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विशेष: कोरोना की धुन ही बन जाएगी दवा

अमेरिकी वैज्ञानिक मार्कस जे ब्यूहलर इन दिनों खूब चर्चा में हैं। मार्कस ही वो शख्स हैं जो लोगों के बीच एक घंटे से ज्यादा समय का दिलचस्प कोरोना संगीत लेकर आए हैं और यह सब करने के लिए उन्होंने मदद भी कोरोना विषाणु से ही ली है।

संगीत की धुन पर राहत की खोज।

दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना। शायरों ने मिर्जा गालिब की इस शायराना फिक्र का खूब इस्तेमाल किया है। संगीत के बारे में भी कहा जाता है कि इसका रिश्ता खुशी से ज्यादा गम से है। गम हमें गुनगुनाना सीखा देता है। यही कारण है कि पूरी दुनिया में जिन गीतों को ‘क्लासिक्स’ का दर्जा दिया गया है, वे या तो गम में डूबे गीत हैं या फिर बेहतर दुनिया और जिंदगी की मुराद के साथ की जाने वाली प्रार्थनाएं। कोरोना के खौफ और कहर के बीच संगीत की चर्चा अस्वाभाविक नहीं है।

कमाल तो यह कि इसके लिए सबसे दिलचस्प सांगीतिक पहल की है वैज्ञानिकों ने। वैज्ञानिकों को कोरोना विषाणु के संक्रमण से रोकने का टीका विकसित करने में भले अब तक कामयाबी न मिली हो पर उन्होंने इस विषाणु से संगीत का रिश्ता जोड़ने में जरूर कामयाबी हासिल कर ली है और उन्हें उम्मीद है कि आगे उन्हें इसी रास्ते कोरोना उपचार का भी सूत्र मिल जाएगा।

अमेरिका के मैसाच्यूसेट्स इंस्टीट्यूट आॅफ टेक्नोलॉजी (एमआइटी) के वैज्ञानिक मार्कस जे ब्यूहलर इन दिनों खूब चर्चा में हैं। मार्कस ही वो शख्स हैं जो लोगों के बीच एक घंटे से ज्यादा समय का दिलचस्प कोरोना संगीत लेकर आए हैं और यह सब करने के लिए उन्होंने मदद भी कोरोना विषाणु से ही ली है। एमआइटी के वैज्ञानिक इस घातक विषाणु की बनावट पर गहनता के साथ कार्य कर रहे हैं। इस दौरान उन्हें इसकी बनावट के बारे में काफी जानकारी मिली। यहीं से शुरू होती है कोरोना संगीत के जन्म की कहानी। वैज्ञानिकों ने सोनीफिकेशन तकनीक के जरिए कोरोना विषाणु के बाहरी परत पर मौजूद कंटीले प्रोटीन से यह संगीत तैयार किया है। यह पूरा संगीत करीब एक घंटा 49 मिनट 48 सेकंड का है।

दरअसल, कोरोना विषाणु की बाहरी कंटीली प्रोटीन की परत ही संक्रमण के दौरान हमारी कोशिकाओं को छेदती है। इस तरह यह विषाणु हमारे शरीर के भीतर डेरा जमाना शुरू करता है। यह परत अमीनो एसिड से बना होता है। जब हम अमिनो एसिड का ढांचा देखेंगे तो वह एक ‘हेलिक्स’ जैसा दिखता है यानी हमारे डीएनए के आकार जैसा घूमा हुआ। जब इनमें कंपन होता है तो इनसे आवाज निकलती है।

एमआइटी के वैज्ञानिकों ने कोरोना विषाणु के बाहरी कंटीले प्रोटीन से मिले अमीनो एसिड्स के ढांचे को अलग-अलग नोट पर रखा, जिससे यह सुमधुर धुन निकला। एमआइटी के वैज्ञानिकों का कहना है कि संगीत के ऊपरी और निचले नोट से पता चलता है कि अमीनो एसिड का ढांचा कहां से मजबूत और कहां से कमजोर है।

वैज्ञानिक भाषा में किसी विषाणु के ढांचे को इस तरह से बनाने को ‘मॉलिक्यूलर मॉडलिंग’ कहते हैं। जब मॉलिक्यूलर मॉडल का सोनीफिकेशन करते हैं तो उससे संगीत निकलता है। वैज्ञानिकों ने कोरोना म्यूजिक के सोनीफाइड प्रोटीन को अपने बड़े डेटाबेस में डाला है ताकि वे यह पता कर सकें कि इस प्रोटीन के साथ डेटाबेस में मौजूद कोई अन्य प्रोटीन कैसे रिएक्ट करता है। डेटाबेस में मौजूद जो प्रोटीन कोरोना के सोनीफाइड प्रोटीन यानी संगीतयुक्त प्रोटीन को दबा देगा, उस प्रोटीन से इस विषाणु को मारने या दबाने की दवा बनाई जा सकती है यानी भविष्य में संगीत से निकलेगी कोरोना के उपचार की राह।

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