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‘सर्वधर्म’ अतिक्रमण से हार कानून

धर्म और समाज सेवा की आड़ में पुरानी दिल्ली के चांदनी चौक इलाके में सरकारी जमीन कब्जाने का धंधा जारी है। सीसगंज गुरुद्वारे के अतिक्रमण और अदालती आदेश की अवहेलना के बीच कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।

Author नई दिल्ली | April 15, 2016 3:03 AM
कानून

धर्म और समाज सेवा की आड़ में पुरानी दिल्ली के चांदनी चौक इलाके में सरकारी जमीन कब्जाने का धंधा जारी है। सीसगंज गुरुद्वारे के अतिक्रमण और अदालती आदेश की अवहेलना के बीच कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। फुटपाथ पर अवैध निर्माण (प्याऊ सरीखे) को दोबारा बनाकर अदालत और कानून को आंख दिखाने के यहां और भी कई मामले हैं। इन पर हाथ डालना पुलिस व निगम के लिए आसान नहीं रह गया है।
इस इलाके में सभी समुदाय के लोगों ने धर्म के चोले में सरकारी जमीन का अतिक्रमण व अवैध निर्माण किए हैं। गुरुद्वारा, मंदिर, मस्जिद, जैन दिवंकरों के परिसर लाल मंदिर, सभी ने सरकारी जमीन, फुटपाथ आदि दबा रखे हैं। जाहिर है, गोरखधंधे में कोई धर्म पीछे नहीं है। लाल किला से फतेहपुरी मस्जिद तक के रास्ते में सबसे पहले जैन समुदाय का लाल मंदिर आता है। कभी इसमें एक द्वार हुआ करता था। आज तीन द्वार हैं। मंदिर के बाहर जूता रखने और प्याऊ के नाम पर उन जगहों को घेर दिया गया है जो कभी खुली थीं। यहां कतार से बैठे फोटोग्राफर आने-जाने वाले पर्यटकों के फोटो बनाया करते थे। लाल मंदिर का जीर्णोद्धार कर एक गेट (पूर्वी) एकदम फुटपाथ पर लाया गया। दरवाजे बाहर किए और खुलने वाले लगाए गए जबकि उत्तरी गेट लगाकर फुटपाथ को प्रांगण में ले लिया गया है।

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जैन मंदिर के ठीक बाद यहां गौरी शंकर का मंदिर है। इस मंदिर के भीतर प्याऊ था, लेकिन दूसरों की देखादेखी मंदिर के लोगों ने स्थायी प्याऊ के आगे एक और प्याऊ बना डाला। इसके एक हिस्से बाकी को सालों बाद पिछले हफ्ते गिराया गया। अब सिख समुदाय क्यों पीछे रहता! उन्होंने पक्की दीवार बनाकर उस फुटपाथ को ही पूरी तरह बंद कर दिया जो लालकिले से फतेहपुरी तक जाता था। इसी क्षेत्र में सरकारी जमीन पर वह प्याऊ भी है, जो इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। इसके सामने कानून बौना साबित हो रहा है। मामला हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट घुमाया जा रहा है और पंजाब चुनाव के मद्देनजर राजनीति की रोटी सेंकी जा रही है।

इतना ही नहीं ऐतिहासिक चांदनी चौक के बीचोंबीच एक दौर में ऐतिहासिक फव्वारा हुआ करता था। पानी की फुहार पर चांद की रोशनी यहां चांदनी बिखेरा करती थी। इसी वजह से इसे चांदनी चौक कहा जाने लगा था। औरंगजेब के काल में यहां भाई मतिदास शहीद हुए थे। सिखों ने इस पर (फव्वारे पर) भाला गाड़ दिया है और इसे धार्मिक स्थल बनाने व घेरने के फेर में हैं। फव्वारा न केवल बंद करवा दिया गया है बल्कि इसे धीरे-धीरे तोड़ा जा रहा है। चौक को घेरकर बीच रास्ते में यहां मतिदास स्मारक बनाने की तैयारी है। इसे मतिदास चौक का नाम दे दिया गया है।
बीते हफ्ते अवैध निर्माण गिराने वाला दस्ता इलाके में आया तो सेवादार फव्वारे से थोड़ा बहुत सामान बटोरकर कहीं चले गए। लेकिन प्याऊ को दोबारा बनता देख वे फिर सरगर्म हो गए हैं। इस चौक से थोड़ा आगे मेन रोड पर बाग वाली शाही मस्जिद उर्फ काबिलेतार मस्जिद आती है। इस मस्जिद के बाहरी हिस्से को पूरी तरह व्यावसायिक बना दिया गया है।

हालांकि दिल्ली हाई कोर्ट का साफ आदेश है कि सार्वजनिक स्थलों- मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, गिरजाघरों व वक्फ आदि की संपत्ति में व्यावसायिक गतिविधियां नहीं चलाई जा सकती हैं। इतना ही नहीं इस मस्जिद के अंदर एक मशहूर प्ले स्कूल का सेंटर खोल दिया गया है। इसकी बाहरी दीवारों के सहारे दर्जनों दुकानें निकाल दी गई हैं। इससे सटे कूचा काबिलेतार की गली, जो कभी खुली हुआ करती थी, इन दिनों दुकानों से मानो ढक गई है। इन दुकानों का किराया कौन ले रहा है, यह भी एक पहेली है।

इससे पहले मुख्य सड़क के बीचोंबीच हनुमान जी का मंदिर नजर आएगा। मंदिर की देखरेख करने वाले लोग इसे पौराणिक व ऐतिहासिक बता रहे हैं। लेकिन सच्चाई उलट है। यह मंदिर सीवर के ऊपर बीच सड़क पर बना है। इलाके के बुजुर्गों का कहना है कि यहां कभी ट्रांबे लाइन थी।
बहरहाल चांदनी चौक इलाके के ‘सर्वधर्म-अतिक्रमण’ के बीच बहस में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री रहे जम्मू-कश्मीर के पूर्व राजपाल जगमोहन सहसा याद आ जाते हैं। गुरुद्वारे के प्याऊ को पुलिस के सामने दोबारा बनाने को ‘वारदात’ बता लोग जगमोहन की अवैध निर्माण ढहाने की करीब 15 साल पहले की कार्रवाई की चर्चा करने लगते है। याद रहे, बिल्डरों व अवैध निर्माण के खिलाफ जंग के चलते जगमोहन को पद से हटना पड़ा था। उन्होंने लाल किला, जामा मस्जिद, पत्थर वाला, लाजपत राय मार्केट आदि के अवैध निर्माण पर बुलडोजर चलवाया था। अब जनता जानना चाहती है कि आखिर कौन-सा दबाव था कि इस बार दो सौ से ज्यादा पुलिस और निगम के कर्मी एक प्याऊ न तोड़ पाए। सरकारी अमले से हताश लोगों का कहना है कि इन इलाकों में अवैध निर्माण के खिलाफ जंग जीतना बगैर ‘जगमोहन जज्बे’ के संभव नहीं है।

सबने साधी चुप्पी
जनसत्ता ने इस बाबत अधिकारियों की प्रतिक्रिया जानने की कोशिश की। पुलिस ने अवैध निर्माण रोकने को निगम का अधिकार क्षेत्र बताते हुए इस बाबत अपनी किसी भूमिका से इनकार किया। उधर निगम के प्रवक्ता ने कहा कि दिल्ली सरकार ने अब पुरानी दिल्ली के विकास, निर्माण आदि से जुड़े मसले के लिए ‘शाहजहांनाबाद रीडेवलपमेंट कारपोरेशन’ (एसआरडीसी) बना दिया है। लिहाजा तमाम मुद्दे पर सरकार खुद निर्णय लेती है, निगम की भूमिका उन्हें सहयोग मुहैया कराने की रह गई है। प्याऊ तोड़ने के मसले में भी अदालत ने एसआरडीसी को ही निर्देश दिया है, निगम ने अवैध निर्माण तोड़ने वालों की टीम भेजी थी। जब एसआरडीसी की निदेशक सदस्य अलका लांबा, जो इस क्षेत्र से आप की विधायक भी हैं, से संपर्क साधा गया तो उनके कार्यालय ने संपर्क का मसौदा जाना। फिर लांबा के मीटिंग में होने की बात कह कर टाल दिया गया। इसके अलावा लांबा के निजी फोन पर लगातार संपर्क करने की संवाददाता की कोशिश और संदेश छोड़ने का प्रयास भी विफल रहा।

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