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विशेष: आपदा में आबादी

एक बच्चा जब स्कूल में पढ़ता है तो वह भी अपने परीक्षा प्रमाणपत्र के साथ ऐसी ही शरारत करता है। अगर परीक्षा में उसके 70 फीसद नंबर आते हैं तो वह घर में अपने अभिभावक को बोलता है कि मेरे साथ जो विद्यार्थी बैठते हैं उनमें से एक के तो महज 55 फीसद नंबर आए हैं और एक तो पास ही नहीं हुआ। लेकिन वह अपने अभिभावक को यह नहीं बताता कि उसकी कक्षा में किसी छात्र के नब्बे फीसद अंक भी आए हैं।

Covid-19, population control, rapid increasing populationदेश की बढ़ती आबादी और जनसंख्या घनत्व को भी महामारी नियंत्रण में बाधा माना जा रही है।

‘बाजारे-मगरिबी की हवा से खुदा बचाए,
मैं क्या, महाजनों का दिवाला निकल गया’

हमारी आबादी को देखते हुए ये तो लाजिम था…। सरकार से जुड़े सभी लोग और संस्थाएं कोरोना संक्रमण से हुई मौतों को लाजिम मानते हुए हमें यूरोप के देशों की ओर देखने की बात कहते हैं। इन सबका सुर यही है कि जब यूरोपीय देशों में कोरोना के संक्रमण से इतने लोग मर सकते हैं तो हमारी क्या औकात। भारत की जनसंख्या को इसी लायक माना जा रहा कि इतने को तो मरना ही होगा।

भारतीय स्वास्थ्य सेवा में संक्रामक बीमारी की विशेषज्ञता का क्या हाल है ये तो पता नहीं, लेकिन लोगों की मानसिकता के प्रबंधन में विशेषज्ञों की कमी नहीं। लोगों को इस बात के लिए तैयार कर लिया जाए कि जनसंख्या ही इतनी बड़ी है तो इतनों की जान जाना स्वाभाविक है। जो मरे हैं, उनकी मौत पर सवाल नहीं पूछिए, इस बात की खैर मनाइए कि आप बचे हुए हैं। आप कभी भी जन से महज मौत की एक संख्या बन सकते हैं। आप उन्हें कोरोना मुक्त न्यूजीलैंड का उदाहरण देंगे तो वे 50 लाख और 135 करोड़ का फर्क बता देंगे।

भारत और यूरोपीय देशों की जनसंख्या की तुलना करने वाले जब बच्चों सी दलील देते हैं तो उनके साथ भी स्कूली बच्चों की तरह बात करने और वैसे ही उदाहरण देने की इच्छा हो जाती है। उन्हें याद दिलाने का मन करता है कि एक बच्चा जब स्कूल में पढ़ता है तो वह भी अपने परीक्षा प्रमाणपत्र के साथ ऐसी ही शरारत करता है। अगर परीक्षा में उसके 70 फीसद नंबर आते हैं तो वह घर में अपने अभिभावक को बोलता है कि मेरे साथ जो विद्यार्थी बैठते हैं उनमें से एक के तो महज 55 फीसद नंबर आए हैं और एक तो पास ही नहीं हुआ। लेकिन वह अपने अभिभावक को यह नहीं बताता कि उसकी कक्षा में किसी छात्र के नब्बे फीसद अंक भी आए हैं। वह अपने अभिभावक के पास उस नब्बे फीसद अंक वाले विद्यार्थी की जानकारी पहुंचने ही नहीं देना चाहता है और मां के सामने तुलना के लिए खुद से कमतरों को पेश करता है।

तथ्यों की तुलना को गलत राह पर ले जाकर भटकाने के शरारती बच्चे के उदाहरण को अगर नहीं समझ पा रहे हैं तो इन्हें उस टीवी प्रस्तोता की तरह महसूस कर सकते हैं जो रोज शाम को चीखती आवाज के साथ नमूदार होते हैं। देश में जब सौ रुपए किलो टमाटर बिक रहे होते हैं तो टीवी पर खबरों के बहाने आपको यह कहकर भरमाते हैं कि सौ रुपए तो कुछ नहीं, पाकिस्तान में तीन सौ रुपए किलो टमाटर बिक रहे हैं।

अगर आपको जनसंख्या से ही तुलना करनी है तो फिर पड़ोसी देश चीन से कीजिए। चीन वह देश है जहां कोरोना विषाणु का संक्रमण फूटा और एक प्रांत से आगे नहीं बढ़ा। चीन के हुवेई प्रांत के वुहान और हेइलोंगजियान के हार्बिन शहर में समय रहते कदम उठाए गए तो पूरे देश को बंद करने की जरूरत ही नहीं पड़ी।

कोरोना को लेकर चीन की सरकार अपने नागरिकों के बीच श्वेत-पत्र ला चुकी है। भारत में पूरे देश की पूर्णबंदी को कारगर बताने वाले यह भूल गए कि दो प्रांतों का समय पर इलाज कर पूरे चीन की जनसंख्या को सुरक्षित किया गया। जिस देश में संक्रमण की शुरुआत हुई वहां कोरोना संक्रमितों की संख्या लाख के पार नहीं पहुंची।

ध्यान रहे, चीन की जनसंख्या भारत से ज्यादा है। लेकिन हम संक्रमण से लेकर मौत के मामलों में भी चीन की संख्या को कब का लांघ चुके हैं। जब भारत के शहर संक्रमण में वुहान होने और उसके पार जाने का तमगा हासिल कर रहे हैं तो आप मौत के मामलों में यूरोप की तरफ देखने के लिए कह रहे हैं। और, आप ऐसी तुलना करेंगे तो कल को पंजाब कहेगा कि हमारी बात मत करो महाराष्ट्र का हाल देखो। ऐसी तुलना में सबसे तुच्छ हो जाता है इंसान का जीवन।

जब हम राज्यों की तुलना का आभासी उदाहरण दे रहे हैं तो यह तुच्छता टीवी चैनल पर सच में दिख भी जाती है। आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता टीवी पर दर्प भरी मुस्कान के साथ कह रहे थे कि दिल्ली की मृत्यु दर अन्य राज्यों की तुलना में सबसे कम है। इसके पहले आम आदमी पार्टी बीमारों के बीच दिल्लीवाले और बाहरी का भेदभाव करने की तुच्छता कर ही चुकी है, जिसे दिल्ली के उपराज्यपाल पलट चुके हैं।

हमारी सरकार से जुड़े लोगों ने यूरोपीय देशों से तुलनात्मक स्वत: सत्यापित सांत्वना पुरस्कार दिखाते हुए कहा कि भारत में कोरोना वायरस का उच्चतम स्तर आना अभी बाकी है। इसके साथ ही कह दिया गया है कि दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों के संक्रमण केंद्रों में सामुदायिक संक्रमण की आशंका है। देश के दस से बारह शहर सामुदायिक संक्रमण के खतरे में हैं।

अब जब सरकारी से लेकर सभी संस्थाएं यही कह रही हैं कि कोरोना के कहर का उच्चतम आना अभी बाकी है तो क्या आगे भी हमें सिर्फ एक बड़ी जनसंख्या के तौर पर देखा जाएगा और यूरोप की तुलना में बेहद कम बताकर मौतों को न्यायोचित ठहराया जाएगा। लालकिले और राजपथ से जिस 135 करोड़ की जनता के नाम पर गर्व किया जाता है वो मानव संसाधन आपके लिए कोरोना का कूड़ेदान होगा?

आपका काम मौतों की संख्या को न्यायोचित ठहरा कर उसे अपनी सफलता साबित करना नहीं है। आपका काम हर बीमार को मौत के मुंह में जाने से रोकना है चाहे कम हो या ज्यादा। हाल ही में हमने कोरोना के कहर के मामलों में ‘कयामत के दूत’ की उपमा सुनी थी। सरकार के पक्षकार ने उन लोगों को ये तमगा दिया था जो आपदा के इस समय में जनहित याचिका और नकारात्मक खबरों की भरमार लगा देते हैं। तो फिर यूरोप का नक्शा दिखा कर भारत के भूगोल पर मौत पर मातम नहीं बल्कि कयामत में कामयाबी दिखाने की इस प्रवृत्ति को क्या कहा जाए?

कहते हैं कि कोरोना ने पूरे विश्व की सरकारों और संस्थाओं के चेहरों से मास्क हटा कर उनके असली चेहरे को उजागर किया है। फिलहाल तो आप यूरोप की तुलना का प्रमाणपत्र लेकर आए हैं लेकिन ये मत भूलिए कि हर वर्तमान इतिहास के भी हवाले होता है। इतिहास के प्रमाणपत्र पर आपकी तुलना आपसे कम या ज्यादा नहीं बल्कि आपके बराबर वालों और सिर्फ आपसे ही होगी। जिसे आप महज जनसंख्या कह उन पर कोरोना का ठीकरा फोड़ रहे हैं वे बतौर नागरिक आपकी नाकामी के प्रमाणपत्र पर सामूहिक हस्ताक्षर करेंगे।

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