Vaishno Devi Ropeway Project Controversy: वैष्णो देवी में 250 करोड़ रुपये की लागत से प्रस्तावित रोपवे प्रोजेक्ट का विरोध जारी है। एक ओर जहां स्थानीय संगठन महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे हैं। वहीं, दूसरी तरफ राजनीतिक गलियारों में भी इस मुद्दे पर विवाद जारी है। प्रोजेक्ट के प्रस्ताव पर चल रहे विवाद के बीच, राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने मंगलवार को जम्मू-कश्मीर विधानसभा को बताया कि प्रोजेक्ट को मंजूरी लेफ्टिनेंट गवर्नर ने दी थी, न कि उनकी कैबिनेट ने।
बलदेव राज शर्मा के इस्तीफे की मांग की
जैसे ही सदन शुरू हुआ, नेशनल कॉन्फ्रेंस के MLA नजीर अहमद गुरेजी और डिप्टी चीफ मिनिस्टर सुरिंदर चौधरी ने इस मुद्दे पर सदन को “गुमराह” करने के लिए BJP MLA बलदेव राज शर्मा के इस्तीफे की मांग की। हंगामे के बीच मामले में दखल देते हुए, CM अब्दुल्ला ने सदन को बताया कि बीजेपी विधायक के इस दावे के बाद कि रोपवे को उनकी कैबिनेट से मंजूरी मिल गई है, उन्होंने रिकॉर्ड चेक किए थे।
मुख्यमंत्री ने सदन में कहा, “मैंने जरूरी डॉक्यूमेंट्स मांगकर फैक्ट्स वेरिफाई करने की कोशिश की। मैंने चेक किया कि क्या काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स से कोई मंजूरी मिली थी? मैंने पाया कि इस परियोजना के संबंध में कोई मंजूरी नहीं मिली थी। उसके बाद, मैंने यह पता लगाने की कोशिश की कि क्या पिछली एडमिनिस्ट्रेटिव काउंसिल (जिसका नेतृत्व लेफ्टिनेंट गवर्नर कर रहे थे) ने इसे मंजूरी दी थी, लेकिन यह मामला एडमिनिस्ट्रेटिव काउंसिल के सामने भी कभी नहीं आया।”
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उम्होंने कहा, “फिर मुझे पता चला कि सितंबर 2024 में, यह मुद्दा लेफ्टिनेंट गवर्नर के दौरे के दौरान उनके सामने रखा गया था, और उन्होंने, सक्षम अधिकारी के तौर पर, इसे मंजूरी दे दी थी।” मुख्यमंत्री ने कहा, “यह मंजूरी सरकार बनने से करीब एक महीने पहले दी गई थी। इस मामले में कैबिनेट की कोई मंजूरी नहीं है।”
अब्दुल्ला ने कहा कि वह चाहते हैं कि असेंबली रिकॉर्ड ठीक करे, क्योंकि “यहां हाउस को और हाउस के जरिए लोगों को गुमराह करने की कोशिश की जा रही है।” उन्होंने कहा कि BJP MLA ने इमोशनल होकर कहा कि वह इस्तीफा दे देंगे लेकिन “हम न तो इसे बढ़ावा देते हैं और न ही भड़काते हैं। मैं बस रिकॉर्ड ठीक करना चाहता हूं।”
वहीं, सदन में BJP MLA की आलोचना करते हुए डिप्टी चीफ मिनिस्टर ने कहा, “लोगों की भावनाओं और आस्था से खेलना बंद करें। आप किस तरह के हिंदू हैं। हम भी हिंदू हैं लेकिन हम अपने धर्म के साथ पॉलिटिक्स नहीं करते।” इससे पहले, BJP MLA ने एक सरकारी ऑर्डर दिखाया और पढ़ा और उसकी एक कॉपी स्पीकर को देखने के लिए दी।
असेंबली के बाहर रिपोर्टर्स से बात करते हुए, शर्मा ने 14 अगस्त, 2025 का ऑर्डर पढ़ा, जिसमें प्रोजेक्ट के लिए सरकारी मंजूरी दी गई थी।उन्होंने आरोप लगाया, “सरकार की इजाजत के बिना रोपवे नहीं बनाया जा सकता। सरकार, खासकर डिप्टी चीफ मिनिस्टर, कटरा के लोगों को विरोध के लिए भड़का रहे हैं।”
‘माता का मंदिर पूरे देश का है’
उन्होंने दावा किया कि प्रोजेक्ट का विरोध करने वालों ने हाल ही में उन्हें जान से मारने और उनकी प्रॉपर्टी में आग लगाने की धमकी दी थी। उन्होंने कहा, “मेरा मानना है कि सुरिंदर चौधरी इस सब के लिए जिम्मेदार हैं। अगर मेरे या मेरी प्रॉपर्टी के साथ कुछ भी गलत होता है, तो इसके लिए उन्हें और उनकी सरकार को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।”
रोपवे प्रोजेक्ट की अहमियत बताते हुए शर्मा ने कहा कि श्राइन बोर्ड ने उन सभी लोगों के पुनर्वास का भरोसा दिया है जो इस प्रोजेक्ट से प्रभावित होंगे। उन्होंने कहा, “माता का मंदिर पूरे देश का है, सिर्फ कटरा या जम्मू के लोगों का नहीं। रोपवे का मकसद उन दिव्यांग और बुजुर्ग लोगों की सुविधा के लिए है जो मंदिर नहीं जा पाते हैं।”
उन्होंने कहा कि लेफ्टिनेंट गवर्नर की बनाई हाई लेवल कमेटी ने स्टेकहोल्डर्स से उनकी चिंताओं को दूर करने के लिए बात की थी और उन्होंने प्रोजेक्ट पर कोई एतराज न करने का फैसला किया है।
आखिर क्यों हो रहा है विरोध?
दरअसल, वैष्णो देवी तीर्थयात्रियों के बेस कैंप कटरा के लोकल लोग 250 करोड़ रुपये के रोपवे प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे हैं, जो ताराकोट मार्ग को सांजी छत से जोड़ेगा और गुफा में स मंदिर तक 12 किलोमीटर लंबा खड़ी चढ़ाई वाला रास्ता होगा। ऐसे इसलिए क्योंकि स्थानीय लोगों का मानना है कि वैष्णो देवी की यात्रा केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही आस्था और परंपरा से जुड़ा विषय है।
पैदल यात्रा, पिट्ठू, घोड़ा और पालकी के जरिए स्थानीय लोगों द्वारा श्रद्धालुओं की सेवा कई वर्षों से चली आ रही है। अब रोपवे के लगने से इस पर गहरा आघात पहुंचेगा। स्थानीय संगठनों ने कहा कि रोपवे से यात्रा की मूल भावना समाप्त हो जाएगी और श्रद्धालुओं का पारंपरिक मार्गों से जुड़ाव खत्म हो जाएगा।
साथ ही परियोजना से कटरा और आसपास के इलाकों में हजारों परिवारों की रोजी-रोटी पर सीधा असर पड़ेगा। पिट्ठू, घोड़ा और पालकी सेवाएं सिर्फ रोजगार का साधन नहीं हैं, बल्कि पीढ़ियों से चले आ रहे पारंपरिक काम हैं, जिनसे स्थानीय लोग अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं।
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