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बागी नेता मुकाबले को बना सकते हैं त्रिकोणीय

अगर कांग्रेस ‘आप’ के टिकट बंटवारे से नाराज नेताओं को अपने पक्ष में लाने में कामयाब हो गए तो कुछ सीटों पर चुनाव को कांग्रेस तिकोना बना देगी।

सीएम अरविंद केजरीवाल। (फोटो-PTI)

प्रचंड बहुमत के साथ दिल्ली की सत्ता में पांच साल रहने के बाद दोबारा सत्ता में आने के अतिआत्मविश्वास के साथ आम आदमी पार्टी (आप) ने सबसे पहले अपने सभी 70 उम्मीदवारों की घोषणा करके चुनाव प्रचार जैसा चुनाव में भी बढ़त लेने का प्रयास किया है। ऐसा करके ‘आप’ ने दूसरे दलों को एक तरह से चुनौती दी है लेकिन जिस तरह कुछ अच्छी छवि वाले विधायकों के टिकट कटने के बाद उनके बगावत करने का खबर आ रही है, उससे खतरा है कि ‘आप’ का यह दांव कहीं घाटे का सौदा न बदल जाए। अभी तक तो यही लग रही है कि विधानसभा चुनाव में सीधा मुकाबला ‘आप’ और भाजपा में होने वाला है लेकिन अगर कांग्रेस ‘आप’ के टिकट बंटवारे से नाराज नेताओं को अपने पक्ष में लाने में कामयाब हो गए तो कुछ सीटों पर चुनाव को कांग्रेस तिकोना बना देगी।

दिल्ली के मुख्यमंत्री और ‘आप’ के संयोजक अरविंद केजरीवाल का पहला प्रयास तो यही है कि 2015 की तरह चुनाव बिजली-पानी के साथ-साथ उनके नाम पर हो। भाजपा चुनाव को प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार के काम पर लड़ने के अलावा चुनाव को विधायकों के कामकाज पर लड़ना चाहती है। भाजपा का संकट यह है कि वह मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित नहीं कर पाई है। कांग्रेस तो अपने वजूद का लड़ाई लड़ रही है। भाजपा 1998 से दिल्ली की सत्ता से बाहर है और कांग्रेस 15 साल लगातार सत्ता में रहकर छह साल बाहर रहने में ही बिखरने लगी है।

कांग्रेस के बड़े नेताओं में से ज्यादातर इस बार चुनाव लड़ने से कतरा रहे हैं। जिस तरह से सीलमपुर से पांच बार विधायक रहे चौधरी मतीन अहमद ‘आप’ विधायक हाजी इशहाक को चुनाव में साथ देने की घोषणा कर चुके हैं उसी तरह अन्य ‘आप’ के बागी विधायकों को भी कांग्रेस या भाजपा अपने पक्ष में टिकट देकर या पद देकर ला सकती है। कांग्रेस नेतृत्व का प्रयास है कि सभी बड़े स्थानीय नेता चुनाव लड़ें जिससे पार्टी पिछले दो विधानसभा चुनावों की हार से उबरे। माहौल अनुकूल न होने से दिल्ली कांग्रेस के अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा या चुनाव अभियान समिति के प्रमुख कीर्ति आजाद माहौल बना नहीं पा रहे हैं। संयोग है कि ‘आप’ के दागदार कई विधायक टिकट पा गए और बाहर से जिन नेताओं को पार्टी में लाकर टिकट दिए गए हैं उनमें रामसिंह नेताजी, दयावती चंदेला और शोएब इकबाल पर अपराधिक मामले हैं। ‘आप’ सरकार में मंत्री रहे जितेंद्र सिंह तोमर पर भी फर्जी डिग्री का मामला अभी खत्म नहीं हुआ है।

लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के मुकाबले तीसरे नंबर पर आई ‘आप’ के नेता केजरीवाल ने पिछले छह महीने में सरकारी खजाने से घोषणाओं का झड़ी लगा दी ताकि जो वर्ग उनके साथ 2013 और 2015 के विधानसभा चुनाव में जुड़ा वह अगले महीने होने वाले विधानसभा चुनाव में भी जुड़ा रहे। 2015 के बाद के हर चुनाव में ‘आप’ ने कांग्रेस को मुख्य मुकाबले से बाहर करने का प्रयास किया और तब के कांग्रेस जनों ने उसे ज्यादा सफल नहीं होने दिया। अगर निगमों के चुनाव में कुछ बड़े नेता बगावत नहीं करते तो कांग्रेस इस मई के लोकसभा चुनाव जैसा दूसरे नंबर पर होती। तमाम उठा-पटक के बाद प्रदेश अध्यक्ष बन कर चुनाव लड़ी शीला दीक्षित ने कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में भाजपा के मुकाबले ला दिया लेकिन पार्टी की गुटबाजी ने वापस कांग्रेस को वहीं ला दिया जहां वह 2015 के विधानसभा चुनाव में दस फीसद से कम वोट लाकर पहुंच गई थी।

सालों से यह माना जाता था कि पाकिस्तान से आए विस्थापित, सरकारी कर्मचारी, व्यापारी और मध्यमवर्ग भाजपा के साथ होते हैं। गरीब, अनधिकृत कॉलोनियों, देहात, अल्पसंख्यक आदि कांग्रेस के समर्थक होते हैं। पिछले तीन दशकों में पूर्वांचल के प्रवासियों की बड़ी तादात दिल्ली और आसपास में आने के बाद सारे समीकरण बदल गए। अब कांग्रेस समर्थक ‘आप’ के वोटर माने जा रहे हैं। 70 विधान सभा सीटों में से 50 में पूर्वांचल के प्रवासी 20 से 60 फीसद तक हो गया हैं। 2016 में बिहार मूल के भोजपुरी कलाकार मनोज तिवारी ने प्रदेश अध्यक्ष बनाकर और इस चुनाव से ठीक पहले करीब 1800 कालोनियों में मालिकाना हक देकर भाजपा ने इस वर्ग को जोड़ने का प्रयास किया है।

‘आप’ के 66 में से 46 दोबारा बने उम्मीदवार
‘आप’ ने अपने 66 विधायकों में से 46 को दोबारा उम्मीदवार बनाया। पांच उन विधायकों का टिकट कटा जिन्हें ‘आप’ से बगावत करने पर पार्टी से निकाला गया। 15 विधायकों के टिकट काटे गए और 12 ऐसे नेताओं को टिकट दिए गए जो पार्टी में अभी शामिल हुए हैं। संयोग से ‘आप’ ने जिन विधायकों के टिकट काटे हैं उनमें आदर्श शास्त्री, पंकज पुष्कर, नारायण दत्त शर्मा, कमांडो सुरेन्द्र, चौधरी फतेह सिंह, हाजी इशहाक और अवतार सिंह जैसे नाम शामिल हैं। बताया जाता है कि इन्होंने अपने काम के बूते इलाके में अपनी पहचान बनाई थी। इनमें से ज्यादातर ने बगावत करके चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। चौधरी फतेह सिंह जैसे पुराने भाजपा नेता वापस भाजपा में जा सकते हैं लेकिन ज्यादातर कांग्रेस के उम्मीदवार बन सकते हैं।

 

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