ताज़ा खबर
 

रिपोर्ट: UPA की तय नीतियों पर ही मोदी सरकार ने किया रफाल डील, CCS से ली गई थी मंजूरी

अप्रैल 2015 को रफाल फाइटर जेट खरीदने की प्रक्रिया शुरू हुई थी। इसके बाद 18 महीनों की बातचीत के दौरान कम से कम 10 बिन्दुओं पर मतभेद सामने आए थे। लेकिन इस प्रक्रिया के दौरान कैबिनेट सुरक्षा समिति को न सिर्फ जानकारी दी गई थी, ​बल्कि कोई भी कदम उठाने से पहले उसकी मंजूरी भी ली गई थी।

भारत ने दसॉल्‍ट एविएशन से 36 राफेल लड़ाकू विमानों का सौदा किया है। (Photo : Dassault Aviation Website)

भारत सरकार का रक्षा मंत्रालय सुप्रीम कोर्ट में रफाल डील पर निर्णय लेने की सारी प्रक्रिया की जानकारी दाखिल करने वाला है। ऐसे वक्त में ये जानकारी मिली है कि सुरक्षा पर बनी कैबिनेट कमिटी ने सभी महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं पर अपनी मंजूरी उस वक्त दी थी जब इस फाइटर जेट को खरीदने की प्रक्रिया चल रही थी। इकॉनॉमिक टाइम्स की ​पड़ताल के मुताबिक, अप्रैल 2015 को रफाल फाइटर जेट खरीदने की प्रक्रिया शुरू हुई थी। इसके बाद 18 महीनों की बातचीत के दौरान कम से कम 10 बिन्दुओं पर मतभेद सामने आए थे। लेकिन इस प्रक्रिया के दौरान कैबिनेट सुरक्षा समिति को न सिर्फ जानकारी दी गई थी, ​बल्कि कोई भी कदम उठाने से पहले उसकी मंजूरी भी ली गई थी।

असहमति वाले तीन बिन्दु सात सदस्यीय मोलभाव करने वाले भारतीय दल के तीन सदस्यों द्वारा उठाए गए थे। इन बिन्दुओं में कई मुद्दे शामिल थे जैसे ठेके में लिखी गई बेंचमार्क कीमत को दोबारा तय करना, मरम्मत और पेमेंट की शर्तों के विवाद के साथ ही डसॉल्ट द्वारा समय पर फाइटर जेट की डिलीवरी देने के संबंध में थी। हालांकि रक्षा खरीद मामलों में सरकार की कैबिनेट सुरक्षा समिति ही निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था होती है। लेकिन सामान्य तौर पर इस कमिटी के पास मामले तभी जाते हैं जब खरीद की प्रक्रिया अंतिम चरण में होती है।

साल 2013 की रक्षा खरीद नीति के अनुसार ही रफाल जेट खरीदे गए थे। खरीद प्रक्रिया के अंत में कैबिनट सुरक्षा समिति की मंजूरी की जरूरत तब पड़ती है जब फाइनल वित्तीय मंजूरी की प्रकिया शुरू होनी होती है। ये डील पर साइन होने से पहले का सिर्फ एक कदम भर है। रक्षा और सैन्य खरीद प्रक्रिया के दौरान हालांकि एक शर्त ये भी होती है फैसले कैबिनेट सुरक्षा समिति के द्वारा रक्षा खरीद बोर्ड की अनुशंसा के आधार पर ही लिए जाएंगे।

ईटी ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि सितंबर 2016 में कम से कम 10 विवादित बिंदुओं को 7.87 बिलियन यूरो की डील पर हस्ताक्षर होने से पहले ही कैबिनेट सुरक्षा समिति ने सुलझा लिया था। ऐसा ही एक मुद्दा बेंचमार्क कीमतों को अलग करना था। डील से पहले टीम के वित्तीय सदस्यों ने कीमतों पर मोलभाव से पहले ही कीमतों का अनुमान लगा​ लिया था। टीम का मानना था कि 36 जेट के बदले में 5.2 बिलियन यूरो ही अनुमानित कीमत होगी।

भारत के वार्ता दल में बहुसंख्यक लोगों का मानना था कि ये तरीका सही नहीं है। ये सुझाव दिया गया कि इससे पहले की गई 126 हवाई जहाजों की डील के लिए आई निविदाओं में से इनपुट लेकर कीमतों का आंकलन किया जाना चाहिए। लेकिन इसका नतीजा ये हुआ कि कीमतें ऊपर चली गईं और 8.2 बिलियन यूरो तक पहुंच गईं। रक्षा अधिग्रहण परिषद के द्वारा पुनरीक्षण के बाद कैबिनेट सुरक्षा समिति ने फॉर्मूला और नई कीमतों दोनों को मंजूरी दे दी।

ईटी ने सूत्रों के हवाले से अपनी रिपोर्ट में लिखा है, सीसीएस की अनु​मति फ्रांस की सरकार द्वारा संप्रभु गारंटी के आधार पर अग्रिम और प्रदर्शन बैंक गारंटी देने से डेसॉल्ट एविएशन को छूट देने के लिए ली गई थी। भारतीय दल ने बहुत कोशिश की लेकिन फ्रांस की सरकार ने कहा कि अमेरिका और रूस भी सरकारों के बीच में हुए सौदे में बैंक गारंटी की शर्त नहीं रखते हैं। हालांकि, डील के सौदे के आॅफसेट हिस्से के लिए बैंक गारंटी हासिल कर ली गई। इससे रक्षा मंत्रालय को ये शक्ति मिल गई कि वह नियमों का पालन न करने वाली फ्रांसीसी फर्मों पर जुर्माना लगा सकती है।

कैबिनेट सुरक्षा समिति के द्वारा उठाए गए अन्‍य मुद्दों में 36 जेट विमानों की डिलीवरी की तारीख पर हुए फैसले और विधि मंत्रालय द्वारा सुझाई गई ठेके की शर्तों में परिवर्तन शामिल हैं। इसके अलावा कैबिनेट सुरक्षा समिति में टीम के सदस्यों ने यूरोफाइटर द्वारा दिए गए जवाबी आॅफर को नकारकर आगे बढ़ते हुए सौदे को मंजूरी दी थी। ईटी की रिपोर्ट के मुताबिक, फ्रांसीसी सरकार के साथ ठेके के कागजात पर हस्ताक्षर करने से पहले वार्ता करने वाली टीम के कुछ सदस्यों की आपत्तियों को बहुमत के आधार पर नकार दिया गया था। इसी को सरकार ने बातचीत की प्रक्रिया करार दिया है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App