल आचार्य को रिजर्व बैंक में उर्जित पटेल ही लेकर आए थे। आचार्य उस वक्त न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के तौर पर तैनात थे।

विरल आचार्य ने शुक्रवार को सरकारी दखल के बारे में स्पष्ट संकेत दिए और स्वत्व अधिकारों की जरूरत पर बल दिया। इस तनाव ने पटेल के भविष्य के संबंध में बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। अब उर्जित पटेल अगले सितंबर को खत्म हो रहे अपने तीन साल के कार्यकाल से पहले कोई भी सेवा विस्तार नही चाहते हैं। इससे उनके पद पर बने रहने पर सवाल खड़े हो गए हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, उर्जित पटेल ने टीओआई के मैसेज का जवाब भी नहीं दिया। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि एनडीए सरकार के कुछ लोग तो निजी बातचीत में यहां तक कह रहे हैं,” यहां तक कि रघुराम राजन भी इससे बेहतर थे।” जबकि पटेल के पूर्ववर्ती रघुराम राजन ने जब आरबीआई को छोड़ा था, उस वक्त भी हालात अच्छे नहीं थे।

टीओआई ने कुछ महीने पहले एनडीए सरकार में एक शख्स से हुई बातचीत का हवाला देते हुए लिखा,” राजन के बाद, पटेल को भी जाने के लिए कहना बुरा लगता है।” रिपोर्ट में दावा किया गया है कि जो लोग उर्जित पटेल को करीब से जानते हैं उनका मानना है कि वह जानते हैं कि सरकार उनके वर्तमान कार्यकाल से ज्यादा उन्हें नहीं रखने वाली है। इ​सलिए वह उनकी गुड बुक्स में रहने की परवाह नहीं कर रहे हैं।

सरकार और रिजर्व बैंक के बीच सिर्फ इसी साल छह मुद्दों पर मतभेद सामने आ चुके हैं। इसके अलावा दोनों पक्षों का नजरिया कम से कम 6 मामलों में बिल्कुल अलग रहा है। दोनों के बीच मतभेद की शुरूआत तब हुई जब मुद्रास्फीति पर अपना ध्यान लगाए रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों में कटौती से इंकार कर दिया बल्कि बाद में उसे और बढ़ा दिया। रिजर्व बैंक को ये अपने अधिकार क्षेत्र में घुसपैठ की कोशिश की तरह लगा।

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