ताज़ा खबर
 

राफेल से पहले तीन डील गंवा चुकी थी रिलायंस, रूस ने भारत की सरकारी कंपनियों को दी थी तरजीह

अप्रैल 2015 में पेरिस यात्रा के दौरान जहां राफेल डील पर पहली बार बात हुई थी, उसी साल दिसंबर महीने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मॉस्को दौरे के दौरान अनिल अंबानी भी वहां मौजूद थे। उनकी नजर रूस के साथ कुछ बड़े कॉन्ट्रैक्ट पर थी।

Author September 2, 2018 9:43 AM
राफेल फाइटर प्लेन (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस डिफेंस राफेल का ठेका हासिल करने से पहले तीन डील गंवा चुकी थी। कंपनी ने भारत के पुराने डिफेंस पार्टनर रूस से भी कॉन्ट्रैक्ट लेने की कोशिश की थी, लेकिन तीनों प्रमुख डील लेने में वह असफल रही। फ्रांस के विपरीत रूस ने करार करने से इंकार कर दिया था। इसमें पहला 1 बिलियन डॉलर का कमोव केए करार, जो सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को दिया गया अौर दूसरा 2.5 बिलियन डॉलर का फ्रिगेट करार गोवा शिपयार्ड को दिया गया। तीसरा 5.5 बिलियन डॉलर का करार भी रिलायंस के साथ नहीं किया गया।

रूस ने भारत से बातचीत के बाद पब्लिक सेक्टर यूनिट्स, जिसमें हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड शामिल है, के साथ मिलकर  1 बिलियन डॉलर वाले कमोव केए 226 लाइट हेलिकाॅप्टर का करार किया था। द इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल 2015 में पेरिस यात्रा के दौरान जहां राफेल डील पर पहली बार बात हुई थी, उसी साल दिसंबर महीने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मॉस्को दौरे के दौरान अंबानी भी वहां मौजूद थे। यहां उनकी नजर रूस के साथ कुछ बड़े कॉन्ट्रैक्ट पर थी। यात्रा के दौरान कमोव कॉन्ट्रैक्ट सौदे को अंतिम रूप दिया गया था। रिलांसय डिफेंस कई महीनों से इस कांट्रैक्ट के लिए बात कर रहा था, लेकिन रूस ने भारत की सार्वजनिक कंपनी के साथ जाने के निश्चय किया। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड रूस का पुराना पार्टनर रहा है। इसने पहले भी सुखोई विमान का निर्माण किया था।

रिपोर्ट के अनुसार, रूस का कहना था कि, “निजी क्षेत्र की इकाइ को ‘सरकार द्वारा अनुमाेदित’ होना चाहिए। रिलायंस डिफेंस इस मानदंड को पूरा नहीं करता है क्योंकि भारत सरकार अधिकारिक रूप से किसी निजी कंपनी को नामित नहीं करती।” हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स के साथ समझौता होने से तीन महीने पहले रूस ने भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय को रिलायंस डिफेंस के साथ एक संभावित पार्टनरशिप के बारे सूचित किया था। लेकिन बाद में यह डील नहीं हो सकी। इसी यात्रा के दौरान भारत और रूस के बीच 2.5 अरब डॉलर की अनुमानित लागत पर भारतीय नौ सेना के लिए चार फ्रिगेट की खरीद के लिए समझौता हुआ था।

 

इसके अलावा रिलायंस डिफेंस रूस की यूनाइटेड शिपबिल्डिंग कॉरपोरेशन (यूएसपी) के साथ युद्धपोतों के निर्माण के लिए भारतीय पार्टनर बनने की कोशिश में था। इस डील में भी रिलायंस डिफेंस को निराश हाथ लगी। इसके लिए भी गोवा शिपयार्ड को नामित किया गया। वहीं, पीएम मोदी के मॉस्को दौरे के दौरान रिलायंस डिफेंस ने एस 400 मिसाइल रक्षा प्रणाली का निर्माण करने वाली कंपनी अलामाज एंटे के साथ 39,500 करोड़ रूपये के सौदे के लिए करार भी कर लिया था। लेकिन भारत सरकार ने रूस के निवेदन पर एस 400 सौदे में से 30 प्रतिशत ऑफसेट के अनिवार्य प्रावधान को हटा दिया। रूसी पक्ष ने तर्क दिया कि एस 400 एक बेहद संवेदनशील और उन्नत प्रणाली है, इसलिए ऑफसेट को समय पर देने के प्रावधान को हटा देना चाहिए। इस वजह से रिलायंस डिफेंस का यह डील भी फाइनल नहीं हो सका।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App